विधानसभा न चल रही होती न बचते हरिशंकर तिवारी.
वीर बहादुर ने कर ली थी एनकाउंटर
की तैयारी
यूपी में ब्राह्मणों को फर्जी मामलों में फंसाकर मारने और जेल भेजनें के आरोप पर इन दिनों सियासत गरमाई हुई हैं.. ऐसे आरोप यूपी में पहली बार नहीं लगे हैं .. ये सत्तर के दशक से चला आ रहा है.. एक बार तो यूपी में हरिशंकर तिवारी का एनकाउंटर होते -होते रुका था. उस दिन अगर विधानसभा न चल रही होती तो शायद ही वो जिन्दा बचते .. तब गोरखपुर के ही रहने वाले तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह पर उनके एनकाउंटर की साजिश के आरोप लगे थे..
हरिशंकर तिवारी का उभार 60 के दशक में गोरखपुर की ब्राह्मण वर्सेज ठाकुर पॉलटिक्स से हुआ..तब गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना के कुछ साल ही हुए थे..विश्वविद्यालय में महाविद्यालयों की संबद्धता और नियुक्तियों को लेकर गोरखनाथ मठ के महंत दिग्विजयनाथ और कुलपति सूरतमणि त्रिपाठी के बीच उठे विवाद में छात्र भी ब्रह्मण -ठाकुर में बंटे.. ठाकुरों की ऒर से बलवंत सिंह और ब्राह्मणों की ऒर से हरिशंकर तिवारी ने मोर्चा सम्हाला..
गोरखपुर में मठ का अघोषित शासन था..गोरखपुर विश्वविद्यालय में रविंदर सिंह के छात्रसंघ अध्यक्ष चुने जाने के बाद ठाकुर बिरादरी का वर्चस्व शहर के अन्य क्षेत्रों में भी बढ़ता गया। हरिशंकर तिवारी और उनके साथ के लोगों को यह वर्चस्व स था. वर्चस्व के लिए गैंगवॉर शुरू हो गया.. इसमें पहले बलवंत सिंह की बलि चढी और फिर रविन्द्र सिंह भी मार दिए गए.. रविन्द्र सिंह तब 1977 का चुनाव जीतकर विधायक बन चुके थे.. दो साल बाद 1979 में गोरखपुर रेलवे स्टेशन में लखनऊ जाते समय उनकी हत्या हो गई.. रविन्द्र सिंह को बलवंत सिंह की हत्या के बाद ही अपनी मौत का डर सताने लगा था इसलिए उन्होंने बस्ती से वीरेंद्र शाही को बुला लिया था.. शाही ने हरिशंकर तिवारी को चुनौती देनी शुरू की तो हत्याओं का सिलसिला तेज हो गया.. इसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं आज चर्चा हरिशंकर तिवारी के एनकाउंटर से बचने की.
. ठाकुरवाद के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले हरिशंकर तिवारी जानते थे आगे बढ़ना है तो राजनीतिक़ ताकत भी हासिल करनी होगी..1972-73 में वो एमएलसी के चुनाव में उतरे लेकिन हार गए.. कहा ये जाता है कि काउंटिंग में गड़बड़ी कर उन्हें हरा दिया गया.. लेकिन हरिशंकर तिवारी ने हार नहीं मानी..1984 में महाराजगंज की सीट से लोकसभा चुनाव में उतरे..उनके धुर विरोधी और 1981 के उपचुनाव में महराजगंज की लक्ष्मीपुर सीट से विधायक बन चुके वीरेंद्र प्रताप शाही भी मैदान में थे..दोनों हार गए..
हरिशंकर तिवारी पर रासुका लगाकर जेल भेज दिया गया.लेकिन वो रुकने और झुकने वाले नहीं थे..
जेल में रहते हुए भी अपने लोगों को आगे कर अपना कारोबार बढ़ाया और जेल के अंदर से चिल्लूपार सीट से 1985 में विधानसभा चुनाव में उतरे और निर्दलीय विधायक बन गए.. लेकिन उनका संकट टला नहीं था. उनके विधायक बनने के साथ ही गोरखपुर के ही वीर बहादुर सिंह मुख्यमंत्री बन गए..
1986 में हरिशंकर तिवारी ने बड़हलगंज के नेशनल डिग्री कॉलेज में एक कार्यक्रम का आयोजन किय..दरअसल ये ब्राह्मण सम्मेलन था.. सीधे कहें तो ब्राह्मणों का शक्ति प्रदर्शन..इस कार्यक्रम में कांग्रेस के बड़े नेता कमलापति त्रिपाठी मुख्य अतिथि थे…गोरखपुर के साथ अगल-बगल के जनपदों से भी भारी संख्या में लोग कार्यक्रम में शामिल हुए..वीर बहादुर सिंह को ब्राह्मणों का यह जमावड़ा फूटी आंख न सुहाया.. हरिशंकर तिवारी पहले से ही उनकी आँख में खटक़ रहे थे… कार्यक्रम समाप्त होने के बाद कमलापति को छोड़ने के लिए हरिशंकर तिवारी मऊ जिले की सीमा दोहरीघाट तक गए.. वहां से लौटते समय पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया..चारों तरफ यह बात फैल गई कि पुलिस हरिशंकर तिवारी का एनकाउंटर करना चाहती है. हरिशंकर तिवारी को कहां ले जाया गया किसी को पता नहीं चल रहा था..हजारों लोगों ने थाना घेर लिया.. उधर कांग्रेस के विधायक और इमरजेंसी में इंदिरा गांधी की रिहाई के लिए विमान अपहरण करने वाले भोला पांडे को लखनऊ में जब इसकी सूचना मिली तो वे भागे भागे विधानसभा पहुंचे…
गनीमत यही थी कि उस समय विधानसभा चल रही थी.. उन्होंने विधानसभा के सभापति से निर्दलीय विधायक हरिशंकर तिवारी को पुलिस के उठाने, गायब करने की जानकारी देते हुए उनके फर्जी एनकाउंटर की आशंका जताई…उन्होंने अपनी ही सरकार से इस पर स्पष्टीकरण मांगा.. उधर टेलीफोन से लोगों को सन्देश भेजकर कमलापति त्रिपाठी को रास्ते में रुकवाया गया.. उन्हें पूरे मामले की जानकारी दीं गई.. ..उन्होंने मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह को चेताने के साथ सीधे प्रधानमंत्री राजीव गांधी से बात की..वो बीच रास्ते से लौटकर गोरखपुर आ गए…अंततः हरिशंकर तिवारी छूट गए.. इसके बाद उन्होंने अपना वो औरा बढ़ाया कि न केवल ब्राह्मण सिरोमणि बल्कि हर सरकार की जरूरत बन गए…

