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जब प्रख्यात भोजपुरी गायक मनोज तिवारी (रिंकिया के पापा फेम) सांसद बने तो जनता ने उनका खूब फायदा उठाया,
कोई भी कार्यक्रम होता था तो चट्ट देनी उनको बुलाकर मुख्य/विशिष्ट अतिथि बनाकर एकाध ठु माला फाला आल शाल दे माइक थमा देती थी कि कुछ सुनाइए और अगले को मुख्य/ विशिष्ट अतिथि धर्म का निर्वाह करते हुए चार छः गाना सुनाना ही पड़ता था,
उतने में ही आयोजकों का काम हो जाता था और इनका काम लग जाता था,
आयोजकों के पैसे बच जाते थे,
जब तक मनोज तिवारी ने इस खेल को समझा उनके दर्जनों प्रोग्राम निपट चुके थे,
सो अगली जनसभा में जैसे ही मंच संचालिका जो बाईचांस एक अध्यापिका भी थी उन्होंने मुख्य/विशिष्ट अतिथि बने मनोज तिवारी से गाने को कहा तो वह हुक्का पानी लेकर उनके ऊपर चढ़ बैठे कि आपकी हिम्मत कैसे हुई मुख्य/विशिष्ट अतिथि से इस तरह की फरमाइश करने की,
मैं मुख्य/विशिष्ट अतिथि हूं,मेरा एक प्रोटोकॉल है ऐसे ही थोड़े न कहीं भी मुंह उठाकर गाना गाने लगूँगा,
इसका वीडियो भी बड़ा वायरल हुआ था,जनता समझ गई कि अब दाल नहीं गलने वाली सो लोगों ने हंसराज हंस को पकड़ लिया,
कुछ उसी तर्ज पर शहर के परम घाघ व्यक्तित्व के स्वामी Akhilesh Ojha जी ने दिमाग लगाया,
महात्मा गाँधी डिग्री कालेज में होने वाले नागरिक सुरक्षा के कार्यक्रम में उनको कुछ कवि बुलाने थे,
बजट कम था तो उन्होंने चाल चली और मुझे विशिष्ट अतिथि बना दिया और मैं “भोला भाला” उनके जाल में फंस भी गया,
और उन्होंने बिल्कुल फीरी में मेरा विशिष्ट अतिथीय उद्बोधन और व्यंग्य पाठ दुन्नो करा वाहवाही बटोर ली,
हालांकि मैने वहां कहा कि पहले मैं भी कवि कुल में ही था पर मैंने अपना चाल चलन सुधार लिया तो अब मैं विशिष्ट अतिथि बन गया हूं सो हे कविओं आप लोग भी अपना चाल चलन सुधारो,
जबकि वास्तविकता तो यह है कि भारत वर्ष में लोग जब चाल चलन बिगाड़ते हैं तब ही वो विशिष्ट/ मुख्य अतिथि बन पाते हैं,
उद्बोधन के दौरान सबसे पहले मैने वहां के बोर्ड की तरफ इशारा किया कि आप लोग इतने महत्वपूर्ण पद पर हो व हिंदी का कार्यक्रम कर रहे हो और बोर्ड ही गलत लिखा हुआ है,
आप लोगों ने सुरक्षा लिखवाया हुआ है जबकि यह असल शब्द “सुरक्शा” है,
जिस तरह मोदी जी ने विकलांग शब्द को दिव्यांग बना लोकप्रिय कर दिया उसी तरह…. अब सुरक्षा का सुरक्शा है,






नई समझे,
सो तत्काल बोर्ड बदले जाएं और हां शिक्षा वाले भी, उसे भी “शिक्शा” किया जाए,
कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध कवियत्री Chetna Pandey जी ने गाया कि मेरा “आलम” भी बदलेगा इसपर मैंने उनसे कहा कि जिस तरह बीजेपी की गवर्नमेंट धुआंधार बन रही है कुछ दिन में आलम सलीम सुलेमान सब लोग बदल जाएंगे,
हटटे कट्टे गीतकार प्रदीप मिश्रा जी ने गीत पढ़ा कि “जो आज हैं और कल नहीं होंगे”, गीत तो खैर जो था वो था पर उनको सलाह है यह गीत वह कभी किसी सरकार के नुमाइंदे/ दबदबा टाइप किसी दबंग माननीय के सामने मत सुना देंगे वरना समझ ही रहे हैं क्या होगा,
कवियत्री निशा राय जी ने सुदामा और कृष्ण की मित्रता का कुछ यूँ वर्णन किया कि मेरी आंखों से आंसू टाइप आ गए,
यह आंसू दरअसल कविता सुनकर नहीं उन मित्रों की याद में आए जो उधार लेकर फरार चल रहे हैं और अक्सर फेसबुक पर नया वाहन एक और मंजिल निर्माण होने की सूचना देकर बधाइयां बटोरते हैं,
कुल मिलाकर कार्यक्रम बेहद शानदार रहा उसके बावजूद मैं अखिलेश ओझा जी की कड़ी निंदा एवं तीव्र भर्त्सना करता हूं, क्योंकि पिछली बार इन्होंने इस कार्यक्रम में बाकायदा शानदार भोजन करवाया था जबकि अबकी बार सांकेतिक स्वल्पाहार पर ही टिका दिया,
इस पोस्ट के माध्यम से इनको कड़ी चेतावनी देता हूं की यथाशीघ्र उस दावत की प्रतिपूर्ति का इंतजाम करें वरना परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें,
आखिर खरमास में हम लोगों का क्या होगा..
आखिर में
मुझे दुनिया वालों,
विशिष्ट अतिथि न समझो,
विशिष्ट अतिथि नहीं हूं,
फसाया गया हूं…. नई समझे??

