यूपीएससी अथवा यूपीपीसीएस में सम्मिलित होने वाले प्रतियोगी छात्र छात्राओं के लिए पुलिस विभाग यानी आईपीएस या पीपीएस सेकंड चॉइस होती थी। पर अब बहुत सारे प्रतियोगी छात्र पुलिस को काफी नीचे रख रहे हैं और अक्सर यह कहा जा रहा है की अगर किसी के पास कोई विकल्प है ।
तो वह पुलिस सेवा का चयन नहीं करना चाहता है और वेहतर विकल्प मिलने पर लोग पुलिस की नौकरी छोड़ रहे हैं — यह एक कड़वी सच्चाई है और इसके पीछे पुलिस की बदलती कार्यप्रणाली है पर उनकी अंतरात्मा के दुखों को सुनने वाला कोई नहीं है ।
आज देशभर के थानों में पुलिस कर्मचारियों के मन में बढ़ती थकान, बेबसी और मोहभंग पर कोई चर्चा नहीं करना चाहता है। पुलिस के बारे में अगर चर्चा होती है तो यही कि पुलिस भ्रष्ट है पुलिस कार्य नहीं कर रही है पुलिस किसी की सुनती नहीं है और पुलिस हर व्यक्ति के लिए एक जादू की छड़ी बन गयी है।
और पुलिस कर्मी अपनी नौकरियां छोड़ रहे या अपने बच्चो को अब पुलिस सेवा आने देना नही चाहते हैं
पर ऐसा क्यों हो रहा है?
इसको सोचने की किसी ने जरूरी ही नहीं समझा क्योंकि समाज में सरकारी नौकरी हर किसी को चाहिए चाहे वह उसके योग्य हो अथवा न हो पर अगर अच्छे लोग पुलिस में नहीं आएंगे तो धीरे-धीरे पुलिस विभाग में गिरावट आ जाएगी।
पुलिस में आने वालों में कमी नहीं दिखाई पड़ेगी पर अच्छे लोग दिखाई नहीं देंगे ।
पुलिस के थाने अथवा पुलिस कार्यालय के चारों तरफ नौकरशाही का जाल फैल गया है।
पुलिस का कार्य जानमाल की सुरक्षा करना होता था पर अब जान माल की सुरक्षा के साथ-साथ पुलिस का कार्य रिपोर्ट तैयार करना फॉर्म भरना और दुनिया भर के डाटाअपलोड करना बन गया है।
पूरे दिन फोटो भेजना प्रमाण पत्र देना रिपोर्ट अपलोड करना ” ई- साक्ष्य अपलोड, ऑनलाइन सीडी ,सीसीटीएनएस अपडेशन,ITSSO, eDAR अपलोड रोजमर्रा का कार्य है
अब फील्ड में उनकी उपस्थिति उतनी नहीं हो पाती है ।
जितनी स्क्रीन के सामने होती है ।
पुलिस बेसिक पुलिसिंग से हटकर तकनीक पर अत्यधिक निर्भर होती जा रही है हर कार्य में डिजिटल टूल, ऐप्स और स्मार्ट बोर्ड थोपे जा रहे हैं।विषय, कार्य स्थल की परिस्थितियां, सामाजिक संस्कृति, क्षेत्रीय विषमताएं या संदर्भ को बिना समझे आदेश दिए जाते हैं।
पुलिस कार्य प्रणाली से मानवीय स्पर्श, मूलभूत कार्य अब गायब हो गया है; पुलिस अब मशीन-केंद्रित बन गई है।
फील्ड सीईओ इंस्पेक्टर वास सब इंस्पेक्टर से लेकर बीट कांस्टेबल अपराधों के अनावरण में बेसिंग पुलिंग से दूर होकर तकनीक पर निर्भर हो गए हैं।
सीसीटीवी कैमरा हुआ मोबाइल के कमांडर अगर उपलब्ध नहीं है तो पुलिस के लिए कोई भी केस का अनावरण एक टेढ़ी खीर हो गया है।
इसके अतिरिक्त पुलिस को अब एक इवेंट मैनेजर की तरह कार्य भी करना पड़ रहा है हर दिन कोई न कोई दिवस मनाना होता है ।
जैसे योग दिवस, राष्ट्रीय एकता दिवस मातृभाषा दिवस, पर्यावरण दिवस आदि, और धीरे अब पुलिसिया गुणवत्ता नहीं, बल्कि कार्यक्रमों की संख्या और दिखावा ही सफलता का पैमाना बनता जा रहा है।
पुलिस अधिकारी और कर्मचारी दोनों इस प्रदर्शन संस्कृति के जाल में फंसे हुए हैं।
लोगों को जान माल की सुरक्षा के साथ-साथ उन्हे विद्यालयों में आत्म रक्षा प्रशिक्षण, शक्ति मिशन साइबर सुरक्षा अभियान, पॉक्सो एक्ट की जानकारी देना, ऑपरेशन गरिमा, सीएलजी मीटिंग्स, सुरक्षा सखी, ग्राम रक्षा दल, ट्रांसजेंडर लोगो के सम्मेलन करवाने के अलावा भिक्षा वृत्ति उन्मूलन, सड़क सुरक्षा, त्रिनेत्र अभियान अभय कमांड कैमरों की निगरानी करनी पड़ती है।
पुलिस को यह बताना है कि आप खुले लावारिस गाड़ी पार्क ना करें सीसीटीवी कैमरा लगवाएं घर को अकेला ना छोड़े किसी पुलिस अधिकारी के नाम से कॉल आने पर उसको पैसा ट्रांसफर ना करें किसी लालच में ना पड़े।
किसी साइबर अपराधी की कॉल को भली बात चेक कर लें एपीके फाइल डाउनलोड ना करें नौकरी दिलाने के नाम पर किसी को पैसा ना दें।
हेलमेट लगाकर चले सीट बेल्ट लगाए ओवरलोडिंग ना करें वाहनो में ज्यादा सवारी ना बैठा ले यही सब सलाह देने में पुलिस का आधा समय नष्ट हो जा रहा है और लगातार फिल्मों से सोशल मीडिया पर हो रही आलोचनाओं ने पुलिस कर्मियों का आत्मविश्वास तोड़ दिया है।
कहीं भी किसी भी जगह कोई पुलिसकर्मी घूस लेते रिश्वत लेते पकड़ा जाता है तो सोशल मीडिया पर इस तरह की पोस्ट डाली जाती है जैसे लगता है कि पूरा पुलिस विभाग ही भ्रष्ट है जबकि उसको पुलिस विभाग के लोग ही पकडते हैं और यह कोशिश करते हैं कि विभाग में एक संदेश जाए पर किसी अच्छे कार्य को कभी भी किसी सोशल मीडिया पर किसी के द्वारा दिखाया गया हो यह बहुत कम है ।
अच्छे और मानवीय कार्यों को स्वयं ही दिखाना पड़ता है ।
पहले पुलिस के सिपाही एक विश्वसनीय साथ होते थे।
कहा जाता था कि मेरी ना मानो तो सिपहिया से पूछो पर अब तो हर काम का सबूत मांगा जाता है —पुलिस का विश्वास समाप्त हो गया है।
तनाव और व्यवहारिक समस्याओं से जूझते-जूझते पुलिस कर्मी भावनात्मक रूप से थक चुके हैं।
माता-पिता, परिवार की परवरिश तो दूर मिलने का भी संकट रहता है,सामाजिक कार्यक्रमों में उपस्थिति तो हो ही नहीं पाती है और इसके बावजूद इन सभी की अवास्तविक अपेक्षाएं जिससे हर समय मानसिक दबाव झेलना पड़ता है।
भले ही कहा जाता है कि आंकड़े का कोई महत्व नहीं है पर सच यह है कि थाने पर आंकड़े पूरा करने का भारी दबाव रहता है।
पंजीकरण को बहुत ही सरल बना दिया गया है पर आंकड़े लेकर हर व्यक्ति पुलिस विभाग के पीछे पड़ा हुआ है ।
कोई भी अपराध होने पर संबंधित पुलिस अधिकारी पर इतना दबाव रहता है ।
जैसे लगता है कि उसी ने ही अपराध किया हो
अनर्गल कार्यों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
चाहे उसकी जरूरत हो या नहीं, चाहे वे पुलिस से संबंधित है या नहीं। बाढ़ आ गई है नहर की पुलिया टूट गई है बिजली नहीं आ रही है।
लोगों ने अतिक्रमण कर रखा है तेंदुआ गांव में घुस आया है जाम लगा है हर कार्य में पुलिस की उपस्थिति अनिवार्य हो गई है।
बारात जा रही है सड़क जाम है।
पुलिस को ही आकर बताना है कि बारात किनारे से ले जाएं पुलिस विभाग से अब समाज कल्याण विभाग के कार्य कराई जाने की अपेक्षा सभी ने पाल रखी है

