Plane Crash में अपनी जान गंवाने वाली कैप्टन शांभवी पाठक का पार्थिव शरीर जब दिल्ली पहुँचा।
तो वह सिर्फ़ एक ताबूत नहीं था…..
बल्कि सपनों, साहस, ज़िम्मेदारी और एक पूरे परिवार की दुनिया का टूटकर लौट आना था।
एयरपोर्ट पर खड़े उनके माँ-बाप अपनी नम आँखों से उस चेहरे को ढूँढने की कोशिश कर रहे थे।
जिसे उन्होंने बचपन में गोद में उठाया था।
लेकिन आज वही चेहरा कफ़न की ख़ामोशी में छुप चुका था और उनके हौसलों की उड़ान हमेशा के लिए थम चुकी थी।
एक माँ और एक पिता के लिए यह स्वीकार कर पाना सबसे कठिन सत्य होता है कि जिस संतान के लिए उन्होंने हर दुआ माँगी।
हर तकलीफ़ सही, हर सपना देखा — वह अब इस दुनिया में नहीं रही।
जिस बेटी को उन्होंने उँगली पकड़कर चलना सिखाया, गिरने पर उठाया, पढ़ाया, हिम्मत दी और आसमान छूने का हौसला दिया — आज वही बेटी उनके सामने लकड़ी के ताबूत में बंद, न बोलती, न मुस्कुराती, बस एक सन्नाटा छोड़कर चली गई।
उस पल वहाँ मौजूद हर व्यक्ति का कलेजा मुँह को आ गया।
क्योंकि यह दृश्य किसी एक परिवार का नहीं था।
यह हर माँ-बाप के डर, हर संतान के सपने और हर ज़िम्मेदार पेशेवर के बलिदान का आईना था।
कैप्टन शांभवी पाठक सिर्फ़ एक पायलट नहीं थीं।
वह आख़िरी सांस तक अपनी ड्यूटी निभाने वाली एक जिम्मेदार योद्धा थीं।
जिनका दिल डर से नहीं, कर्तव्य से धड़कता रहा।
आज उनके माता-पिता की आँखों में आँसू नहीं।
एक ऐसा शून्य है। जिसे न समय भर पाएगा, न शब्द समझा पाएँगे।
क्योंकि कुछ घाव आवाज़ नहीं करते, बस ज़िंदगी भर चुपचाप रिसते रहते हैं।
यह सिर्फ़ एक दुर्घटना नहीं,
यह उस कीमत की याद दिलाता है जो कुछ लोग हमारी सुरक्षित यात्राओं के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी देकर चुकाते हैं।
सलाम है उस बेटी को, जिसने आसमान में रहते हुए ज़मीन पर बैठे अनगिनत लोगों की जान बचाने की कोशिश की, और नमन है।
उन माँ-बाप को, जिन्होंने अपनी सबसे बड़ी पूँजी देश को सौंप दी।
💔🙏जय हिंन्द 🇮🇳

