बड़ी उम्र की कुँवारी लड़कियाँ घर बैठी हैं
*लेख – बाल्मीकि बरनवाल
यदि अब भी माता-पिता नहीं जागे, तो स्थितियाँ और अधिक विस्फोटक हो सकती हैं। समाज आज बच्चों के विवाह को लेकर इतना सजग हो गया है कि आपसी रिश्ते बनने ही नहीं पा रहे हैं। वर्तमान में 27, 28, 32 वर्ष की अनेक कुँवारी लड़कियाँ घर पर बैठी हैं क्योंकि उनके सपने उनकी हैसियत से भी अधिक ऊँचे हैं। ऐसे कई उदाहरण देखने को मिलते हैं।
ऐसे लोगों के कारण समाज की छवि प्रभावित हो रही है। सबसे बड़ा मानव सुख, सुखी वैवाहिक जीवन होता है। पैसा आवश्यक तो है, लेकिन केवल एक सीमा तक। अधिक धन की चाह में अच्छे रिश्तों को ठुकराना अनुचित है। प्रथम प्राथमिकता सुखी गृहस्थ जीवन और अच्छा परिवार होना चाहिए। यदि केवल धन-संपत्ति को प्राथमिकता दी जाएगी, तो अच्छे रिश्ते हाथ से निकलते रहेंगे।
“संपत्ति खरीदी जा सकती है, लेकिन गुण नहीं।”
मेरा मानना है कि घर-परिवार और वर अच्छा देखना चाहिए, लेकिन अत्यधिक अपेक्षाओं के कारण अच्छे रिश्तों को ठुकराना उचित नहीं है। सुखी वैवाहिक जीवन जीने का प्रयास करें।
30 की उम्र के बाद विवाह नहीं, बल्कि समझौता होता है। चिकित्सकीय दृष्टिकोण से भी देखा जाए तो इस अवस्था में कई समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। आज विवाह में सबसे बड़ी बाधा कुंडली मिलान बन चुकी है। सोचिए, जहाँ कुंडली मिलती है, वहाँ घर-परिवार और वर उचित नहीं होते, और जहाँ वर में सभी गुण होते हैं, वहाँ कुंडली नहीं मिलती। हम कई बार यह जानते हुए भी कि सब कुछ अच्छा है, मात्र कुंडली न मिलने के कारण रिश्ता अस्वीकार कर देते हैं।
सोचकर देखिए, जिन लोगों के 36 में से 20 या 36/36 गुण भी मिल गए, उनके वैवाहिक जीवन में भी परेशानियाँ आई हैं। इसका कारण यह है कि हमने लड़के के गुणों पर ध्यान नहीं दिया। पढ़े-लिखे आधुनिक समाज ने इस कुंडली मिलान के कारण स्वयं को एक सदी पीछे धकेल दिया है।
आजकल समाज में लोग बेटी के लिए वर की खोज में 24 कैरेट सोना तलाश रहे हैं। इस कारण देखते-देखते चार-पाँच वर्ष व्यर्थ हो जाते हैं। उच्च शिक्षा और नौकरी के नाम पर भी समय निकल जाता है। लड़के को देखने का तरीका भी एक लंबी प्रक्रिया बन गया है—
क्या स्वयं का मकान है?
यदि हाँ, तो फर्नीचर कैसा है?
घर में कितने कमरे हैं?
गाड़ी है या नहीं? यदि हाँ, तो कौन-सी?
परिवार का रहन-सहन और खान-पान कैसा है?
कितने भाई-बहन हैं? माता-पिता के साथ कौन रहेगा?
बहनों की शादी हुई है या नहीं?
माता-पिता का स्वभाव कैसा है?
रिश्तेदार आधुनिक विचारधारा के हैं या नहीं?
वर का कद, रंग-रूप, शिक्षा, आय और बैंक बैलेंस कितना है?
सोशल मीडिया पर सक्रियता कैसी है?
इन सब बातों की जाँच-पड़ताल और फिर सोशल मीडिया पर चर्चा करने में ही वर्षों व्यतीत हो जाते हैं। माता-पिता को जब इस बात की गंभीरता का अहसास होता है, तब तक उनकी बेटी 30 वर्ष की हो चुकी होती है। फिर शुरू होती है चार-पाँच वर्षों की विवाह की दौड़-धूप, जिससे बच्चों का स्वर्णिम समय नष्ट हो जाता है। अच्छे रिश्ते हाथ से निकल जाते हैं और माता-पिता स्वयं अपने बच्चों के सपनों को तोड़ देते हैं।
एक समय था जब खानदान देखकर विवाह होते थे, जो लंबे समय तक टिकते थे। समधी-समधन में मान-सम्मान था, सुख-दुःख में साथ निभाने की भावना थी। रिश्तों की अहमियत थी। धन-संपत्ति भले ही कम होती थी, लेकिन घर-आँगन में खुशियाँ झलकती थीं। कभी कोई मनमुटाव हो जाता था, तो परिवार के बड़े-बुजुर्ग संभाल लेते थे। तलाक शब्द समाज में कहीं नहीं था। दांपत्य जीवन खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ बीत जाता था। पति-पत्नी वृद्धावस्था में एक-दूसरे का सहारा बनते थे और पोते-पोतियों को संस्कारों से परिपूर्ण करते थे।
परंतु अब संस्कारों का ह्रास हो चुका है। आँख की शर्म इतिहास बन चुकी है। अब रिश्तों में केवल समझौता बचा है। यदि माता-पिता अब भी नहीं जागे, तो स्थितियाँ और अधिक जटिल हो जाएँगी। समाज को समझना होगा कि लड़कियों का विवाह 22-24 वर्ष की आयु में और लड़कों का 25-26 वर्ष की आयु में हो जाना चाहिए।
“सभी गुण किसी एक में नहीं मिलते। घर, गाड़ी, बंगला देखने से पहले व्यक्ति का स्वभाव और परिवार के संस्कार देखें।”
आज माता-पिता भी आर्थिक चकाचौंध में बह रहे हैं। पैसे की दौड़ में रिश्ते-नाते पीछे छूट चुके हैं। घर-परिवार टूट रहे हैं, प्रेम-स्नेह सूख रहा है। इस पीढ़ी ने परिवारों को इतना विकृत कर दिया है कि आने वाली पीढ़ियाँ संस्कारों को केवल पुस्तकों में ही पढ़ेंगी।
समाज को अब जागना होगा, अन्यथा लोग जीवन भर अच्छे रिश्तों की तलाश में भटकते रह जाएँगे।

