महाभारत का युद्ध समाप्ति की ओर था।
कुरुक्षेत्र की रणभूमि में भीष्म पितामह शरशैया पर पड़े थे।
उनके शरीर में असंख्य बाण धँसे हुए थे।
तनिक-सा भी हिलना असहनीय वेदना को जन्म देता और बाणों के छेदों से रक्त की धार बह निकलती।
मृत्यु उनके समीप थी, पर इच्छामृत्यु का वरदान उन्हें जीवित रखे हुए था।
ऐसी अवस्था में उनसे मिलने अनेक ऋषि-मुनि, योद्धा और राजा आते-जाते थे।
एक दिन स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उनके दर्शन के लिए पधारे। श्रीकृष्ण को देखते ही भीष्म पितामह मंद स्वर में हँसे और बोले—
“आइए जगन्नाथ!
सर्वज्ञ होते हुए भी क्या आप मेरे इस दारुण कष्ट का कारण बताएँगे?
मैंने ऐसा कौन-सा भयंकर पाप किया है, जिसका दंड आज इस रूप में भोग रहा हूँ?”
श्रीकृष्ण शांत भाव से बोले—
“पितामह! आपके पास दिव्य शक्ति है।
आप अपने पूर्व जन्मों को देख सकते हैं।
स्वयं ही उत्तर खोजिए।”
भीष्म ने कहा—
“देवकीनंदन!
अब इस शरशैया पर पड़े-पड़े करने को और है ही क्या?”
उन्होंने नेत्र मूँद लिए और ध्यान में लीन हो गए।
उन्होंने एक-एक कर अपने पूर्व जन्म देखे —
दस…
बीस…
पचास…
यहाँ तक कि सौ जन्म।
परंतु किसी भी जन्म में उन्हें ऐसा कोई कर्म दिखाई नहीं दिया,
जो इस भयानक पीड़ा का कारण बन सके।
आश्चर्य से भरकर भीष्म ने नेत्र खोले और बोले—
“माधव! मैंने सौ जन्म देख लिए। कहीं भी ऐसा पाप नहीं दिखा, जिसका फल यह हो।”
श्रीकृष्ण ने गंभीर स्वर में कहा—
“पितामह! एक जन्म और पीछे जाइए।
उत्तर वहीं मिलेगा।”
भीष्म पुनः ध्यानस्थ हुए।
इस बार उन्होंने देखा कि 101वें जन्म में वे एक राज्य के राजा थे। एक दिन वे अपनी सेना के साथ यात्रा पर निकले थे।
तभी एक सैनिक दौड़ता हुआ आया और बोला—
“राजन! मार्ग में एक सर्प पड़ा है। यदि सेना आगे बढ़ी तो वह मारा जाएगा।”
राजा ने तुरंत कहा—
“उसे मारना उचित नहीं।
किसी लकड़ी में लपेटकर झाड़ियों में फेंक दो।”
सैनिक ने वैसा ही किया, परंतु असावधानीवश उसने सर्प को बाण की नोक पर उठाया और पास की झाड़ियों में फेंक दिया।
दुर्भाग्यवश वह झाड़ी अत्यंत कंटीली थी। सर्प उसमें उलझ गया। जितना वह निकलने का प्रयास करता, उतना ही अधिक काँटों में फँसता चला गया।
काँटे उसके शरीर में धँस गए।
रक्त बहने लगा।
रक्त की गंध से चींटियाँ आ गईं और उसे जीवित ही नोचने लगीं।
पाँच-छह दिनों तक असहनीय पीड़ा सहने के बाद अंततः उस सर्प ने तड़प-तड़पकर प्राण त्याग दिए।
भीष्म का हृदय काँप उठा।
वे श्रीकृष्ण से बोले—
“हे त्रिलोकीनाथ!
मेरा उद्देश्य उस सर्प की रक्षा करना था, न कि उसे कष्ट देना।
फिर भी यह दंड क्यों?”
श्रीकृष्ण ने करुण दृष्टि से कहा—
“तात श्री!
कर्म जानबूझकर किया जाए या अनजाने में—फल से कोई नहीं बच सकता।
क्रिया हुई, परिणाम सुनिश्चित हुआ।
उस जीव के प्राण गए और उसे अत्यधिक पीड़ा मिली—बस यही कारण है।”
उन्होंने आगे कहा—
“आपका पुण्य इतना प्रबल था कि उस कर्म का फल 101 जन्मों तक दबा रहा। परंतु जब समय आया, तो फल भोगना ही पड़ा।”
“जो जीव किसी को पीड़ा देता है,
चाहे अनजाने में ही क्यों न हो,
उसे वही पीड़ा इस जन्म या अगले किसी जन्म में अवश्य सहनी पड़ती है।
आज जो पशु योनि में जन्म लेकर कष्ट भोग रहे हैं,
वे भी पूर्व जन्मों के ऐसे ही कर्मों का फल भोग रहे हैं।”
श्रीकृष्ण बोले—
“इसलिए मनुष्य को हर कर्म अत्यंत सावधानी और करुणा से करना चाहिए।
क्योंकि—”
कर्मों का फल तो भुगतना ही पड़ता है ।
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