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गुड़ का ढेला
इस व्यस्त इलाके में काम करना भी कितना कठिन है। कहने के लिए बारिश के दिन थे। पिछले सप्ताह बारिश भी अच्छी हुई थी, जिससे सबकुछ साफ और धुला-धुला नजर आने लगा था और मौसम भी सुहावना हो चला था। मगर आज फिर तेज धूप थी और यहॉ के नाला उड़ाही के काम के लिए मुझे सख्त हिदायत दी गई थी। इस इलाके के नालों के जाम हो जाने कारण सड़क पर घुटनों भर का जल-जमाव हो गया था। इसलिए सिवरेज की सफाई के लिए मुझे तत्काल इधर भेज दिया गया था। सिनेटरी इंस्पेक्टर होने के नाते मुझे मालुम था कि बिना किसी उपर के शिकायत या दबाव ये काम हो नहीं सकता था। इसलिए इसमें किसी प्रकार की ढिलाई अथवा हील-हवाले का मतलब बड़ी परेशानी मोल लेना था। अपने सफाई कर्मियों की टीम लेकर जब मैं टावर चौक के पास पहॅुचा, तो वहॉ के जल-जमाव की स्थ्िाति को देख रोना नहीं, हॅसी आ गई। इस जल-जमाव के लिए क्या वे लोग जिम्मेवार नहीं, जो नालों में सभी प्रकार के कचरों को बेपरवाही से डाल निश्चिंत हो बैठ रहते हैं। उनमें क्या सामान्य समझ भी नहीं होती कि वे कचरा भरे प्लास्टिक की थैलियों को नालियों में ना डाला करें, जो आमतौर पर नालों को जाम रखने केप्रमुख कारक हाते हैं।
मैं सड़क किनारे एक सिवर के पास छाता लगाए खड़ा था, फिर भी मैं गर्मी और पसीने से बेहाल था। उधर चार-पॉच सफाईकर्मी कुदाल-फावड़ा और दूसरे सामान के साथ काम पर लगे थे। सिवर में से कचरे के रूप में कीचड़, मिट्टी से लिथड़े दुनिया भर के अल्लम-गल्लम किस्म के सामान निकल रहे थे, जिससे अब पानी का नाले में बहाव तेज हुआ था। मुझे इस बात का संतोष था कि सड़क पर अब पानी का स्तर कम होने से किसी प्रकार की शिकायत नहीं होगी।
“देखिये साहेब क्या मिला है!” अचानक एक सफाईकर्मी ने दूसरे सफाईकर्मी कालू की तरफ इशारा कर कहा, तो मैं कालू की तरफ देखने लगा. उसके हाथ में हरे रंग के मखमल की एक छोटी सी थैली थी, जिसका मुंह लाल रंग के धागे से बँधा था। धागे के सिरों पर फूंदने और कुछ मोती लगे थे। और ये सभी नाले के काले कीचड़ से लथपथ थे। पुराने समय में तो आजकल के फैशनेबल बटुए और पर्स होते नहीं थे। लोग इसी प्रकार के थैलीनुमा बटुआ रखते थे, जिसमें वे रूपये-पैसे के अलावा जरूरी सामान भी रखते थे।
कालू अपना काम छोड़ उसे अपने गंदे हाथों से साफ कर रहा था। पहले तो उसने सड़क के पानी से ही उसे धोया। फिर सामने के एक होटल में जा कर नल के साफ पानी से उसे धोने लगा। उसे पक्का विश्वास था कि उस थैली में पुराने जमाने के कुछ सोने-चॉदी के रूपये-पैसे या जेवरात होंगे, क्योंकि उसमें से किसी धातु के ठनक की आवाज आ रही थी। प्रत्यक्षत: मैंने उसके प्रति अपनी उपेक्षा प्रदर्शित की कि मुझे उसमें धेले भर भी रूचि नहीं है। मगर दिल में धुकधुकी तो हो ही रही थी कि पता नहीं उसे थैली में कौन सा खजाना हो, जो उस मुर्ख, जाहिल-गॅवार कालू के हाथ लगा है। काश, वह मेरे हाथ लगा होता। क्योंकि उस थैली को पानी से धोते हुए कालू बोलता जा रहा था- “ई हमको मिला है साहेब। इसमें जो कुछ भी सोना-चॉदी होगा, उसको हम ही लेंगे।
एक प्रकार से वह मुफ्त में मिले वस्तु के प्रति अपने खोने के भय से आश्वस्त होना चाहता था। और उसी के साथ मेरी उत्सुकुता चरम पर बढ़ती जाती थी। इस प्राचीन शहर ‘गया’ में खुदाई में कुछ अलग, कुछ विशिष्ट बस्तुओं का मिलना असामान्य बात नहीं। अक्सर ही यह सुनने-पढ़ने को मिल जाता है कि किसी को खुदाई के वक्त नायाब चीज हाथ लगी है। इन चीजों के बारे में जनमानस सहज ही लाखों-करोड़ों की कीमत होने का अनुमान लगाने लगता था। भले ही व्यवहारत: वे कौड़ियों के भी क्यों ना हों।
फिर भी मन में एक उत्सुकता, एक संशय और एक उत्साह तो बनता ही है कि काश वो मुफ्त में निकले लाखों-करोड़ों का सामान हमें मिल जाए, तो हमारे दिन फिर जाऍ। आखिर बिना मेहनत कौन मालामाल होना नहीं चाहता। और ऐसा ही कुछ मेरे मन में चल रहा था। और यह जानने को बहुत उत्सुक था कि उस थैली में क्या हो सकता है। और कि उसे कालू से कैसे हथियाया जा सकता है।
थोड़ी देर बाद ही वह मॅुह लटकाए वापस आया, तो मैं बिना उसके चेहरे को पढ़े पूछ बैठा- “अरे, वो थैली कहॉ है! क्या है उसमें दिखाना तो। अरे, उसमें मेरा भी हिस्सा बनता है भाई।”
“हिस्सा क्या, आप इसे पूरा ही रख लीजिए” कालू मॅुह बनाते मेरे सामने थैली को लहराते हुए बोला- “ये देखिये, यही तो है इस थेली में।”
उसकी हथेली पर किन्हीं पायल के पॉच घुघॅरू थे।
“ललमुनिया की मतारी ठीक कहती है कि मेरा भाग्य कोयले से लिखा गया है” निराशा से भरी आवाज में वह बोल रहा था-“मेरे भाग्य में सोना-चांदी कहॅा से रहेगा?”
पता नही उन घुँघरूओं में कौन सा आकर्षण था, जो मुझे अभी सम्मोहित कर रहा था। मैंने शीघ्रतापूवर्क वह थैली और घुँघरू उसके हाथ से झपट ली।
कालू पुन: अपने काम में लग गया था।
शाम तक नाला उड़ाही का काम संपन्न हो चुका था। सड़क पर अब पानी नहीं था और उसपर लोग आराम से यॅू चल रहे थे, गोया वे कभी जेल में बंद रहे हों। इस खुशी में कुछ दूकानवालों ने सफाईकर्मियों को बख्खीश भी दी थी। एक होटलवाले ने हमें चाय-नाश्ता करने का आमंत्रण ही दे डाला था, जिससे मुझे कुछ पैसे बच जाने की खुशी थी। उधर कालू के चेहरे को देखने से ऐसा लगता था कि उसका कोई कीमती सामान लुट गया हो।
सीनेटरी इंस्पेक्टर पर कैसे-कैसे दबाव होते हैं, यह मुझ जैसा भुक्तभोगी ही समझ सकता है। तिसपर शहर का यह ‘टावर-चौक’ सर्वाधिक घना और व्यस्त है। उसके चतुर्दिक बने भव्य, बहुमंजिले इमारतों में दिन में भी दूधिया रोशनी से नहाए दूकानों में व्यापार का संसार बसता है। सैकड़ों वर्षों से यह शहर का शानदार इलाका है। और आज की तो बात ही दूसरी है। इन दुकानों के मालिक रोज लाखों-करोड़ों से खेलते है। और यह तभी संभव है, जब यहॉ तक लोग सुविधाजनक ढंग से पहॅुच सकें। और लोगों के आने-जाने का मार्ग हमने प्रशस्त कर दिया था, तो थोड़ी सी बख्खीश या चाय-नाश्ता करा देना उनके लिए कोई घाटे का सौदा ना था। थैली को एक दूकान से रद्दी अखबार मॉग मैं उसे उसमें लपेट चुका था। इतने पर भी मन नहीं भरा, तो उससे प्लास्टिक की एक थैली मॉग उसमें उसे सावधानी से रख दिया।
घर वापस आने के बाद मैंने सारा कुछ काम किया। खाना खाने के उपरांत सोने के लिए जाते वक्त अंतत: मैंने उस थैली को निकाल ही लिया। मेरी हथेली पर पीतल के वे पॉच घॅुघरू थे, जिनपर मैल की हल्की परत जमी थी। मैंने अब उस मखमल की थैली को गौर से देखा तो चौंक पड़ा। उसपर हरे धागे की कढ़ाई से लिखा था- “ढेलाबाई।”
तो क्या ये थैली ढेलाबाई की है, जो किंवदंतियों के रूप में गया की फिजां में फैली है। मैंने ढेलाबाई के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। कुछ कहते थे कि वह एक तवायफ थी। तो कुछ का मानना था कि वह सिर्फ एक गायिका थी, जिसकी आवाज में गजब की कशिश थी। मिठास थी ऐसी कि उसकी आवाज को “गुड़ का ढेला” कहा जाता थ। और जिसपर गया का प्रमुख पंडा बुरी तरह आसक्त था।
मैंने उन घॅुघरूओं को पुन: अपनी हथेली पर रखा और गौर से देखने लगा। दिनभर की थकान थी और नींद मुझपर बुरी तरह हावी हो चुकी थी।
अचानक छन्न की आवाज हुई, तो मैं चौंका। मेरे सामने कोई छाया सी खड़ी थी। मैं पसीना-पसीना हो रहा था। उसने अपने बुर्के का नकाब उठाया और एकबारगी ही मुझे लगा कि उसके झक्क दूधिया सौंदर्य से कमरा झिलमिला उठा हो। उसके नाक में फॅसा हीरे का कॉटा दमक रहा था।
“डरो नहीं” वह बोली – “मैं हूँ ढेलाबाई। पहचाने नहीं क्या? मैं तुम्हारे गॉव की ही हूँ। वह गॉव, जहॉ ईख बहुत होती थी और जिससे वहॉ गुड़ बनता था। हमारे गॉव की प्रसिद्धि इसी गुड़ से थी। और शायद इसीलिए मेरी आवाज में उसी गुड़ की मिठास थी, जिसने मुझे बहुत मान-सम्मान दिया।
”मगर तुम तो एक तवायक थी।
“गलत जानते हैं लोग। मैं एक गायिका थी, ठुमरी गायिका। तुम शायद उसके बारे में कुछ नहीं जानते।”
“भला इस बारे में मैं क्या जान सकता हूँ?
“मैं बताती हूँ तुम्हें। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में ध्रुपद, खयाल, टप्पा और ठुमरी ये चार महत्वपूर्ण हैं। और ये ठुमरी मैं गाती थी। जानते हो इस ठुमरी के आविष्कारक थे लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह। वाजिद अली शाह ने वैसे तो बहुत कुछ आविष्कार किये। जैसे कि कत्थक नृत्य भी उन्हीं की देन है!
“तो मैं सबसे पहले तुम्हारा ये भ्रम दूर करूँ कि मैं तवायफ थी। अब तुम्हारी जानकारी के लिए बता दॅू कि ठुमरी दो प्रकार से गाए जाते हैं। प्रथम को ‘बैठी महफिल’ और दुसरी को “खड़ी महफिल” कहते हैं। खड़ी महफिल के लिए पूरा शरीर ही अभिनय करता है, जबकि ‘बैठी महफिल’ में बैठकर गाया जाता है। हाँ, यह जरूर है कि माथे का उपरी हिस्सा थोड़ा-बहुत अभिनय करता है। बाकी तो अपने चेहरे की भाव अभिव्यक्ति है, और गीतों के बोल हैं।”
“लेकिन तुम्हारे बटुए में मिले ये पायल के घॅूघरू?”
“तुम बहुत भोले हो भार्इ। आखिर मेरे गॉव के ही ना ठहरे।” वह हॅसकर बोली- “यहॉ गया में जब कोई जलसा होता था न, तो बाहर से भी फनकारों को बुलाया जाता था। तो, इसी प्रकार के एक बड़े जलसे में पटना से मलिका जान आई थी। उसने उस जलसे में एक ठुमरी “बाजुबंद खुल-खुल जाए…” गाया था, तो किसी कलावंत ने उसे बाजुबंद का तोहफा दिया था। अगले दिन वह मेरे कोठे पर आई तो उसने कहा कि तुम ठुमरी की ‘खड़ी महफिल’ गाओ, तो तुम्हें ज्यादा आमदनी होगी और तोहफे ज्यादा मिलेंगे। यह कहते हुए उसने अपना बाजुबंद मुझे दे दिया था, जो पूरे ग्यारह तोले का था।
“मैंने उसे खुशी-खुशी कबूल कर लिया। फिर अंदर कमरे में जाकर अपने जेवरों का डब्बा उठा लाई। उसमें से मैंने एक करधनी निकाली, जो पैंतालिस तोला सोने की थी। मैंने उसे वह करधनी तोहफे के रूप में दिया कि चॅूकि वह ठुमरी की ‘खड़ी महफिल’ गाती है, उसके लिए ये ज्यादा मुफीद रहेगा। मैँने उसे ये भी बताया कि इस शहर के प्रमुख पंडे के पुत्र की मुझपर बड़ी कृपा है। सो मुझे किसी इनाम-इकराम का लालच नहीं हैं”
मलिका जान एकदम से लाजवाब हो गई और उस करधनी को पहनकर मेरे सामने ठुमरी की ‘खड़ी महफिल’ करने लगी। जब वह खत्म हुआ तो उसकी पायल से एक घॅुघरू टुट गया, जिसे मैंने सॅभाल कर रख लिया था।”
“और उन पॉच घुँघरूऔं में से वह एक है” मैं बोला- “फिर बाकी किसके हैं?”
“वह भी बताऊँगी भाई मेरे” वह अपने बुर्के का दूसरा पर्दा हटाते हुए बोली- “कितने दिनों बाद मुझे भाई मिला है। एक बहन अपना सुख-दुख अपने भाई से ही तो बयान कर पाती है।”
मैं मध्यमवर्गीय परिवार का एक लड़का पहली बार एक ऐसी औरत को देख रहा था, जिसकी गर्दन में सात लड़ियों वाला मोती का हार झूल रहा था। कानों में हीरे जड़े बड़ी-बड़ी बालियॉ झूम रही थीं। मैंने इस प्रकार की ज्वेलरी सिर्फ पत्रिकाओं में देखी थी। ज्वेलरी हाउस में दूर से ही तो देख सकता हूँ ना! और फिल्मों ओर धारावाहिकों में तो ये आम बात है। लेकिन वे सभी नकली होते हैं। वर्तमान की भाषा में कहॅू तो इमिटेशन वाले। और यहॉ तो मैं एकदम से सच्चे सोने के इन भारी-भरकम जेवरातेां को देख रहा था। ओह! इन भारी-भरकम जेवरों को पहनना भी तो एक खतरनाक बात है। हमेशा चोर-डाकुओं का भय बना रहता होगा?
“उस जमाने में बैंक कहाँ थे” वह जैसे मेरे मन की बातों को भाँपते हुए बोली- “ये जेवरात ही उस समय के बुरे दिनो में बैंक का काम करते थे। और इसलिए हमलोग बहुत सीमित स्थानों पर अपनी गायकी का हुनुर सुनाने जाते थे। हमारे संरक्षक और बुलाने वाले लोग हमारी सुरक्षा का पुख्ता प्रबंध भी करते थे। और एक बार यही तो हुआ। मुझे एक बार ग्वालियर से आमंत्रण मिला, तो हमारे साथ हमारे संरक्षक ने पॉच-पॉच लठैत साथ कर दिये थे। गया में रेलगाड़ी में साथ ही बैठे। उफ्, उस समय की ट्रेन की रफ्तार भी तो धीमी थी। खैर हम किसी तरह वहॉ पहॅुचे। वहॉ अपनी गायकी का जलवा दिखाया। वहॉ की एक नर्तकी तो एकदम से मेरे पीछे ही पड़ गई मुझे नीचा दिखाने के लिए।
अंत में मैंने अपनी एक प्रिय ठुमरी ‘पिराये मोरी अँखिया… राजा हमसे ना बालो…’ गाया तो ग्वालियर रियासत के महाराज अवाक्र रह गए। शायद ऐसी खनक भरी मखमली आवाज उन्होंने सुनी ही नहीं थी। बहुत कुछ इनाम में देने के बाद वे बोले कि अब मैं तुम्हें मॅुहमॉगी चीज देना चाहता हूँ, तो मैंने कहा कि मुझे उस नर्तकी के पायलों में से एक घॅूघरू चाहिए। और इस प्रकार मैंने उसके पायलों में से एक घॅूघरू ले कर उसे नीचा दिखा दिया।”
“लेकिन यह तो बहुत छोटा दंड हुआ।”
वह हॅसी। मुझे लगा जैसे वसंत के भोर में पंक्षियों का मधुर कलरव हो रहा हो। ऐसी मधुर हॅसी थी उसकी। वह बोली- “किसी साजिंदे के सारंगी या सितारे से एक तार निकाल दो, तो क्या वो सही अर्थ में उसे बजा पायेगा? पायल के घॅुघरू भी वैसे ही हैं जनाब।”
“बड़ा अनोखा तरीका है आपका।”
“तुम मेरे गॉव के भाई हो” वह मनुहार भरे स्वर में बोली- “इसलिए तुम मुझे ‘तुम’ ही कहो तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा। अपनेपन के लिए मैं तरस कर रह गई। और इसलिए जब तुम वह थैली लिए चले आए तो मैं तुम्हारे पास चली आई कि कोई तो है मेरा अपना।
“क्या बताऊँ तुम्हें कि मैं अपने गॉव में कितनी खुश थी। अब्बू का आठ बीघे की खेती थी और खाने को भरपूर अनाज उपजता था। मैं खेतों में दौड़ती, जंगलों तक चली जाती थी। मुझे किसी हिंसक जीव से कभी भय नहीं लगा। गॉव में मैं होरी-कजरी गाती और उन्मुक्त हो कर हॅसती थी। तीज-त्योहारों में, शादी-ब्याह में मैं हमेशा आगे रही गाने में। मैं भी अपनी शादी के सपने देखती थी कि एक दिन बगल के गॉव के एक लंपट के द्वारा मुझे उठाकर इस गया के बाजार में बेच दिया गया। वह तो खैर कहो कि गया के प्रमुख पंडा का लड़का मुझपर रीझ गया और मैं सिर्फ उसकी उपपत्नी बन कर रह गई। अन्यथा पता नहीं मेरा क्या होता! बाद में मुझे पता चला कि यहॉ की एक मशहूर तवायफ ने मेरा अगवा कराया था। वह दरअसल हमारे बगलवाले गॉव के जमींदार के यहॉ के शादी समारोह में आई थी। पता नहीं कैसे और कहॉ उसने मुझे गाते हुए सुन लिया था। उसी ने कहा था कि मेरी आवाज गुड़ के ढेले के समान मीठा ओर मधुर है। और इसके बाद ही मेरा मूल नाम गायब हो गया और मैं ढेलाबाई बन गई।”
“वो तो ठीक है। मगर वो घुँघरू की बात कहॉ से आ गई?”
“दरअसल वह मुझे नृत्य भी सिखाना चाहती थी। जबकि मेरा कहना था जब मेरी आवाज और भाव ही मुझे किसी महफिल में स्थापित करते हैं, तो उसकी क्या जरूरत है। गया के प्रमुख पंडा हम सभी के संरक्षक थे। एक दिन उनके सामने ही शर्त बद गई। मैंने अपनी गायकी और भाव से ही उसे परास्त कर दिया। प्रमुख पंडा ने मुझे देखा। मैं गुस्से में तो बहुत थी। लेकिन मैंने इस विजय के प्रतीकस्वरूप उसके पायल का एक घॅुघरू ले लिया। आखिर रहना तो मुझे उसी माहौल में था। और इस कारण मैं वहॉ कोई विवाद चाहती नहीं थी।”
“तुम्हारा दंडित करने का तरीका तो अव्वल दर्जे का है। वैसे ही चौथी घुंघरू का रहा होगा।”
“सिर्फ दण्ड से ही बात नहीं बनती मेरे भाई” वह मुझे पुचकारती हुई सी बोली- “मुझे यह चौथा घुंघरू पुरस्कार में मिला था।”
“अच्छा वो कैसे?”
“कल तुमने जिस टावर चौक के पास काम कराया, वहीं हर शनिवार को रात में महफिल सजती थी। उसका नाम ही था ‘शनिचरा क्लब’, जिसको टेकारी के जमींदार ने स्थापित किया था। इस क्लब में बाहर के गायिकाओं को भी बुलाया जाता था। इस क्लब में आसपास के जमींदारों, शहर के रईसों के अलावा अंग्रेज अफसर भी आते थे। अंग्रेज अफसर तो एकाध घंटे बाद वापस चले जाते थे, क्योंकि एक तो हमारी गायकी उनके पल्ले नहीं पड़ती थी। फिर उनको रविवार की सुबह में चर्च भी जाना होता था। लेकिन इस महफिल में रईस-जमींदार आदि सुबह तक बने रहते थे। उस शनिचरा क्लब के आयोजन में एक बार मशहूर गायिका जद्दनबाई भी आई थी। कार्यक्रम बहुत शानदार हुआ। प्रमुख पंडा ने पौ फटने के वक्त मुझसे ठुमरी सुनाने को कहा। सुबह के वक्त् मैंने राग भैरवी में “थाड़े खड़े रहियो तुम श्याम… गगरिया मैं घर धरि आऊँ….” गाया, तो जद्दनबाई ने मुझे गले लगा लिया और बोली कि ऐसी आवाज तो वह अपने जीवन में सुनी ही नहीं। तोहफे में अपने कंगन उतार कर मुझे पहना दिये। मैंने उनसे कहा कि जब आप देना ही चाहती हैं तो मुझे निशानी के तौर पर अपने पायल का एक घुंघरू दे दीजिए। वह मेरे इस अनुठे मॉग पर इतना रीझी कि उन्होंने पूरा पायल खोलकर मुझे सुपुर्द कर दिया। मैं वो लेकर क्या करती? सो बस अपने एक साजिंदे से कहकर उसमें से एक घुंघरू निकाल उन्हें वह पायल वापस कर दिया है।”
“बड़ी अजीब बात है।” मैंने उसे ध्यान से देखा। अब वह अपना बुर्का पूरी तरह खोल मेरे सामने एक साधारण सफेद सूती साड़ी में खड़ी थी। उसके शरीर पर पड़े सारे जेवरात भी नदारद थे। उसके इस बदले स्वरूप से मुझे ये लगा कि मेरा भय और झिझक भी कुछ कम हो गया था।
“अजीब तो प्रमुख पंडे के पुत्र को भी लगा था कि मैं ख्वाहिश कैसी रखती हूँ! मैंने उसे बताया कि जब वह मेरी हर जरूरत पूरा करता ही है, तो मुझे कहीं कुछ मॉगने की जरूरत क्या है। मैं तो उसके प्रति इतनी समर्पित और आसक्त थी कि मैं बाहर के किसी महफिल में आने-जाने से भी बचती थी। लेकिन भाग्य और समय सदैव एक सा नहीं रहता। एक दिन अचानक असाध्य रोग के चंगुल में वह पड़ा, तो फिर उठ नहीं पाया।
“मेरे उस्ताद महेन्दर मिसिर कहते थे कि कलाकार को अपनी खुशी से ऐसा गाना चाहिए, जिसमें रस, तबियत और मस्ती झलकती हो। अगर तुम अपने गाने में मस्ती नहीं लाओगे, तो दूसरों को मस्ती कहॉ से दे पाओगे? और सचमुच मेरी वह मस्ती चली गई थी। मैं अब आर्थिक तंगी में रहने लगी थी। कई बार मौत को गले लगाने को सोचा, मगर वो हो नहीं पाया। मेरी सारी जमापॅूजी और जेवरात भी एक-एक कर बिक गये। अंतत: एक साजिंदे ने ही मुझे सुझाव दिया कि मैं गीत के साथ नृत्य भी करूँ तो मेरी मुश्किलें दूर हो सकती हैं। आज के रसिक लोग वही पसंद करते हैं, तो हमें भी समय के अनुसार चलना चाहिए। अंत में हार कर और दिल कड़ा कर पहली बार अपने पैरों में पायल बॉधी और उस ‘शनिचरा क्लब’ में अपनी पहली ‘खड़ी महफिल’ की ठुमरी “भूला गई बिंदिया… राजा के पोखरिया में…” गाई थी।
“उसके अगले दिन मेरे पैरों में तेज का दर्द उठा, जो किसी प्रकार ठीक नहीं हो पाया।
“अगले शनीचरा क्लब तक मैं उसी दर्द को झेलती और कराहती रही। वहॉ से बुलावे पर बुलावा आ रहा था। मगर मैं जा नहीं सकी थी। और उसी दिन मैंने उस पायल से एक घुंघरू निकाल उस पायल को घूरे पर फेंक दिया।”
“अब मैं समझा कि वह पॉचवॉ घुंघरू तुम्हारा था।”
अचानक एक धड़ाके की आवाज आई, तो मेरी नींद खुल गई। मैं पसीने से सराबोर था। सामने ही जमीन पर पड़े पॉच घुंघरू और वह मखमली थैलीनुमा बटुआ जैसे मुँह चिढ़ा रहे थे। वे मेरे पास अभी तक हैं। आप चाहें तो मैं उन्हें सबूत के तौर पर पेश कर सकता हूँ।

