उस 18 साल के बच्चे ने फाँसी के फंदे को हाथ में लेकर जल्लाद से पूछा— ‘साहब, क्या ये मेरे गले में फिट आएगा?
कहीं ये ढीला तो नहीं रहेगा?
जल्लाद की आँखों में आँसू आ गए, उसने मुँह फेर लिया… क्योंकि उसने पहली बार मौत की आँखों में ऐसी मासूमियत और मुस्कान देखी थी।”
शहादत की वो कहानी जिसे सुनकर पत्थर भी रो पड़े
30 अप्रैल 1908 को मुजफ्फरपुर की सड़कों पर धमाका हुआ। खुदीराम बोस ने उस क्रूर जज किंग्सफोर्ड की बग्घी पर बम फेंका था, जिसने न जाने कितने भारतीयों की पीठ को कोड़ों से उधेड़ दिया था। निशाना चूका, किंग्सफोर्ड बच गया, पर उस धमाके ने अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दीं। 18 साल का खुदीराम पकड़ा गया।
अदालत का वो मंजर जब जज ने मौत की सजा सुनाई, तो खुदीराम मुस्कुरा दिए। जज हैरान था, उसने पूछा— “क्या तुम्हें डर नहीं लगता?”
खुदीराम ने सीना तानकर कहा— “डर? साहब, अगर आप थोड़ा समय दें, तो मैं आपको भी बम बनाना सिखा सकता हूँ ताकि आप अपनी गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ सकें।
माँ के साथ वो आखिरी (काल्पनिक) संवाद:
फाँसी से एक रात पहले, जेल की उस अंधेरी कालकोठरी में खुदीराम ने अपनी आँखें बंद कीं और अपनी माँ को याद किया।
खुदीराम: “माँ, मैं कल तेरे पास आ रहा हूँ। देखो, अंग्रेज़ों ने मेरे स्वागत के लिए फाँसी का फंदा सजाया है।”
माँ (मन की आवाज़): “बेटा, इतनी जल्दी? अभी तो तेरी दाढ़ी भी नहीं फूटी, अभी तो तूने दुनिया देखी भी नहीं। क्या तुझे मौत से डर नहीं लगता?”
खुदीराम (मुस्कुराते हुए): “माँ, मौत से कैसा डर? ये फंदा तो वो पालना है जिसमें झूलकर मैं तेरी गोद में दोबारा जन्म लूँगा। बस एक दुआ करना माँ… कि जब मैं दोबारा पैदा होऊँ, तो फिर से इसी भारत माँ की मिट्टी में जन्म लूँ और फिर से इसकी आज़ादी के लिए कुर्बान हो जाऊँ।”
फाँसी की वो सुबह
11 अगस्त 1908… सुबह के 6 बजे। खुदीराम बोस ने अपने हाथ में ‘भगवद गीता’ ली, फाँसी के चबूतरे पर चढ़े और जल्लाद से बस इतना कहा— “घबराओ मत भाई, अपना काम करो। मैं तो बस अपनी माँ से मिलने जा रहा हूँ।” जैसे ही फंदा खिंचा, एक चिराग बुझ गया… ताकि आज करोड़ों घर रोशन रह सकें।
आज का कड़वा सच:
आज 26 जनवरी है। हम तिरंगा फहराएंगे, फोटो खिंचवाएंगे, पर क्या हम उस 18 साल के बच्चे के उस बलिदान को याद करेंगे जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी सिर्फ एक शब्द ‘वन्दे मातरम’ के लिए लुटा दी? क्या हमें याद है कि उस माँ की गोद कितनी सूनी हुई होगी, ताकि आज हमारी माँ सुरक्षित रह सके?
मेरे भाई-बहनों, दोस्तों आज का गणतंत्र दिवस उन हज़ारों ‘खुदीरामों’ के लहू से रंगा है। आज जब आप आज़ादी की सांस लें, तो एक पल के लिए उस फंदे को याद करना जो एक बच्चे के कोमल गले में सिर्फ इसलिए कस दिया गया क्योंकि उसे अपने देश से प्यार था। 🥀
आज इस लेख को पढ़ते हुए दुनिया को बताएं कि हम अपने वीर सपूतों को भूले नहीं हैं।
‘वन्दे मातरम’ और ‘खुदीराम बोस अमर रहें’ इस महान बलिदानी को अपनी आँखों के आँसुओं से श्रद्धांजलि दें। देखते हैं कितने सच्चे हिंदुस्तानी आज अपनी मिट्टी को याद करते हैं।
💕आपकी अपनी SUMAN P💕

