मर्डर मिस्ट्री- 1 : गोरखपुर की वह रात जिसने पूरे यूपी को हिला दिया 👉
20 जनवरी 2016 _
रात के करीब बारह बज रहे थे। गोरखपुर की अशोकनगर कॉलोनी गहरी नींद में डूबी हुई थी। सड़क पर दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा था। कहीं-कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज सन्नाटे को चीर रही थी, लेकिन कॉलोनी के एक दोमंजिला मकान की दूसरी मंजिल पर नींद नहीं, बल्कि मौत जाग रही थी।
कमरे की लाइट बंद थी। दरवाजे के पीछे खड़ी एक महिला बार-बार घड़ी की तरफ देख रही थी। उसके चेहरे पर घबराहट नहीं थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह कई दिनों से इसी पल का इंतजार कर रही हो।
दूसरे कमरे में गहरी नींद में सो रहे थे डॉ. ओम प्रकाश यादव।
गोरखपुर के अशोकनगर मोहल्ले में बाकी लोग भी गहरी नींद में सो रहे थे, तब किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ घंटों बाद यही इलाका पुलिस की गाड़ियों, फोरेंसिक टीम और मीडिया की भीड़ से भर जाएगा। एक ही घर से पति और चार साल के बेटे के शव बरामद होंगे और शुरुआती जांच में यह मामला लूट के दौरान हुई हत्या जैसा दिखाई देगा। लेकिन असली कहानी उस रात से नहीं, बल्कि कई साल पहले शुरू हो चुकी थी।
यह कहानी है डॉ. ओम प्रकाश यादव, उनकी पत्नी अर्चना यादव और फेसबुक पर हुई एक दोस्ती की
डॉ. ओम प्रकाश यादव का बचपन संघर्षों में बीता। जब वह छोटे थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया। परिवार की आर्थिक और सामाजिक जिम्मेदारी उनके बड़े भाइयों के कंधों पर आ गई। दोनों भाइयों ने खुद कठिनाइयां झेलीं, लेकिन छोटे भाई की पढ़ाई कभी नहीं रुकने दी। ओम प्रकाश भी समझते थे कि परिवार ने उनके लिए कितना त्याग किया है। यही कारण था कि उन्होंने पढ़ाई में पूरी मेहनत की और आखिरकार नेत्र रोग विशेषज्ञ बन गए।
जब गोरखपुर में उन्होंने मरीजों का इलाज शुरू किया तो परिवार को लगा कि अब संघर्ष का दौर खत्म हो गया है। अब उनके घर में खुशियां ही खुशियां रहेंगी।
परिवार ने उनकी पहली शादी एक ऐसे परिवार में कराई, जो पहले गोरखपुर में रहता था, लेकिन बाद में सिंगापुर जाकर बस गया था। शादी धूमधाम से हुई। सबको लगा कि अब डॉक्टर साहब का घर बस गया, लेकिन यह रिश्ता ज्यादा दिन नहीं चल पाया।
सिंगापुर में पली-बढ़ी पत्नी को गोरखपुर का संयुक्त परिवार, यहां का रहन-सहन और जीवनशैली रास नहीं आई। छह महीने बाद ही वह वापस सिंगापुर चली गई। बाद में दोनों का रिश्ता खत्म हो गया।
पहली शादी टूटने के बाद ओम प्रकाश ने खुद को फिर काम में झोंक दिया। लेकिन परिवार चाहता था कि वह दोबारा जिंदगी की शुरुआत करें। इसी दौरान अर्चना यादव का रिश्ता आया।
अर्चना गाजीपुर मूल के एक परिवार से थी। उसके पिता दीपचंद यादव पीएसी में थे और बाद में लखनऊ में रहने लगे। परिवार को रिश्ता पसंद आया और शादी तय हो गई।
शादी के शुरुआती महीने सामान्य रहे। ओम प्रकाश अपने अस्पताल और मरीजों में व्यस्त रहते, जबकि अर्चना धीरे-धीरे नए परिवार को समझने की कोशिश करती रही, लेकिन कुछ ही समय बाद दोनों के बीच मतभेद शुरू हो गए।
अर्चना संयुक्त परिवार में नहीं रहना चाहती थी। उसे लगता था कि हर समय परिवार के बीच रहना उसकी आजादी छीन रहा है। उसने कई बार ओम प्रकाश से अलग घर लेने की बात कही।
ओम प्रकाश हर बार एक ही जवाब देते—
“जिन भाइयों ने मुझे इस मुकाम तक पहुंचाया, मैं उन्हें छोड़कर अलग नहीं रह सकता।”
आखिरकार परिवार ने बीच का रास्ता निकाला। एक ही मकान में अलग रसोई बना दी गई। बाहर से देखने वालों को लगता था कि सब ठीक है, लेकिन पति-पत्नी के रिश्ते में दरार पड़ चुकी थी।
समय बीता। 2012 में बेटे नितिन का जन्म हुआ।
घर में खुशियां लौटीं। दादा-दादी, चाचा और पूरा परिवार बच्चे पर जान छिड़कता था। सभी को उम्मीद थी कि अब पति-पत्नी के रिश्ते भी सुधर जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ओम प्रकाश पहले की तरह अस्पताल में व्यस्त रहते। अर्चना का ज्यादा समय घर में अकेले गुजरने लगा।
इसी अकेलेपन के बीच उसने फेसबुक पर अपना अकाउंट बनाया।
शुरुआत में यह सिर्फ समय बिताने का जरिया था। फिर एक दिन उसके पास फिरोजाबाद के रहने वाले अजय यादव की फ्रेंड रिक्वेस्ट आई। अर्चना ने बिना ज्यादा सोचे रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली। यहीं से शुरू हुई एक ऐसी बातचीत, जिसने आने वाले समय में दो लोगों की जान ले ली।
पहले सामान्य बातचीत होती थी। फिर रोज चैट होने लगी।
कुछ ही दिनों में दोनों एक-दूसरे के निजी जीवन की बातें करने लगे।
धीरे-धीरे फोन नंबर भी साझा हो गए। अब फेसबुक की चैट फोन कॉल में बदल चुकी थी। घंटों बातें होने लगीं। अर्चना अपने वैवाहिक जीवन की परेशानियां बताती। अजय उसे समझाता। दोनों के बीच भावनात्मक नजदीकियां बढ़ती चली गईं। कुछ महीनों बाद अजय ने मिलने का प्रस्ताव रखा। मुलाकात के लिए लखनऊ चुना गया, क्योंकि वहीं अर्चना का मायका था। अर्चना ने पति से कहा कि वह मायके जा रही है, लेकिन उस यात्रा का असली मकसद कुछ और था।
लखनऊ में दोनों पहली बार आमने-सामने मिले। वहीं उनका रिश्ता दोस्ती से आगे बढ़ गया। उस मुलाकात के बाद दोनों के बीच दूरियां लगभग खत्म हो गईं। अब यह सिलसिला नियमित हो गया।
कभी अर्चना लखनऊ जाती, तो कभी अजय गोरखपुर आने लगा।
हैरानी की बात यह थी कि अजय कई बार ओम प्रकाश के घर भी रुका। अर्चना ने परिवार को बताया कि वह दूर का रिश्तेदार है।
घर के लोगों ने उस पर कभी शक नहीं किया। उधर ओम प्रकाश को जरूर महसूस होने लगा था कि उनकी पत्नी बदल रही है। मोबाइल अब उसके हाथ से शायद ही कभी छूटता था। घंटों किसी से बातें होतीं। पति कुछ पूछते तो बहस शुरू हो जाती। रिश्तों में खामोशी बढ़ती गई।
दिसंबर 2015 तक स्थिति इतनी खराब हो चुकी थी कि पति-पत्नी ने अलग-अलग कमरों में सोना शुरू कर दिया। यहीं से कहानी ने सबसे खतरनाक मोड़ लिया।
अर्चना और अजय अब सिर्फ एक-दूसरे से प्यार नहीं करते थे। वे साथ रहने के सपने भी देखने लगे थे, लेकिन उनके रास्ते में एक ही व्यक्ति था—
डॉ. ओम प्रकाश यादव।
धीरे-धीरे दोनों ने तय कर लिया कि अगर नई जिंदगी शुरू करनी है, तो पहले इस रास्ते के कांटे को हटाना होगा। यहीं से एक ऐसी साजिश जन्म लेती है, जो कुछ ही दिनों बाद गोरखपुर के सबसे चर्चित दोहरे हत्याकांड में बदल जाती है…
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उधर अर्चना और अजय यादव का रिश्ता लगातार गहरा होता जा रहा था। फोन पर घंटों बातें होतीं। भविष्य के सपने बुने जाते। लेकिन हर बार एक ही सवाल सामने आकर खड़ा हो जाता—अगर साथ रहना है तो कैसे?
दोनों जानते थे कि जब तक डॉ. ओम प्रकाश जिंदा हैं, उनकी यह दुनिया कभी पूरी नहीं होगी। यहीं से हत्या की साजिश ने आकार लेना शुरू किया।
कई दिनों तक दोनों ने बातचीत की। कब मौका मिलेगा? कैसे हत्या होगी? पुलिस को कैसे गुमराह किया जाएगा? हर बात पर चर्चा हुई। आखिरकार 20 जनवरी 2016 की तारीख तय हुई।
उस दिन अशोकनगर कॉलोनी में रहने वाले एक परिचित के यहां शादी की सालगिरह का कार्यक्रम था। परिवार के लगभग सभी सदस्य वहां जाने वाले थे। अर्चना ने पहले से योजना बना रखी थी। उसने कहा कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए वह घर पर ही रहेगी। असल वजह कुछ और थी।
उसने अजय यादव को पहले ही गोरखपुर बुला लिया था।अजय ट्रेन से गोरखपुर पहुंचा और शाम ढलने से पहले चुपचाप घर में दाखिल हो गया। अर्चना ने उसे अपने कमरे में छिपा दिया।
रात करीब दस बजे डॉ. ओम प्रकाश अपने चार वर्षीय बेटे नितिन के साथ समारोह से लौटे। उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि जिस घर में वह रोज की तरह लौटे हैं, उसी घर में उनकी मौत उनका इंतजार कर रही है।
उन्होंने बेटे को साथ लेकर खाना खाया और अपने कमरे में जाकर सो गए। घर में फिर सन्नाटा छा गया। घड़ी की सुइयां धीरे-धीरे रात के बारह बजे के करीब पहुंचने लगीं। अर्चना ने अपने कमरे का दरवाजा खोला। अजय बाहर आया। उसके हाथ में एक हथौड़ा था।
दोनों दबे पांव उस कमरे की तरफ बढ़े, जहां डॉ. ओम प्रकाश गहरी नींद में थे।
कमरे में सिर्फ हल्की रोशनी थी। बिस्तर पर डॉक्टर पेट के बल सो रहे थे। अजय कुछ क्षण तक उन्हें देखता रहा। शायद उसके मन में भी एक पल के लिए डर आया हो, लेकिन अगले ही पल उसने दोनों हाथों से हथौड़ा उठाया और पूरी ताकत से डॉक्टर के सिर के पीछे वार कर दिया। भारी आवाज के साथ पहला वार हुआ।
डॉ. ओम प्रकाश संभल भी नहीं पाए थे कि दूसरा वार हुआ।
फिर तीसरा। कुछ ही सेकंड में उनका शरीर निश्चल हो गया।
कमरे में चारों तरफ खून फैल चुका था, लेकिन यह वारदात अभी खत्म नहीं हुई थी।
बिस्तर के दूसरे कोने पर चार साल का नितिन सो रहा था। हथौड़े की आवाज सुनकर उसकी आंख खुल गई। उसने सामने पिता को खून से लथपथ देखा। वह जोर-जोर से रोने लगा। उसकी आवाज सुनकर अर्चना घबरा गई। उसने तुरंत अजय से कहा—
“इसने सब देख लिया है… इसे भी खत्म कर दो।”
अजय ने बच्चे की तरफ देखा। उसने धीरे से सिर हिलाया।
“नहीं… मैं बच्चे को नहीं मार सकता।”
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया, लेकिन अर्चना के चेहरे पर कोई झिझक नहीं थी। उसने बेटे को गोद में उठा लिया। जिस मां की गोद बच्चे के लिए दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह होती है, उसी गोद में उस रात मौत बैठी थी।
उसने दोनों हाथों से नितिन का गला दबाना शुरू कर दिया।
बच्चा छटपटाता रहा। उसके छोटे-छोटे हाथ हवा में लहराते रहे।
लेकिन अर्चना के हाथ ढीले नहीं पड़े। कुछ ही मिनटों बाद उसकी सांसें भी थम गईं। अब कमरे में दो लाशें थीं।
पति…और बेटा। दोनों की मौत हो चुकी थी। कुछ देर तक कमरे में गहरा सन्नाटा पसरा रहा। इसके बाद दोनों ने खुद को संभाला।
अब अगला चरण शुरू होना था—पुलिस को गुमराह करने का।
उन्होंने पूरे कमरे का सामान बिखेर दिया। अलमारी खोल दी।
उसमें रखी नकदी निकाल ली। कपड़े इधर-उधर फेंक दिए।
दरवाजे की कुंडी तोड़ दी, ताकि पहली नजर में मामला लूटपाट का लगे।
योजना के मुताबिक अर्चना दूसरे कमरे में चली गई। अजय रात के अंधेरे में घर से निकल गया। उसे विश्वास था कि अब पुलिस कभी सच तक नहीं पहुंच पाएगी, लेकिन हर अपराध अपने पीछे कोई न कोई निशान छोड़ जाता है।
इस वारदात में भी एक छोटी-सी गलती हुई थी, जो आगे चलकर पूरी साजिश का सबसे बड़ा सबूत बनने वाली थी।
20 जनवरी 2016 की वह खूनी रात बीत चुकी थी। अब 21 जनवरी की सुबह होने वाली थी। अर्चना यादव दूसरे कमरे में थी। योजना के मुताबिक उसे ऐसा दिखाना था जैसे उसे रात में हुई घटना की कोई जानकारी ही न हो। दूसरी तरफ अजय यादव गोरखपुर छोड़ने की तैयारी में था। उसे भरोसा था कि अब पुलिस का शक लुटेरों पर जाएगा और कुछ दिनों बाद मामला ठंडा पड़ जाएगा।
लेकिन अपराधी अक्सर यह भूल जाते हैं कि घटनास्थल कभी झूठ नहीं बोलता।
सुबह करीब छह बजे घर की तीसरी मंजिल पर निर्माण कार्य के लिए पहुंचे मजदूर सीढ़ियां चढ़ रहे थे। तभी उनकी नजर दूसरी मंजिल के खुले कमरे की तरफ गई। कमरे के भीतर बिस्तर पर खून ही खून दिखाई दे रहा था।
एक मजदूर घबराकर चिल्लाया। कुछ ही मिनटों में पूरे मोहल्ले में हड़कंप मच गया। घर के नीचे रहने वाली डॉ. ओम प्रकाश की मां बागेश्वरी देवी और पड़ोसी ऊपर पहुंचे। कमरे में बेटे और पोते की हालत देखकर मां के पैरों तले जमीन खिसक गई।
उधर दूसरे कमरे से अर्चना भी बाहर आई। वह जोर-जोर से रो रही थी और बार-बार कह रही थी— “क्या हुआ… दरवाजा खोलो… क्या हुआ?”
कुछ ही देर में शाहपुर थाने की पुलिस मौके पर पहुंच गई। देखते ही देखते पूरा इलाका पुलिस छावनी में बदल गया।
डॉ. ओम प्रकाश एक जाने-माने नेत्र रोग विशेषज्ञ थे। ऊपर से उनके बड़े भाई यूपी पुलिस में इंस्पेक्टर थे। मामला संवेदनशील था।
उसी समय सूचना लखनऊ तक पहुंच गई। क्योंकि अर्चना के पिता दीपचंद यादव उस समय मुख्यमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े रहे थे, इसलिए वरिष्ठ अधिकारियों पर जल्द से जल्द केस सुलझाने का दबाव बढ़ गया।
घटनास्थल की जांच शुरू हुई। पहली नजर में मामला डकैती जैसा लग रहा था। अलमारी खुली हुई थी। सामान बिखरा पड़ा था।
नकदी गायब थी, लेकिन जांच अधिकारियों की नजर एक ऐसी चीज पर पड़ी, जिसने पूरी कहानी का रुख बदल दिया।
कमरे की कुंडी बाहर से नहीं, बल्कि अंदर से टूटी हुई थी। अगर लुटेरे बाहर से आए होते तो कुंडी अंदर से कैसे टूटती?
यहीं से पुलिस को पहली बार लगा कि मामला घर के किसी सदस्य से जुड़ा हो सकता है। इसके बाद पुलिस ने परिवार से बातचीत शुरू की।
डॉ. ओम प्रकाश की मां ने बताया कि पिछले कई महीनों से पति-पत्नी के बीच लगातार विवाद चल रहा था। दिसंबर 2015 से दोनों अलग-अलग कमरों में सो रहे थे। यह जानकारी पुलिस के लिए बेहद महत्वपूर्ण थी। अब जांच का फोकस अर्चना की तरफ मुड़ गया।
हालांकि मामला बेहद संवेदनशील था। पुलिस बिना मजबूत सबूत के अर्चना से सख्ती नहीं करना चाहती थी। इसलिए सबसे पहले उसकी कॉल डिटेल निकलवाई गई। मोबाइल रिकॉर्ड ने कई सवाल खड़े कर दिए।
एक नंबर पर लगातार लंबी-लंबी बातचीत हुई थी। यह नंबर फिरोजाबाद निवासी अजय यादव का निकला। जांच आगे बढ़ी तो फेसबुक चैट भी पुलिस के हाथ लगी। इन डिजिटल साक्ष्यों ने दोनों के बीच गहरे संबंधों की पुष्टि कर दी।
अब पुलिस को सिर्फ अजय की तलाश थी। कुछ ही समय बाद पुलिस ने उसे फिरोजाबाद से गिरफ्तार कर लिया। शुरुआती पूछताछ में वह खुद को निर्दोष बताता रहा, लेकिन जब पुलिस ने उसके सामने कॉल रिकॉर्ड, फेसबुक चैट और दूसरे साक्ष्य रखे तो उसका आत्मविश्वास टूट गया।
घंटों पूछताछ के बाद उसने पूरी साजिश स्वीकार कर ली। उसने बताया कि हत्या की योजना पहले से बनाई गई थी। 20 जनवरी को वह ट्रेन से गोरखपुर पहुंचा। अर्चना ने उसे घर में छिपाया। रात में दोनों ने मिलकर डॉ. ओम प्रकाश की हत्या की।
उसने यह भी बताया कि जब चार साल का नितिन जाग गया तो अर्चना ने उससे बच्चे को मारने के लिए कहा, लेकिन उसने इनकार कर दिया। इसके बाद अर्चना ने खुद अपने बेटे का गला दबा दिया।
पुलिस के अनुसार, पूछताछ में यह भी सामने आया कि हत्या से पहले और वारदात के बाद दोनों ने शारीरिक संबंध बनाए थे।
22 जनवरी 2016 को वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पूरे दोहरे हत्याकांड का खुलासा कर दिया। इसके बाद अर्चना यादव को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
जेल में जब दूसरी महिला बंदियों को पता चला कि अर्चना ने अपने ही बेटे की हत्या की है, तो उन्होंने उससे सवाल पूछा—”तुमने अपने ही बच्चे को क्यों मार दिया?”
बताया जाता है कि अर्चना ने बिना किसी पछतावे के जवाब दिया—
“मैंने उसे पैदा किया था… मैंने ही मार दिया… इसमें तुम्हारा क्या?”
यह सुनते ही कई महिला बंदियां गुस्से से भर उठीं। उन्होंने अर्चना पर हमला कर दिया। जेल कर्मचारियों ने किसी तरह बीच-बचाव कर उसे वहां से निकाला।
इसके बाद मामला अदालत पहुंचा। करीब चार साल तक सुनवाई चली। पुलिस ने अदालत में कॉल डिटेल, फेसबुक चैट, परिस्थितिजन्य साक्ष्य, घटनास्थल से मिले सबूत और गवाहों के बयान पेश किए। बचाव पक्ष ने भी अपनी दलीलें दीं, लेकिन अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों को पर्याप्त माना।
17 अक्टूबर 2020 को गोरखपुर की अपर सत्र अदालत ने अपना फैसला सुनाया। अदालत ने अर्चना यादव और अजय यादव दोनों को हत्या का दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। साथ ही दोनों पर जुर्माना भी लगाया।
इस फैसले के साथ गोरखपुर के सबसे चर्चित दोहरे हत्याकांडों में से एक का कानूनी अध्याय समाप्त हुआ, लेकिन यह मामला आज भी लोगों के जेहन में कई सवाल छोड़ जाता है।
एक डॉक्टर, जिसने संघर्ष करके अपनी पहचान बनाई…
एक चार साल का मासूम, जिसने बिना किसी गलती के अपनी जान गंवा दी… और एक ऐसा प्रेम संबंध, जिसने दो जिंदगियां छीन लीं और दो लोगों की पूरी जिंदगी सलाखों के पीछे पहुंचा दी। 🤌🤌

