मैंने अपने 69 साल के जीवन में पहली बार सैफ़ई में माननीय मुलायम सिंह यादव की अंतिम विदाई में इतनी
भीड़ देखी है।इससे पहले किसी भी क्षेत्रीय या राष्ट्रीय नेता की अंतिम यात्रा में इतनी जनता शामिल नहीं हुई थी।
“नेताजी के इस सम्मान को देखकर मुझे मेरे पिता जी की कही हुई बात आज सत्य साबित होती हुई स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है कि समाज कभी भी किसी का कर्ज नहीं रखता है। मुलायम सिंह जी को यह सम्मान मिलना स्वाभाविक ही था क्योंकि वह सिद्वांतों, इंसानियत, ईमानदारी, नैतिकता, सामाजिक न्याय और देशभक्ति से परिपूर्ण राजनीति करते थे।सत्ता और धन पाने की हवस उनमें नहीं थी जैसा कि आज की राजनीति का उद्देश्य ही बन गया है। बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय समाजवादी खुद को कहने वाले जार्ज फर्नांडिस, खुद को सबसे बड़ा सेकुलर कहने वाले चंद्रबाबू नायडू, खुद को दलित पिछड़ों के हितैषी और समाजवादी कहने वाले नीतीश कुमार, साम्प्रदायिक ताकतों की सबसे बड़ी विरोधी होने का दावा करने वाली ममता बनर्जी तक ने भाजपा जैसी फासिस्वादी/साम्प्रदायिक ताकतों से हाथ मिला लिया था सत्ता सुख के लिए लेकिन मुलायम सिंह यादव ने अपने सिद्वांतों के साथ कभी समझौता नहीं किया। भारत के इतिहास में उनका यह सबसे बड़ा योगदान सवर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।”(लगभग सब वरिष्ठ राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार)
यादवों की संख्या आज भारत में 20% से भी अधिक है लेकिन मुलायम सिंह जी के राजनीति में आने के बाद ही देश के अधिकांश भागों में अहीरों/यदुवंशियों/चंद्रवंशियों ने यादव लिखना शुरू किया था।यदि यह कहा जाए कि यादवों की देश में पहचान ही सबसे पहले नेताजी के कारण और बाद में लालूप्रसाद यादव के कारण हुई है तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इससे पहले चंद्रजीत यादव केंद्रीय राज्य मंत्री होते थे कांग्रेस की सरकार में चौधरी ब्रह्मप्रकाश यादव दिल्ली के मुख्यमंत्री हुए थे, हरियाणा की राजनीति में राव विरेंद्र सिंह हुआ करते थे, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रामनरेश यादव हुए, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बलराम सिंह यादव हुए लेकिन यादवों की देश में पहचान बनाने और उन्हें जागरूक करने में इनका कोई योगदान नहीं था या नाममात्र का योगदान था जो शहरी क्षेत्रों तक सीमित था।बहुत कम लोग जानते हैं कि यादवों की अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाने के लिए ही मुलायम सिंह यादव ने फिल्म निर्माता बी आर चोपड़ा को महाभारत बनाने के लिए प्रेरित किया बताते हैं।
यादव समाज के प्रेरणा स्त्रोत होने के बाबजूद नेताजी ने कभी जाति की राजनीति नहीं की थी मैं उनसे कई बार संभल में,मुरादाबाद में और उनके आवास 5, विक्रमादित्य मार्ग लखनऊ में भी मिला था और नजदीक से उनको जाना था। हम जब उनको यादव महासभाओं के राष्ट्रीय या प्रांतीय सम्मेलनों में बुलाते थे तो नेताजी स्पष्ट रूप से कह देते थे कि, “मैं जाति की नहीं बल्कि समाज के दबे कुचले,दलित पिछड़े वर्गों के लिए काम करते हैं इसलिए आप इन सम्मेलनों में एक दिन के लिए पिछड़ा वर्ग सम्मेलन करेंगें तो हम भी आ जाएंगे।”
फिर हम ऐसा ही करते थे और उन्हें बुलाया करते थे।उनकी समाजवादी पार्टी में ही नहीं बल्कि उनकी सरकार में भी अधिकांश/80-90% पदाधिकारी गैर यादव होते थे। इसके बाबजूद कुछ नीच मानसिकता और गंदे डीएनए वाले गद्दार आज भी उन पर परिवार और जाति की राजनीति करने का आरोप लगाते थे।
सबसे बड़ी उपलब्धि नेताजी की यह रही थी कि वे किसान, श्रमिकों और कर्मचारियों के सच्चे हितैषी थे।शिक्षकों को सहायता प्राप्त स्कूल कालेजों में प्रबंधक अस्थायी नियुक्ति दिया करते थे और ये शिक्षक कहा करते थे कि जब मुलायम सिंह जी मुख्यमंत्री बनेंगे तो हमें स्थायी कर देंगे और हमनें देखा है कि यही होता भी था। नेताजी जैसा एक भी नेता मैंने आज तक भारत में नहीं देखा है जिसे मैंने अपने सब चुनावी वायदों को पूरा करते हुए देखा हो। इनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था। नेताजी पासंग वाली तराजू अपने साथ नहीं रखते थे जबकि आज तो सपने बेचने और सफेद झूठ बोलने का चलन ही नहीं बल्कि अपने चुनावी वादों के विपरीत काम करने वाले गद्दार, नमकहरामियों का रंगे सियार बनकर भारत की राजनीति में पिछले 6-8 सालों से शुरु हो गया है।महंगाई घटाने, रोजगार देने, कानून व्यवस्था ठीक करने, रूपये का मूल्य डालर की तुलना में बढाने के वादे करके सत्ता में आने वाले नेता जब इन सब वादों के विपरीत उपलब्धियां दिखाएं तो फिर उन्हें गद्दार और नमकहरामियों के अलावा कोई दूसरी उपमा कैसे दी जा सकती है।
रामप्रकाश यादव
Netaji
धरतीपुत्र
MulayamSinghYadav

