*श्री हनुमान जन्मोत्सव एवं 56 भोग पर विशेष*
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*पूरी में जगन्नाथ जी..राम के भक्त को जंजीर में बांधकर अपराधी
की तरह क्यों रखा है?*
जब राजा इंद्रदुम्न ने पुरुषोत्तम क्षेत्र यानी पूरी में भगवान जगन्नाथ के भव्य मंदिर का निर्माण पूर्ण किया तो समुद्र के अधिपति वरुण देव के मन में अपने प्रभु के दर्शन की तीव्र इच्छा जागी। वे जानते थे कि साक्षात नारायण अब उनके तट पर निवास कर रहे हैं। अपनी इसी भक्ति के वशीभूत होकर वरुण देव ने मंदिर की ओर प्रस्थान किया। क्योंकि वरुण देव जल के स्वामी हैं। उनके आगमन के साथ ही समुद्र की प्रचंड लहरें भी नगर की सीमाओं को लांघ कर भीतर प्रवेश कर गई। देखते ही देखते पूरी का एक बड़ा हिस्सा जलमग्न हो गया और मंदिर के प्रांगण तक पानी पहुंच गया। यह कोई साधारण प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि एक भक्त का अपने आराध्य से मिलने का आवेग था जिसने अनजाने में पूरी धाम के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया था। यह स्थिति नगरवासियों के लिए अत्यंत चिंताजनक थी। लोगों के घर बहने लगे और खेती नष्ट होने लगी। तब समस्त नगरवासी अपनी करुण पुकार लेकर श्री जगन्नाथ धाम पहुंचे। उन्होंने महाप्रभु के श्री चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा हे प्रभु यदि आप इस नीलांचल धाम में निवास करना चाहते हैं और चाहते हैं आपकी सेवा करें तो कृपा कर हमें इस संकट से बचाएं। वरुण देव बार-बार आपके दर्शन के बहाने हमारे नगर को डूबा रहे हैं। यदि यही स्थिति रही तो यह सुंदर नगर और आपकी सेवा करने वाले भक्त कैसे जीवित रहेंगे? हे जगत के स्वामी इस विनाशकारी बाण को रोकिए। तब महाप्रभु के मन में एक गहरा विचार चला। वरुण देव का यह प्रेम अब मर्यादा तोड़ रहा है। मेरे दर्शन की उनकी यह प्यास मेरे अन्य भक्तों के लिए संकट बन गई है। इसे रोकने के लिए मुझे एक ऐसे रक्षक की आवश्यकता है जिसके भीतर अथाह शक्ति भी हो और अटूट धैर्य भी। जिसने माता सीता की खोज कर मेरे हृदय के संताप को हरा था वही आज मेरे नगरवासियों के भय को भी हर सकता है। भगवान ने विचार किया कि वरुण देव का जल तत्व है और हनुमान पवन पुत्र है। पवन ही जल की लहरों को नियंत्रित करती है। इसलिए भगवान ने हनुमान जी को बुलाया क्योंकि वे जानते थे कि जो समुद्र को लांघ सकता है वही समुद्र को बांध भी सकता है। यह तुच्छ सेवक धन्य हुआ कि आपने एक बार फिर इस दास को अपनी सेवा के योग्य समझा। हे महावीर तुम इस नीली जलराशि के सम्मुख एक अभेद्य दीवार बनकर खड़े हो जाओ। वरुण देव की एक बूंद भी मेरे भक्तों के आंगन तक नहीं पहुंचनी चाहिए। प्रभु आपके आदेश की गुरुता को मैं समझता हूं। समुद्र की गर्जना मेरे राम नाम के उद्घोष के सामने मौन हो जाएगी। आपकी आज्ञा मेरे लिए अमिट रेखा है। जिसे लांघने का साहस स्वयं वरुण देव भी नहीं कर पाएंगे। जय श्री जगन्नाथ। हे पवन पुत्र मेरा उद्देश्य प्रभु के भक्तों को कष्ट देना नहीं था। मैं तो बस अपने स्वामी के उन नूतन विग्रहों के दर्शन करना चाहता था जो इस भव्य मंदिर में विराजे हैं। लहरों का उफान मेरी भक्ति का आवेग था। हे वरुण भक्ति वही श्रेष्ठ है जो संसार का कल्याण करे विनाश नहीं। प्रभु का आदेश है कि तुम अपनी मर्यादा में रहो। यदि तुमने इस रेखा को लांघा तो मेरी गदा और प्रभु का सुदर्शन चक्र तुम्हारा मार्ग रोक देंगे। यस। उस समय भगवान जगन्नाथ को भोग में केवल खिचड़ी अर्पित की जाती थी जो चावल और दाल से बनी होती थी। वही भोग हनुमान जी को भी दिया जाता था। लेकिन हनुमान जी को अयोध्या में रहते हुए अनेक प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजनों का अनुभव था। अच्छा खिचड़ी। धीरे-धीरे वे केवल खिचड़ी खाते-खाते ऊब गए। हनुमान जी के मन में यह विचार आने लगा। प्रभु की महिमा अपरंपार है और यह खिचड़ी भी दिव्य है। मैं तो वानर सेना का सेनापति हूं। मुझे तो मीठे फल और लड्डुओं का स्वाद प्रिय है। क्या प्रभु को मेरी पसंद याद नहीं? क्या मुझे युगों युगों तक बस इसी खिचड़ी पर गुजारा करना होगा। खिचड़ी से ऊबकर और मीठे व्यंजनों की लालसा में हनुमान जी ने एक युक्ति निकाली। वे जानते थे कि प्रभु जगन्नाथ जो राम ही हैं के बास अयोध्या और अन्य स्थानों पर आज भी उनके मनपसंद भोग लगते हैं। जब भी वरुण देव यानी समुद्र शांत होते हनुमान जी चुपके से अपना पहरा छोड़ते और आकाश मार्ग से उड़कर अयोध्या या वाराणसी पहुंच जाते। वहां वे भरपेट लड्डू, मालपुआ और ताजे फलों का भोग पाते। वे सोचते प्रभु तो भीतर ध्यान मग्न है। उन्हें क्या पता चलेगा? मैं जल्दी से प्रसाद खाकर वापस लौट आऊंगा। लेकिन जैसे ही हनुमान जी वहां से हटते वरुण देव को मौका मिल जाता। समुद्र की लहरें फिर से मंदिर की दीवारों को छूने लगती और पूरी में बाढ़ का खतरा मंडराने लगता। जब यह बार-बार होने लगा तो भगवान जगन्नाथ समझ गए कि हनुमान जी का मन इस खिचड़ी प्रसाद से भर गया है और वे स्वाद के चक्कर में अपनी ड्यूटी छोड़ रहे हैं। हनुमान तुम अपनी जगह क्यों छोड़ रहे हो? क्या तुम्हें मेरी दी हुई खिचड़ी पसंद नहीं? प्रभु आपकी खिचड़ी अमृत है। पर इस वानर को कभी-कभी लड्डुओं की भी याद आती है। हे महावीर तुम तो जानते हो कि मेरे लिए भक्तों के कल्याण से बड़ा कुछ नहीं है। तुम्हारी शक्ति और तुम्हारी भूख दोनों ही असीमित हैं। मुझे प्रसन्नता है कि तुमने अपने मन की बात मुझसे छिपाई नहीं। पर हनुमान पुरी धाम की रक्षा का भार केवल तुम्हारे सबल कंधों पर है। यदि तुम स्वाद के वश में होकर तट छोड़ोगे तो वरुण देव मर्यादा का उल्लंघन करेंगे और मेरे हजारों भक्त जलमग्न हो जाएंगे। हनुमान तुम स्वयं को वश में नहीं कर पा रहे हो। इसलिए अब मैं तुम्हें प्रेम और कर्तव्य की इन स्वर्ण जंजीरों में बांधता हूं। यह जंजीरें तुम्हें दंड देने के लिए नहीं बल्कि इस स्थान पर तुम्हारे अडिग होने का प्रमाण होंगी। जब तक तुम बंधे रहोगे वरुण देव की शक्ति तुम्हें पार नहीं कर पाएगी और ना ही तुम विचलित हो पाओगे। हनुमान जी ने देखा कि वे जंजीरें केवल स्वर्ण की निर्जीव वस्तु नहीं थी। जब उन्होंने जंजीर के हर एक कड़े को ध्यान से देखा तो उन्हें प्रत्येक कड़े पर राम नाम अंकित दिखाई दिया। इतना ही नहीं उन जंजीरों से वही मधुर ध्वनि निकल रही थी जो हनुमान जी के हृदय में सदैव गूंजती रहती है। राम राम राम हे महाप्रभु मैं कितना अज्ञानी था जो इसे दंड समझ रहा था। आपने तो मुझे दंड नहीं बल्कि अपना साक्षात नाम पहना दिया है। यह भेड़ियां स्वर्ण की नहीं है। यह तो आपके नाम की शक्ति है। प्रभु इस संसार में हनुमान के लिए राम नाम के बंधन से बड़ा कोई मोक्ष नहीं है। हे अंजनी पुत्र संसार तुम्हें अनेक नामों से जानता है। किंतु यहां तुम्हारी ख्याति बेड़ी हनुमान के रूप में होगी। जो भी भक्त जगन्नाथ धाम आएगा वो तुम्हारे इस स्वरूप का दर्शन कर यह सीखेगा कि भगवान का नाम राम नाम की बेड़ी ही जीव को भटकने से रोकता है। तुम इसी तट पर दरिया महावीर बनकर मेरे धाम की रक्षा करोगे। हनुमान सुनो आज से मैं इस पूरी धाम की मर्यादा और तुम्हारी तुष्टि के लिए एक नई परंपरा का आरंभ करता हूं। आज से इस मंदिर की रसोई साक्षात महालक्ष्मी के संरक्षण में होगी। अब से यहां केवल खिचड़ी नहीं बल्कि छप्पन भोग का विधान होगा। इसमें तुम्हारे प्रिय लड्डू भी होंगे, मालपुआ भी होगा और वह दिव्य पोड़ा पीठा भी होगा। जिसकी सुगंध पाकर स्वयं देवता भी स्वर्ग छोड़कर यहां दौड़े आएंगे। मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि 56 प्रकार के इन व्यंजनों का विस्तार इतना विशाल हो कि मेरे भक्त को कभी किसी और द्वार की ओर न ताकना पड़े। हनुमान यह 56 भोग मेरे और तुम्हारे प्रेम का प्रतीक होंगे। आज से जगन्नाथ पुरी का महाप्रसाद दुनिया का सबसे पवित्र अन्न होगा। जिसे पाकर मनुष्य जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो जाएगा। नील माधव हे नील माधव मैं केवल मुट्ठी भर लड्डुओं के मोह में भटक रहा था। पर आपने तो मेरे बहाने समस्त चराचर जगत के लिए अमृत का द्वार ही खोल दिया। आज इस हनुमान ने जान लिया कि आपके चरणों को छोड़कर कहीं और सुख खोजना केवल मृत तृष्णा है। प्रभु आपकी जय हो। आपके इस महाप्रसाद की जय हो। हनुमान जी ने एक हाथ में अपनी गदा संभाली और दूसरे हाथ से अपनी बेड़ियों को माथे से लगाया। भगवान जगन्नाथ मंद मंद मुस्कुराते हुए मंदिर के गर्भगृह की ओर लौट गए। उसी दिन से पूरी में महाप्रसाद और छप्पन भोग की परंपरा शुरू हुई। वरुण देव ने अपना सिर झुका लिया और हनुमान जी दरिया महावीर बनकर अनंत काल के लिए पहरे पर बैठ गए। आज भी पूरी जाने वाला हर भक्त जानता है कि मंदिर के भीतर जो शांति है वो बाहर खड़े उसी महावीर की पहरेदारी का फल है जिसे भगवान ने खुद राम नाम की बेड़ियों में बांधा था।
*जय जगन्नाथ*
*पंडित ओम प्रकाश ओझा रतलामी (राष्ट्रीय संगठन मंत्री) राष्ट्रीय भ्रष्टाचार निरोधक संघ भारत*

