*हनुमान जन्मोत्सव पर विशेष*
परम प्रिय सनातनी हनुमान भक्त प्रेमीयो कितनी विडंबना है कि हम जिन रामदास हनुमान जी को अपना भगवान ईष्ट व कलयुग के कल्याणकारी देव कहते व मानते हैं उन्हें हम बंदर कहते व मानते हैं जबकी हनुमान जी बंदर ना होकर वानर थे
1- वानर – वन मे रहने वाले मानव रुपी पुंछधारी विशिष्ट शक्ति शाली हवा में उड़ने की कोशलता में दक्ष एक स्थान से दूसरे स्थान पर कुद कर के पहुंचने की विशिष्टता रखने वाले वनवासी मानव रुपी वानर ,
2- हनुमान जी सामान्य मानवों से कहीं हजारों लाखों गुना अधिक व्याकरण के प्रकांड ज्ञाता व गायन व संगीतज्ञ के विद्वान थे जो की किसी पशु (बंदर)मे ये गुण विद्यमान नहीं होते हैं
3- हनुमान जी उस समय की वनवासी वानर जाती के थे जो कि आम सामान्य मानव की तरह कपड़े पहनते थे व बोलते थे फिर भी इनका रहन सहन सामान्य मानवों से भिन्न रहता था,
4- हनुमान जी वन में रहने के कारण वन के जानवरों की बोली का भी ज्ञान था व उनकी आवाज का अर्थ जानते थे साथ ही साथ उनकी बोली मैं बोलना भी आता था जिससे वन के पशु आपकी आज्ञा का पालन करते थे,
5 – हनुमान जी की माता अंजना जी एक रुपवती अप्सरा थी जिनका नाम पुंजिकस्थला था जिन्होंने ऋषीयो के आयोजन में बाधा उत्पन्न की थी जिससे रुष्ट होकर ऋषी दुर्वासा जी ने उन्हें वानरी होने का श्राप दे दिया था जिस कारण माता अंजना जी वानरी रुप धारण हो चुकी थी व शिव के अंशावतार हनुमान को जन्म देने के बाद वानरी रुप से मुक्त हुईं थी जिससे भी हनुमान जी वानर रुप में हुएं थे
*अतः समस्त सनातन प्रेमीयो से निवेदन है कि भगवान हनुमान जी को बंदर ना कहें व ना बंदर मानें हनुमान जी पुर्ण रुपेण मानव है उनकी विशीष्टता मानव से प्रथक सिर्फ पुंछ ही है*
वैसे भी पोराणीक ओर तार्किकता से भी वे ( वानर जाती ) वानर मानव के ही स्वरुप थे

