शादी के बाद ज़बरदस्त सेक्स इस बात की गारेंटी नहीं देता कि शादी अच्छी चलेगी
मेरी शादी को पाँच साल हो चुके थे। पति बुरा नहीं था—बल्कि सच कहूँ तो बहुत ठीक था।
लेकिन “ठीक” होना अक्सर हमें दिखाई नहीं देता, जब हम रोज़-रोज़ की बातों में उलझे रहते हैं।
छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा, ताने, शिकायतें—कभी उसे लगता मैं ज़्यादा बोलती हूँ,
कभी मुझे लगता वो मुझे समझता नहीं।
एक दिन झगड़ा कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया। शब्द ज़हरीले हो गए। मैंने गुस्से में बैग उठाया और अपनी विधवा दोस्त रेखा के घर चली गई। रेखा… जो पिछले तीन साल से अकेली रह रही थी।
पहले दिन मुझे लगा, अच्छा हुआ। शांति है। कोई टोका-टाकी नहीं, कोई सवाल नहीं।
लेकिन ये “शांति” सिर्फ़ पहले दिन की थी।
सुबह आँख खुली तो कोई चाय देने वाला नहीं था। खुद उठी, खुद चाय बनाई। ठीक है, इसमें क्या है—मैं भी तो करती ही हूँ।
दूसरे दिन सब्ज़ी खत्म हो गई। धूप तेज़ थी। बाज़ार दूर था। रेखा ने बस इतना कहा—
“मुझे तो रोज़ जाना पड़ता है।”
उसके स्वर में शिकायत नहीं थी। आदत थी।
मैं उसके साथ गई। सब्ज़ी लाई, थैला भारी लग रहा था। रास्ते में समझ आया—ये रोज़ का बोझ है, जो वो अकेले उठाती है।
घर आकर कपड़े धोने थे। मशीन खराब थी। हाथ से धोए। उंगलियाँ सिकुड़ गईं। पीठ दर्द करने लगी।
रेखा चुपचाप अपने काम में लगी रही। न आह, न अफ़सोस।
शाम को घर की ग्रॉसरी खत्म हो गई थी। आटा, तेल, दाल—सब कुछ गिन-गिन कर चलाना पड़ता था।
मैंने पूछा—
“कभी थकती नहीं हो?”
उसने बस मुस्कुरा कर कहा—
“थकने का विकल्प नहीं है।”
उस रात मुझे नींद नहीं आई।
मुझे याद आया—मेरे पति का कहना, “सब्ज़ी मैं ले आता हूँ।”
“रहने दो, कपड़े मैं डाल दूँगा।”
“कल ऑफिस से लौटते हुए आटा ले आऊँगा।”
तब ये सब मुझे मामूली लगता था। जैसे उसका फ़र्ज़ हो।
लेकिन उस घर में, उस अकेलेपन में समझ आया—ये फ़र्ज़ नहीं था। ये साथ था।
रेखा के घर में हर चीज़ अपने आप नहीं होती थी। हर काम के पीछे उसकी अकेली मौजूदगी थी। कोई साझा बोझ नहीं, कोई आधा-आधा नहीं।
ज़िंदगी वहाँ चल तो रही थी, पर सहारे के बिना।
तीसरे दिन मैंने अपने पति को फ़ोन किया। आवाज़ भारी थी मेरी।
मैंने सिर्फ़ इतना कहा—
“घर आना चाहती हूँ।”
उसने कोई सवाल नहीं पूछा। बस कहा—
“मैं लेने आ जाऊँ?”
उस पल मुझे समझ आया—पति का होना, सिर्फ़ झगड़ों का होना नहीं है।
वो एक ऐसा कंधा है, जिस पर ज़िंदगी का वज़न थोड़ा हल्का हो जाता है।
ऐसा हाथ, जो रोज़ के साधारण कामों को भी आसान बना देता है।
और ऐसा रिश्ता, जिसकी क़द्र अक्सर हम तभी समझते हैं, जब उसे कुछ दिनों के लिए खोकर देखते हैं।
आज भी झगड़े होते हैं। मैं ये नहीं कहती सब परफेक्ट है।
लेकिन अब जब सब्ज़ी का थैला भारी लगता है, या कपड़े धोते हुए हाथ दुखते हैं—
तो दिल अपने आप कहता है,
“ज़िंदगी में पति का होना, सच में किसी आशीर्वाद से कम नहीं है।”

