कानपुर रोड पर चलने वाली UPSRTC की बस UP-32-AN-7823 का ड्राइवर रमेश पाल पिछले 19 साल से एक ही काम करता है — सुबह गियर डालना, शाम ब्रेक मारना।
लोग उसे सिर्फ “ड्राइवर साहब” कहते थे। न कोई कहानी, न कोई चमत्कार। घर में पत्नी की थायराइड की दवा, बेटा ITI कर के नौकरी ढूंढ रहा, और खुद के कंधे में वो दर्द जो स्टीयरिंग पकड़ते ही शुरू हो जाता।
रमेश असाधारण बनना नहीं चाहता था। वो सिर्फ चाहता था कि किस्त पर ली हुई पुरानी स्कूटी की आखिरी EMI निकल जाए।
मनकामेश्वर घाट की माला
पिछले महाशिवरात्रि की बात है। भीड़ की वजह से उसकी बस गोमती किनारे फँस गई। वो चाय पीने उतरा तो मनकामेश्वर मंदिर के बाहर एक नागा साधु कंबल में लिपटा बैठा था। ठंड में उसका हाथ काँप रहा था।
रमेश ने अपनी जैकेट उतार कर दे दी। साधु ने झोले से एक काली रुद्राक्ष की माला निकाली, पांच मुखी, धागा घिसा हुआ।
“108 बार। गिन के। ‘ॐ नमः शिवाय’। न जल्दी, न देर।”
रमेश हँसा, “बाबा, मेरे पास टाइम नहीं। बस में तो बस हॉर्न बजता है।”
साधु ने माला उसकी मुट्ठी में दबा दी, “शिव को टाइम नहीं चाहिए। तू जब हॉर्न बजाएगा, तब भीतर घंटी बजा लेना।”
रमेश ने माला लाकर बस के मीटर के पास टांग दी।
तीन बार 108
अगले दिन सुबह डिपो में बस स्टार्ट करने से पहले उसने पहली बार गिना। ॐ नमः शिवाय… एक दाना, दूसरा दाना। 108 तक पहुँचते-पहुँचते सांस धीमी हो गई।
उसने नियम बना लिया, साधु की तरह न कम न ज्यादा —
सुबह ड्यूटी से पहले 108, दोपहर में चारबाग पर बस रुकती है तब 20 मिनट में 108, रात को घर आकर नहा धोकर सोने से पहले 108।
पहले 15 दिन कुछ नहीं बदला। कंडक्टर बोला, “भोले के भक्त बन गए का?” रमेश ने जवाब नहीं दिया।
पर धीरे-धीरे स्टीयरिंग पर हाथ हल्का लगने लगा। पहले जब कोई बाइक वाला सामने आता तो गाली निकलती थी। अब अपने आप जीभ पर मंत्र आ जाता — ॐ नमः शिवाय… 34, 35… और पैर ब्रेक पर पहले पहुँच जाता, हॉर्न पर बाद में।
ब्लड प्रेशर की गोली जो दो साल से चल रही थी, डॉक्टर ने एक महीने बाद आधी कर दी। “टेंशन कम लेते हो क्या अब?”
रमेश कहता, “नहीं डॉक्टर साहब, बस गिनती करता हूँ।”
छोटी-छोटी शिव-कृपा
किस्मत एकदम से नहीं खुली। वो शिव की तरह धीरे-धीरे खुली।
एक दिन स्कूल की बच्चियों से भरी बस में एक लड़की का बैग छूट गया। रमेश ने अगले स्टॉप पर बस रोकी, खुद उतर कर दो किलोमीटर पीछे जाकर बैग लाया। माँ ने अगले दिन डिपो आकर पेड़े दिए।
दूसरे हफ्ते उसका पुराना लाइसेंस रिन्यू अटक गया था। RTO में वही अफसर मिला जिसकी माँ को रमेश ने पिछले साल बारिश में बस में मुफ्त लिफ्ट दी थी। काम बिना दलाल के हो गया।
तीसरे महीने बेटे अंशु का इंटरव्यू था, जूते फटे थे। रमेश के पास पैसे नहीं थे। उसी शाम एक सवारी बस में पर्स भूल गई। रमेश ने ईमानदारी से जमा कराया। पर्स वाली महिला ने अगले दिन आकर धन्यवाद में 2000 रुपये जबरदस्ती दिए, “बेटे के लिए जूते ले लेना भैया।”
रमेश रात को माला देखता, “भोलेनाथ, पैसा तो नहीं बरसा, पर लाज रख ली।”
वो शिवरात्रि वाली रात
असली परीक्षा अगली शिवरात्रि पर आई। पूरी रात जागरण, हाईवे पर ट्रक ही ट्रक। उन्नाव के पास उसकी बस का अगला टायर 90 की स्पीड पर फट गया।
पुराना रमेश घबराता, तेज ब्रेक मारता, बस पलट जाती। उस रात उसके होंठों पर अपने आप चल रहा था — ॐ नमः शिवाय… 71, 72, 73…
उसने ब्रेक नहीं मारा। स्टीयरिंग को कस के पकड़ा, धीरे-धीरे एक्सीलेटर छोड़ा, बस को कच्चे पर लिया। बस 200 मीटर घिसट कर रुकी। 52 सवारियाँ, एक खरोंच नहीं।
सब उतर कर काँप रहे थे। पीछे की सीट पर एक बूढ़ा दंपति था — वो हर साल शिवरात्रि पर बैजनाथ धाम जाते थे। बूढ़े ने रमेश का माथा छुआ, “बेटा, तूने आज महामृत्युंजय जपा है।”
रमेश ने कुछ नहीं कहा। उसने डैशबोर्ड से माला उठाई, टूटे हुए टायर के पास बैठ कर पूरी 108 की एक और माला फेर दी। आँखें भीग गईं।
असाधारण किस्मत
दो हफ्ते बाद डिपो में नोटिस लगा — बेस्ट सेफ्टी ड्राइवर अवार्ड, साथ में प्रमोशन। रमेश का नाम सबसे ऊपर था। उसी बूढ़े दंपति ने, जो रिटायर्ड रेलवे अफसर निकले, DRM को चिट्ठी लिखी थी।
प्रमोशन के साथ तनख्वाह बढ़ी। उसी महीने अंशु को प्राइवेट कंपनी में अप्रेंटिसशिप मिली — इंटरव्यू लेने वाला वही आदमी था जिसका पर्स रमेश ने लौटाया था।
घर में पहली बार फ्रिज आया। पत्नी ने कहा, “शिव जी ने सुन ली।”
रमेश ने रुद्राक्ष की माला धो कर फिर से डैशबोर्ड पर टांग दी।
अब वो नए ड्राइवरों को सिखाता है। क्लास की शुरुआत में कहता है, “गाड़ी चलाना हाथ का काम है, पर गाड़ी रोकना मन का।”
लोग पूछते हैं, “रमेश भाई, 108 बार जपने से क्या मिला?”
वो स्टीयरिंग पर हाथ फेरते हुए कहता है, “शिव कुछ देता नहीं, शिव लेता है।
मेरा डर ले लिया, मेरी जल्दी ले ली, मेरा अहंकार ले लिया।
बाकी जो बचा, वही किस्मत है।”
“मैंने 108 बार माँगा नहीं, 108 बार नाम लिया। ॐ नमः शिवाय का मतलब भी यही है — मैं कुछ नहीं, सब तू ही है।
जब मैं कुछ नहीं रहा, तो रास्ता अपने आप बन गया।”
आज भी सुबह 4 बजे आलमबाग डिपो में जब वो बस स्टार्ट करता है, तो पहले हॉर्न नहीं बजाता। पहले माला के 108 दाने सरकाता है।
ॐ नमः शिवाय… 1… 2… 3…
और लखनऊ की भीड़ में किसी को पता भी नहीं चलता कि जिस साधारण बस वाले को वो रोज ओवरटेक करते हैं,
वो एक असाधारण साधना कर रहा है — न धन के लिए, न नाम के लिए, बस हर दिन 108 बार खुद को शिव को सौंपने के लिए।

