अंतर्जातीय विवाह धर्मशास्त्र का नही समाजशास्त्र का विषय है, यह ना समझ ही उन्माद का कारण बनती है।
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अंतरजातीय विवाह अब समाज के अंग हो गए हैं, अत हमे तिरस्कार की बजाय इन्हे समाज का भाग स्वीकार किया जाना आधुनिक समाज शास्त्र का हिस्सा है।
🌕 बिश्नोई समाज का अपना समाजशास्त्र है बिश्नोई समाज की स्थापना भी सभी समाजों की समन्वित दृष्टिकोण से चुन चुन लिया रत्न मोती के अनुसार हुआ है। समय के साथ में हर जगह परिवर्तन होता है उस परिवर्तन को स्वीकार करने की सबसे अधिक क्षमता बिश्नोई समाज में होना लाजमी है और यही हमारे समाज की विशेषता भी है।
वर्तमान में अंतरजातीय विवाह को लेकर के समाज में जिस तरह से एक दूसरे पर प्रहार किया जा रहा है वह समाज के हित में नहीं है।
यह सामाजिक स्वीकृति मिल जानी चाहिए। स्वीकृति के लिए किसी भी समाज में एनओसी का कार्यालय नही है। अत हमें बिश्नोई समाज को दो श्रेणियों में पढ़ना चाहिए। और संतो की भी दो श्रेणी स्वीकार करनी चाहिए। संत भी समाज के हिस्से है।
समाज की श्रेणी ए और श्रेणी बी ।
बिश्नोई धर्म इसाई, इस्लाम की भांति ग्रहण करने बिश्नोई बन सकते हैं जबकि यहूदी में सिर्फ़ जन्म से ही यहूदी बना जा सकता है यथा हिंदू भी।
अत बिश्नोई धर्म में प्रवेश की गुंजाइश स्थापना से रही है और अब समाज से किसी को किनारे के बजाय इसका समाधान खोजना समझदारी है।
यह चर्चा निरर्थक है कि बड़ो को कोई कहता नही है और सामान्य का जीना हराम कर देते हैं। ऐसा नहीं होता है।
कृष्ण कुमार IPS की शादी ने हमे मजबूर किया है बिश्नोई समाज शास्त्र पर नव अनुसंधान , नव लेखन जरूरी है। इस शादी ने 1857की क्रान्ति में चर्बी वाली कारतूस का काम किया है।
सर्वप्रथम मस्तिष्क को इतना विस्तार देना चाहिए कि समाज का निर्माता और निर्णायक (अंपायर) कोई नही होता। धर्मशास्त्र में धर्म के व्याख्याता सन्त विद्वान हों सकते हैं। समाजशास्त्र समाज में जो परिर्वतन हों रहा है उनकी स्वीकृति और विरोध एक अति सामान्य भाग है, कभी सती प्रथा समाज का हिस्सा रहा, अब अपराध है। मगर धर्मशास्त्र मे सती अभी सर्वोच्च है और रहेगी।
बिश्नोई समाज की बात करें तो ए श्रेणी मे वे लोग है जिन्होने अपनी और अपने बच्चो के रिश्ते समाज में किए हैं। इन्हे बहुत मान सम्मान देना चाहिए। ये लोग समाज के रत्न है। चाहे छोटा या बड़ा। इनमे प्रमुख है भजनलाल जी, हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे, केन्द्र में मिनिस्टर और सता बचाने में मुख्य किरदार रहें। उन्होनें अपने बेटो की शादी समाज में की। वे चाहते तो आधुनिक विश्व के सबसे बडे़ सियासती परिवार गांधी परिवार में प्रियंका गांधी को अपने परिवार का हिस्सा बना सकते थे, मगर चयन रेणुका का किया। एक बेटे ने गलत काम किया तो उनकी लाही/दंड भरा, मुकाम में चुगा डाल दिया। चंद्रमोहन की बजाय समाज में कुलदीप बिश्नोई को स्वीकृति मिली। मंच भी और सम्मान भी। कुलदीप जी ने कोई गलती नही। इसी धारा के राम सिंह जी बिश्नोई है, इन्होंने अपने बेटे बेटियों के रिश्ते समाज में किए। और छोटे छोटे मुद्दे जिनमें अपनी संतान पर क्राइम के आरोप लगे, तो भी इस्तीफा दिया, पद ठुकरा दिया, इतनी नैतिकता का पालन किया। पीछे मलखान सिंह ने भी अपनी शादी और रिश्ते समाज में किए, समाज को सर्वोच्च माना। इस प्रकार पूनमचंद जी, रूगनाथ जी आदि सभी लोग समाज में ए श्रेणी के है उन्हें खुलकर सम्मान मिलना चाहिए।
इस श्रेणी में अधिकारियों में पहले युवा आईपीएस अधिकारी के रुप में कैलाश चंद बिश्नोई (IG bharatpur) है, इन्होंने अपार ऑप्शन के उपरांत अपनी शादी समाज में की। वे मलखान सिंह जी के जवाई है ऐसे ही प्रेमसुख डेलू IPS , परी बिश्नोई IAS आदि एक लंबी लाइन है इन्हे बहुत आदर सम्मान मिलना चाहिए।
दूसरी बी श्रेणी है कि जिनमें प्रमुख है चंद्र मोहन जी (पूर्व उप मुख्यमंत्री), जिन्होने अन्य समाज में रिश्ता कर लिया। अब चाहे कुलदीप जी के एक बच्चे ने ऐसा रिश्ता किया हों, चाहे पूनमचंद जी के परिवार में किसी पोते, दोहिते ने किया हों, वे इस श्रेणी B में है, उन्हें समाज का हिस्सा माना जाना चाहिए और है भी। बेटा अंतरजातीय विवाह करें तो बाप पर आरोप नही लगाया जाए। मां बाप को ताना नही मारना चाहिए, वरना बे सब समाज से अलग हों जाएंगे। कोई ओलाद बाप के निर्णय से न जॉब, हवन, और न विवाह करते हैं, ये अपवाद है, अपवाद कभी मूल धारा नही हो सकती है मगर समाज के हिस्से तो है ही। जिन्होने अंतरजातीय विवाह किया है वे समाज के मंच का उपयोग नाही करेगा। मंच का मतलब समाज की पंचायती। बाकी मंच पर तो हर जाति, धर्म के आदमी को भी बैठाना पड़ता है समय के अनुरूप। जैसे भव्य बिश्नोई, महेंद्र सिंह बिश्नोई, अनुराग बिश्नोई समाज का मंच का उपयोग करें मगर चैतन्य बिश्नोई, अनुराग जी का लड़का आदि मंच (समाज की पंचायती/निर्णय) न करें, और करते भी नहीं है।
अधिकारियों में IPS ममता बिश्नोई, रवि बिश्नोइ IAS, कृष्ण कुमार आईएएस श्रेणी बी में है। इन्हे हमारे समाज का प्रमुख हिस्सा मानना चाहिए। स्वीकार करना चाहिए। इनका बहिष्कार नही करना चाहिए। मगर समाज की पंचायती का मंच नही मिलेगा, यह अहसास होना चाहिए।
जिनके मां बाप बिश्नोई है, जिनका जन्म बिश्नोई समाज में हुआ, उन्हें अपनाने से तो इंकार कर सकते है, समाज सभी की निधि है।
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जैसे मैं कपड़े की दुकान पर गया। मैने कहा कि महंगा रेट कम करों, उन्होनें तुरंत दूसरा थान लाया और बोला ये लो, एक जैसा दिखेगा और 120मीटर,। मैने उनके ही ठीक कर दो, बोले कि ब्रांड है सा, 260मीटर के हिसाब से ही लगेगा मैंने पूछा कि कया आप समाजशास्त्र के स्टूडेंट रहे हों?
मतलब हमे कोई रिश्ते के कहे तो हमारे पास ऑप्शन है हम कह सकते है कि हमारे पास दो तरह के लोग उपलब्ध है। भजनलाल जी वाली ए श्रेणी के और चंद्र मोहन जी वाली बी श्रेणी के। दोनो बिश्नोई है दिखने में कोइ फर्क नही है और जो फर्क है वो सामने है। समाज के दोनो हिस्से है। दोनो सम्मानित है
🌕 संतो में भी दो श्रेणी है एक पीठेश्वर रामानंद जी आदि सभी संत है जो हमेशा समाज की मर्यादा में रहते हैं, संवेदनशील रहते हैं, समाज के साथ रहते हैं।
दूसरी श्रेणी में वे संत है जो बिश्नोई सन्त है, कांतिकारी दिखते हैं मगर लालदास जी की भांति कभी गाली से, कभी अंग प्रदर्शन से मर्यादा भंग कर देते है और गोवर्धन राम जी आचार्य की अन्य को कड़ा निर्देश देते हैं कि ये करों, वे करों मगर स्वयं बिश्नोई साधुओं का आदर्श ड्रेस कोड है भंगवा वेश, धारण नही करते हैं ओर न सफाई देते हैं। ऐसे सन्त स्वयं को समाज के स्पाइडरमैन मानते हैं। वे सोचते हैहम से पूछने वाले? हम क्यो कहे।
दोनो श्रेणी के संत समाज के प्रमुख हिस्से है। दोनो में से गलत कौन है, सही कौन, यह निर्धारण का विषय नही है, विषय इतना ही है कि समाज में दो श्रेणी है तो समाज में भी।
राजस्थान में बिश्नोई समाज की चर्चित शादी कृष्ण कुमार आईपीएस की ने सवाल खड़े किए। इसमें कृष्ण कुमार के पिताजी और उनके भाई भजनलाल जी आदि श्रेणी ए के ही है कृष्ण कुमार आईपीएस ने शादी की है। वे समाज के हिस्से है और इनको बहुत लग्न, मेहनत से, दुगुनी ऊर्जा से समाज हित में काम करना चाहिए। समाज में कृष्ण कुमार हो, या ममता बिश्नोई हो, काम करने की, समाज का सदुपयोग करने की छूट है और इनको लेकर बयान बाजी अच्छी बात नहीं है। जब निर्णय लिया गया तो विरोध हुआ, यह विरोध भी सामाजिक था, उन से अगले को लगता है कि निर्णय गलत हुआ है और सही साबित करने के लिए इसको टास्क के रुप में स्वीकार करना चाहिए।।
आपकों कौन सी श्रेणी सही लगती है उनका हिस्सा बनना चाहिए। श्रेणी को मिटा नही सकते, क्योंकि समाज में परिर्वतन समय के अनुरूप होगा। उसको रोका नही जा सकता हैं। धार्मिक व्यवस्था स्थाई है, उनमें परिर्वतन नही होता है वह सनातन का विषय है।