कानपुर में अनवरगंज पुलिस को सूचना मिलती है कि एक व्यक्ति पुलिस की वर्दी में घूम रहा है, दिखने में संदिग्ध लग रहा है।
पुलिस की एक टीम वहां पहुंचती है।
शख्स का नाम होता है संजय कुमार।
पूछताछ शुरू होती है तो पता चलता है कि दरोगा साहब तो फर्जी है। हालांकि पुलिस की वर्दी तो असली वाली है।
उस पर लिखा नाम वह भी असली है लेकिन जो शख्स है ।
वह असली दरोगा नहीं है।
साहब के पास एक i20 कार भी है।
उस कार कि जब जांच की गई तो पता चला कि अंदर से लाइटर जलाने वाली पिस्तौल मिली।
साथ ही साथ प्लास्टिक की बुलेट्स मिली।
फर्जी आई कार्ड मिले, और वह आई कार्ड सिर्फ पुलिस के ही नहीं बल्कि सीबीआई के भी थे।
इससे भी रोचक बात यह है कि साहब ने अपनी कार के ऊपर जो नंबर प्लेट लगा रखा था वह भी फर्जी था।
वह लखनऊ के ज्वाइंट कमिश्नर का नंबर प्लेट था।
इस फर्जी दरोगा का काम यह था कि….
अपनी नकली पिस्तौल के दम पर वसूली करना, कॉलेज में कोचिंग कैंपस में इंटरव्यू होस्ट करना……
और भी कई सारी चीज यह करते आ रहा था।
मतलब फर्जी दरोगा, फर्जी पुलिस वालों की खबरें इतनी ज्यादा आ रही है कि हमें लगता है कि अब कोई भी पुलिस वाला अगर हमारे पास आकर हमसे हमारा पहचान पूछे, तो उससे पहले हमें उससे उसकी पहचान पूछ कर यह चीज स्पष्ट करनी पड़ेगी कि, भैया तुम ओरिजिनल हो ना….. फर्जी वाले तो नहीं हो।

