माता–पिता को विवाहित बेटी के घर का अन्न–जल ग्रहण करना चाहिए या नहीं ?
समाज में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि बेटी के घर का पानी पीना या भोजन करना पाप क्यों माना जाता है ?
आइए, शास्त्रों और ब्रज की एक प्रचलित कथा के माध्यम से इसे समझते हैं और विस्तार से जानते हैं।
शास्त्रीय नियम क्या है:……..
कन्यादान के समय माता-पिता अपनी पुत्री का दान कर उसे वर पक्ष को सौंप देते हैं। शास्त्र कहता है कि “दान दी हुई वस्तु का उपभोग दाता नहीं कर सकता।” इसलिए, बेटी के घर का अन्न-जल माता-पिता व बड़े भाई के लिए वर्जित माना गया है।
कब ग्रहण कर सकते हैं भोजन?
शास्त्रों (आद्यवह्नि-पुराण) के अनुसार, यह नियम तब तक लागू रहता है जब तक कन्या की संतान (पुत्र या पुत्री) न हो जाए।
संतान होने पर छूट क्यों?
क्योंकि दामाद ‘पितृ-ऋण’ से मुक्त होने के लिए कन्या स्वीकार करता है। संतान ( विशेषकर नाती – नातिन ) के जन्म से वह ऋण उतर जाता है और नाना – नानी का अधिकार पुनः स्थापित हो जाता है। नाती अपने नाना-नानी का तर्पण भी कर सकता है।
निष्कर्ष……..
दौहित्र (बेटी की संतान) का मुख देखने के बाद माता-पिता निसंकोच बेटी के घर भोजन ग्रहण कर सकते हैं।
*लेख – पंडित राजाराम चक्रवर्ती महाकाल उज्जैन मध्य प्रदेश*

