एक पिता के लिए उसका ज्येष्ठ-पुत्र, केवल उसका वारिस नहीं होता है, वह उसके संघर्षों का गवाह, उसके सपनों का विस्तार और उसके जीवन की सबसे पहली और सबसे बड़ी “सफलता” होता है।
स्मृतियों के वातायन से……
आज 6 फ़रवरी 2026 को, जब तुम जीवन के एक और नए बसंत यानि की उम्र के 33वें साल में प्रवेश कर रहे हो, तब मेरा मन अतीत की उन तमाम खूबसूरत यादों से भर आया है जो गत-वर्षों में हमने साथ जीते हुए संजोये हैं। विशेष रूप से, तुम्हारे जन्म से पहले का वह समय, जब डॉक्टर तुम्हारी माँ को लेकर ऑपरेशन थिएटर में जा चुकी थी, जन्म तुम्हारा अभी हुआ नहीं था, क्या होगा क्या नहीं ? इसको लेकर मन बहुत उद्विग्न था ? घबराहट के मारे, मैं हॉस्पिटल के बाहर, इधर से उधर टहल रहा था |
मेरा ह्रदय,भारतीय समाज में सदियों से प्रचलित एक मान्यता, जिसमें लोग,पहली संतान के रूप में,पुत्र की ही कामना करते हैं,से प्रभावित होकर,भी एक पुत्र की ही कामना कर रहा था, हालांकि ! दिमाग यह समझाने कि कोशिश कर रहा था- कि क्या फर्क पड़ता है, बेटा हो या बेटी | तभी बड़े भाईसाहब ने आकर मुझे बताया कि- “बधाई हो ! तुम्हें बेटा हुआ है” | इतना सुनना था कि मेरी आँखें ख़ुशी से भर आयीं | मेरी ख़ुशी का तो जैसे पारावार ही नहीं रहा था | सच बताऊँ, मेरे लिए पिता बनने का वह क्षण, “किसी उत्सव सरीखा” था |
उस समय बस एक ही इच्छा हो रही थी कि जल्दी से तुम्हें देख लूं, लेकिन जच्चा-बच्चा की सुरक्षा की दृष्टि से, हॉस्पिटल के नियम इसकी अनुमति नहीं दे रहे थे | तकरीबन 7-8 घंटे के इन्तजार् के बाद, मैं तुम्हें देख पाया था |
मुझे आज भी वह पल ठीक-ठीक याद है जब मैंने पहली बार तुम्हें देखा और अपनी बाहों में लिया था। अपनी पहली संतान और वो भी अपने पुत्र को अपनी बाहों में लेने का जो सुखद एहसास था , उसका स्मरण करने पर, मन आज भी, भावुक हो जाता है | पुत्र-प्रेम में कितनी शक्ति होती है, इसका प्रत्यक्ष और दुर्लभ कोटि का अनुभव, शायद पहली बार, मुझे उसी दिन हुआ था, जब तुम्हें अपनी गोद में लेकर मैंने दुलारा था |
जानते हो बेटा ! तुम्हारे मुख से निकला हुआ ‘पापा’ शब्द, जब पहली बार मैंने सुना था, तो वह मेरे लिए केवल ”एक- नाम” भर नहीं था, वो असल में, मेरे लिए धैर्य, त्याग और निस्वार्थ-स्नेह का कभी नहीं भूलने वाला, एक ऐसा अद्भुत-स्वर था, जिसकी मधुर-ध्वनि आज भी मेरे कानों को उतना ही सुखद एहसास कराने वाली होती है,जितनी कि तब थी | सच पूछो तो तुम मेरी उस कच्ची उम्र के साथी हो जब मैं खुद को गढ़ रहा था, और तुम उस गढ़ईया में, मेरे आत्मविश्वास की आपूर्ति का अपेक्षित-साधन |
आज जब कि समय के बहाव ने, तुम्हें तुम्हारे 33वें बसंत में प्रवेश करा दिया है, तब मुझे लगता है कि हमारे बीच के पिता-पुत्र के संबंधों में, औपचारिकता की सभी दीवारें ढह गईं हैं और तुम अब मेरे लिए, मेरे सबसे विश्वसनीय मित्र बन गए हो। शायद इसीलिए, आज जब भी कभी मैं, किसी उलझन में होता हूँ,कोई रास्ता दिखाई नहीं देता है और तुम आकर धीमे से मेरे कानों में ये यह कहते हो कि, “पापा,आप चिंता मत कीजिए, मैं हूँ ना ! सब ठीक हो जायेगा “, तो यकीन मानो मेरी सारी चिंताएं दूर हो जाती हैं, मानसिक-थकान ख़त्म हो जाती है, उलझनें उसी पल मिट जाती है। एक पिता के लिए इससे बड़े सुकून की बात और क्या ही हो सकती है कि उसका बेटा आगे बढ़कर उसकी सारी उलझनों को अपने ऊपर ले ले और उसका सहारा बनकर उसे समस्त चिंताओं से मुक्त कर दे |
उम्र के इस पड़ाव पर जब लोग मुझसे आकर, यह बताते हैं कि आपने अपने बच्चों की परवरिश बहुत अच्छी की है,उन्हें बहुत अच्छा संस्कार दिया है, तो मुझे बहुत गर्व होता है और इस बात का संतोष भी,कि तुमने न केवल अपने खानदान का नाम बल्कि मेरा नाम, और मेरे जीवन-मूल्यों को भी आगे बढ़ाया है।
तुम्हारी विनम्रता, मेहनत के प्रति तुम्हारा जुनून और छोटों के प्रति तुम्हारा स्नेह का भाव, यह सिद्ध करता है कि मैंने अपने व्यक्तिगत-जीवन में, चाहे जो कुछ भी कमाया हो, पर मेरी सबसे बड़ी पूंजी तो “तुम ही हो”।
मैंने देखा है, बड़े बेटे के रूप में तुम्हारा, अपनी इच्छाओं को, परिवार की खुशियों पर कुर्बान करना। अपने छोटे भाई-बहनों के लिए, तुम्हारा एक आदर्श प्रस्तुत करना और अपनी माँ के लिए,एक आज्ञाकारी-बेटे के रूप में, उसके चेहरे की मुस्कान का चिंता करना। ये और इस जैसे अनेक छोटे-छोटे गुण और भी तुम्हारे ऐसे हैं , जो तुम्हें तुम्हारी पीढ़ी के बच्चो से बहुत अलग करते हैं और तुम्हें एक एक महान व्यक्तित्व बनने की दिशा में अग्रसर करते हैं।
अंत में, बस यही कहना चाहता हूँ, बेटा ! तुम चाहे कितने भी बड़े क्यों न हो जाओ, कितने ही सफल क्यों न बन जाओ, मेरी आँखों में तुम हमेशा वही नन्हे बालक रहोगे, जिसने पहली बार मेरी उंगली पकड़कर चलना सीखा था। जीवन में कभी भी अंधेरा लगे या रास्ते कठिन लगें, तो मुड़कर पीछे देखना—तुम्हें तुम्हारे पीछे मैं एक ढाल बनकर खड़ा दिखाई दूंगा।
सर्वांत में, तुम्हारे स्वस्थ एवं दीर्घ-जीवन की मंगलकामना करता हूँ | तुम खुश रहो, जीवन की समस्त-मनोकामनाएं, तुम्हारी पूर्ण हों | तुम्हारा बड़ा नाम हो और तुम्हारी एक बड़ी पहचान हो,इश्वर से कामना करता हूँ |
जन्मदिन की पुनः पुनः बधाई |
Pranjal S Tripathi Kiran Tripathi

