*सम्पादकीय*
✍🏾जगदीश सिंह सम्पादक✍🏾
*रिश्तों के बाग को हरा रखने के वास्ते*!!
*जितना बदन में खून था सब दे चुका हूं मै*!।
*गर हो सके तो सांप से डस वाईए मुझे*।
*इन्सान के जहर का मजा ले चुका हूं मैं*!!
जिंदगी का हर लम्हा तमाम तरह के झंझावातों से गुजरते हुए उम्र के आखरी पड़ाव पर पहुंच कर औंधे मुंह गिर कर धराशाई हो जाता है।
यह एक निश्चित काल जई परम्परा है जो हर आदमी को पारितोषिक में प्राप्त है। मोह माया की विप्लव कारी आवरण में जीवन का हर चरण जिम्मेदारियो के आगोश में घुट घुट आगे बढ़ता है फिर भी आदमी उस नहीं करता लेकिन जब वक्त करवट बदलता है और तन्हाई तरुणाई लेने लगती है तब गुजरा हर पल याद बनकर अश्कों से निकलने को मजबूर हो जाता है। वक्त की बेरहमी से कोई नहीं बचा जो आज है कल नहीं होगा यह हर किसी को पता है फिर भी मृगतृष्णा सरीखे ख्वाबो के जज्बाती बवंडर में फंस कर माया लोक का प्रबुद्ध जीवधारी दर्द का हर सामान खुद ही तैयार करता रहता है।प्रारब्धीय ब्यवस्था में आस्था का खेल तो परम्परा में शामिल हैं।लेकिन बदलता परिवेश जिस व्यवस्था का निवेश कर रहा है वह भारतीय संस्कृति का विकृत परिमार्जित स्वरुप है वर्ना सनातनी समरसता तथा सामाजिक लोक आस्था में तो मातृदेवो भव; पितृ देवो भव; गुरू देवो भव की पारदर्शी व्यवस्था कालजई उच्चरण बनकर सनातनी सम्बृद्धि तथा उसकी पहचान को विस्तारित करती रही है।समय बदला है लोग बदले हैं उनकी सोच बदली है लेकिन अकल्पित अनुभूति आज भी मर्यादा की सीमा में परिमार्जन का शोक सहने के बाद भी बदलाव की आकांक्षा लिए इन्तजार में है। सामाजिक परिवर्तन तो बिधि का विविध स्वरूप है यह एक निश्चित शास्वत नियम है इसके परीशीलन के बिना कुछ भी सम्भव नहीं फिर भी एक लक्ष्मण रेखा है जिसके अन्दर ही मर्यादित जीवन का आनन्द लिया जा सकता है। वर्तमान जिस तरह गतिमान है और जिस तरह उसका आधुनिक युग में हो रहा सम्मान है वह कत्तई उत्कृष्टता का पहचान नहीं है।जरा सोचिए वहीं पराए हो गये जिनके दम पर हमने इस दुनिया का खूबसूरत नजारा देखा! वहीं बेगाना हो गया जिसने जमाना से लड़कर खुद को हासिल किया ! कल तक जिनका वजूद नहीं था वह मालिक बन गया जिसने आपना कतरा कतरा खून पिला दिया वह ठुकरा दिया गया। वक्त बदलता है हिसाब भी लेता है जितना देता है उससे दूना वसूल कर लेता है सच के सतह पर हकीकत का नजारा देखना चाहते हैं तो आप एक दिन किसी वृद्धा आश्रम पर जाकर देख लिजीए एक दिन श्मशान घाट पर जाकर कुछ देर बैठकर खुद से सवाल कर लिजिए।क्या लेकर आए है क्या लेकर जाना है! दिमाग की नश झन झना उठेगी दुनिया विरान नजर आयेंगी।जब तक सांस है तभी तक आस है फिर सब कुछ इतिहास है
अपनों से गद्दारी और गैर से वफादारी जिंदगी में सिर्फ तबाही लाती है।कर्म ऐसा करो की जमाना याद करें।
सबका मालिक एक ऊं साई राम
जगदीश सिंह सम्पादक राष्ट्रीय अध्यक्ष राष्ट्रीय पत्रकार संघ भारत 7860503468🌹🌹

