आज ५ जून – विश्व पर्यावरण दिवस
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः।
पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः।
सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः।
सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
— शुक्ल यजुर्वेद, वाजसनेयी संहिता ३६/१७
अर्थात् – हे परमात्मा! द्युलोक में शान्ति हो, अन्तरिक्ष में शान्ति हो, पृथ्वी पर शान्ति हो। जल में शान्ति हो, औषधियों में शान्ति हो, वनस्पतियों में शान्ति हो। समस्त देवशक्तियों में शान्ति हो, ब्रह्म में शान्ति हो। सर्वत्र शान्ति ही शान्ति व्याप्त हो।
हमारे विचारों में शान्ति हो, हमारे कर्मों में शान्ति हो।
राष्ट्र के निर्माण और सृजन में शान्ति हो।
नगरों, ग्रामों और प्रत्येक गृह में शान्ति हो।
प्रत्येक प्राणी के तन-मन में, जगत के कण-कण में, सृष्टि के चर-अचर में शान्ति प्रतिष्ठित हो।
विशेष विमर्श — क्या ब्रह्म भी अशांत हो सकता है? यदि षडदर्शनों का उत्तर है—’नहीं’, तो इस मंत्र में ‘ब्रह्म शांति’ का उल्लेख क्यों?
‘ब्रह्म शांति’ के गहरे दार्शनिक निहितार्थ हैं। आइए, इसका उत्तर द्वैत सांख्य और अद्वैत वेदांत की गहराई में उतरकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्राप्त करते हैं।
(1) सांख्य दर्शन के अनुसार – सांख्य एक द्वैतवादी और तत्व-मीमांसीय दर्शन है, जो सृष्टि का उद्भव दो मूल तत्वों से मानता है: पुरुष (चेतना) और प्रकृति (ऊर्जा)। इस धरातल पर ‘ब्रह्म शांति’ के दो अर्थ सिद्ध होते हैं। पहला अर्थ मूल प्रकृति की साम्यावस्था से है। सांख्य के अनुसार, यह दृश्य जगत प्रकृति के तीन गुणों—सत्त्व (प्रकाश/संतुलन), रज (गति/चंचलता) और तम (जड़ता/अंधकार)—के वैषम्य से गतिमान है। जब इन तीनों गुणों में पूर्ण सामंजस्य स्थापित हो जाता है और कोई आंतरिक विक्षोभ नहीं बचता, तो उसे प्रकृति की ‘साम्यावस्था’ कहते हैं। सांख्यीय दृष्टि से यही ‘ब्रह्म शांति’ है—अर्थात सृष्टि के मूल कारण का पूर्णतः संतुलित हो जाना। पर्यावरण के संदर्भ में यह पारिस्थितिकीय संतुलन की पराकाष्ठा है। इसका दूसरा अर्थ ‘पुरुष’ का तटस्थ दृष्टा भाव है। सांख्य में पुरुष मूलतः निर्विकार और अकर्ता है। जब चैतन्य तत्व प्रकृति के विकारों (प्रदूषण, उथल-पुथल, दुःख) से अप्रभावित रहकर अपने शुद्ध, उदासीन और केवल ‘दृष्टा’ रूप में स्थित रहता है, तब वह परम आत्म-शांति (कैवल्य) को प्राप्त होता है।
(2) अद्वैत वेदांत के अनुसार – यह एक परम अद्वैतवादी दर्शन है, जिसके अनुसार केवल ‘ब्रह्म’ ही एकमात्र पारमार्थिक सत्य है, और यह दृश्य प्रपंच उसी का विवर्त (आभास) है। इस धरातल पर ‘ब्रह्म शांति’ को दो परस्पर जुड़े रूपों में देखा जाता है। पहला रूप ब्रह्म का स्वतः-सिद्ध स्वरूप है। वेदांत के अनुसार ब्रह्म कभी अशांत हो ही नहीं सकता, क्योंकि अशांति के लिए ‘दूसरे’ (द्वैत) की उपस्थिति अनिवार्य है—जहाँ भय, राग या संघर्ष की संभावना हो। ब्रह्म एकमेवाद्वितीयं और निर्विकार है; अतः ‘ब्रह्म शांति’ कोई अर्जित की जाने वाली अवस्था नहीं, बल्कि उसका मूल स्वभाव (सच्चिदानंद) है, जो सदा अखंड और कूटस्थ शांत रहता है। इसका दूसरा रूप अधिष्ठान की स्थिरता है। जैसे सिनेमा की स्क्रीन पूर्णतः स्थिर और अप्रभावित रहती है, भले ही उस पर प्रलय, अग्नि या विभीषिका के दृश्य चल रहे हों; ठीक उसी प्रकार, व्यावहारिक धरातल पर संसार में चाहे जितनी अशांति या पर्यावरणीय असंतुलन दिखे, उसके मूल अधिष्ठान (ब्रह्म) में शाश्वत शांति सदैव अक्षुण्ण रहती है।
इस प्रकार, अद्वैत वेदांत के आलोक में मंत्र में प्रयुक्त ‘ब्रह्म शांति’ वास्तव में साधक के लिए एक अंतर्मुखी प्रार्थना बन जाती है। इसका वास्तविक अभिप्राय उस आत्मज्ञान के उदय से है, जिसके होते ही अज्ञान का पर्दा हट जाता है, मन के सारे विक्षोभ थम जाते हैं और जीव स्वयं को ब्रह्म रूप जानकर उसकी शाश्वत शांति में प्रतिष्ठित हो जाता है। ऋषि इस सूक्त में पहले पृथ्वी, जल और वनस्पति जैसे व्यावहारिक जगत के स्थूल तत्वों की शांति की बात करते हैं, जो हमारी प्रत्यक्ष चेतना का हिस्सा हैं। इसके उपरांत, अंत में ‘ब्रह्म शांति’ का उद्घोष करके वे यह स्थापित करते हैं कि जब तक हम सृष्टि के इन सभी बाह्य और दृश्य रूपों को उनके मूल कारण यानी परम चेतना से अभेद रूप में नहीं जोड़ेंगे, तब तक ब्रह्मांड और जीवन में पूर्ण तथा आत्यंतिक शांति की स्थापना संभव नहीं है।
निष्कर्ष – संक्षेप में अंतर यह है कि जहाँ सांख्य दर्शन ‘ब्रह्म शांति’ को प्रकृति के तीनों गुणों के पूर्ण संतुलन (ब्रह्मांडीय संतुलन) और चेतना की तटस्थता के रूप में देखता है; वहीं अद्वैत वेदांत इसे संपूर्ण ब्रह्मांड के एकमात्र परम सत्य (वैश्विक चेतना) के अपरिवर्तनीय, नित्य-शुद्ध और सनातन-शांत स्वभाव के रूप में परिभाषित करता है।
विश्व पर्यावरण दिवस पर आइए, हम प्रकृति के प्रति अपने दायित्वों का स्मरण करें और पृथ्वी, जल, वायु, वनस्पति तथा समस्त सृष्टि के संरक्षण का संकल्प लें।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
©® डॉ विद्यासागर उपाध्याय

