🚩⚔️ आज से ठीक 265 वर्ष पूर्व …14 जनवरी 1761 …
मकर संक्रान्ति का वह पावन सूर्य, जिसे अंधकार मिटाना था, नियति ने उसे भारत के हृदय पर भीषणतम रक्तपात का साक्षी बना दिया। पानीपत की वह माटी आज भी मौन नहीं है; वह चीखती है—उन दो लाख हुतात्माओं के बलिदान पर, जिन्होंने राष्ट्र की वेदी पर अपने प्राणों का अंतिम तर्पण कर दिया।
मेरे तीन वर्षों के अनवरत तप…….
कठोर शोध और अश्रुओं से भीगी स्याही का प्रतिफल, मेरा पहला ऐतिहासिक उपन्यास— ‘संक्रान्ति का संहार – पानीपत की महागाथा’ शीघ्र ही आप सबके सम्मुख होगा।
यह केवल सैन्य संघर्ष की गाथा नहीं है, यह मानवीय संवेदनाओं के चरम का आख्यान है।
🔥 शौर्य का शिखर – यह गाथा है सदाशिवराव भाऊ के उस अभेद्य संकल्प की, विश्वासराव की उस किशोर शहादत की और मज़हब से ऊपर राष्ट्रभक्ति को रखने वाले अद्वितीय योद्धा इब्राहिम खान गार्दी की उस निष्ठा की तथा “बचेंगे तो और भी लड़ेंगे” के वह उद्घोष की, को आज भी पानीपत की हवाओं में गूँजता है।
♥️ प्रेम की पराकाष्ठा – युद्ध की दहकती लपटों के बीच विट्ठल-कल्याणी और यशवंत-संयुक्ता जैसे पात्रों के माध्यम से यह उपन्यास उस प्रेम का साक्षी है, जो मृत्यु के द्वार पर भी समाप्त नहीं होता। जहाँ व्यक्तिगत स्वप्न राष्ट्र की वेदी पर समिधा बन गए, वहाँ प्रेम ही था जिसने विभीषिका के बीच भी मनुष्यता को जीवित रखा।
😭 शोक का संताप – यह उन अनाम तीर्थयात्रियों, स्त्रियों और बच्चों के मौन रुदन की कथा है, जिनकी भूख और प्यास इतिहास की सबसे गहरी टीस बन गई। बेजुबान पशुओं का क्रंदन और यमुना के तट पर उस सर्द रात का सन्नाटा आपको उस विभीषिका के केंद्र में खड़ा कर देगा।
🩸 इतिहास का सबसे खूनी एक-दिवसीय महासमर –
सांख्यिकी और साक्ष्यों के आधार पर, यह केवल भारत का नहीं, बल्कि विश्व इतिहास का सबसे अधिक रक्त-रंजित युद्ध था। जहाँ आधुनिक शस्त्रों के अभाव में भी, केवल एक दिन के भीतर लगभग दो लाख प्राणों की आहुति दी गई। प्रति घंटा सात हजार मौतों की वह भयावह दर, मानव इतिहास के किसी भी अन्य एकल संघर्ष में दर्ज नहीं है। यह युद्ध नहीं, साक्षात् महाकाल का वह अट्टहास था जिसने यमुना के जल को रक्त से लाल कर दिया।
🚩 उत्थान का गर्व – अक्सर इतिहासकार इसे अंत कहते हैं, पर यह अंत नहीं, पुनरुत्थान था! पानीपत की राख से ही महादजी शिंदे और नाना फडणवीस जैसे सूर्यपुत्रों का जन्म हुआ, जिन्होंने मात्र 10 वर्ष बाद दिल्ली के लाल किले पर पुनः जरी पटका फहराकर सिद्ध किया कि राष्ट्र पराजय में भी अमर रह सकते हैं।
जब आप इस ग्रंथ के पृष्ठ पलटेंगे, तो यह केवल पठन नहीं अपितु साक्षात्कार होगा—जैसे-जैसे आप शब्दों की गहराई में उतरेंगे, आपको अपने आस-पास पानीपत की धूल उड़ती महसूस होगी। आपको सुनाई देगी उन हज़ारों घोड़ों की हिनहिनाहट, जो पुणे के शनिवारवाड़ा से दिल्ली की देहलीज तक स्वाभिमान का संदेश लेकर दौड़े थे। आपके कानों में उन तलवारों की खनखनाहट गूँजेगी, जो तब भी म्यान में नहीं गई थीं जब हाथ भूख से काँप रहे थे। आपको अनुभव होगा उस हाड़ कंपा देने वाली सर्द रात का सन्नाटा, जहाँ यमुना के तट पर भूखे मराठा वीरों ने अपनी ढालों को तकिया बनाकर अंतिम रात काटी थी—पर उनके भीतर की वह दहाड़ शांत नहीं हुई थी, जो मृत्यु के आलिंगन में भी ‘हर-हर महादेव’ के उद्घोष के साथ अफ़गानी बर्बरता को चुनौती दे रही थी।
यह उपन्यास उन महावीरों को समर्पित है जिनके घोड़ों ने सिंधु का पानी पिया, जिन्होंने अटक से कटक तक भारत को एक सूत्र में बांधा और मर कर भी अब्दाली को भारत छोड़ने पर विवश कर दिया।
📖 उपन्यास – ‘संक्रान्ति का संहार – पानीपत की महागाथा’
✍️ लेखक – डॉ. विद्यासागर उपाध्याय
🚩 शीघ्र प्रकाशित 🚩

