आजकल की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम अक्सर भूल जाते हैं कि सफलता का असली मतलब क्या होता है।
पहली तस्वीर में वो स्त्री, जिसने शायद करियर में बहुत कुछ हासिल किया है – नाम, शोहरत, पैसा, पोजीशन। लेकिन सफलता के शिखर पर पहुँचकर भी उसका दिल इतना छोटा है कि अपने साथी की छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा निकालती है, फटकार लगाती है, शायद इसलिए कि अब वो खुद को “बड़ा” समझने लगी है। स्वार्थ की वो आग इतनी तेज़ है कि प्रेम, समझदारी, धैर्य – सब जलकर राख हो जाता है।
और दूसरी तस्वीर… वो दिल छू लेती है। कैंसर जैसी भयानक बीमारी, जहाँ हर दिन मौत से लड़ाई होती है, दर्द असहनीय होता है, कमज़ोरी चरम पर होती है। ऐसे में भी वो औरत अपने पति के साथ है – सिर उसके कंधे पर टिकाए, मुस्कुराती हुई, जैसे कह रही हो – “हम साथ हैं, सब ठीक हो जाएगा।” कोई शिकायत नहीं, कोई बहाना नहीं। बस साथ निभाने का वादा, जो शब्दों से ज़्यादा एक्शन में दिखता है।
ये दो तस्वीरें हमें सवाल पूछती हैं:
क्या सफलता वही है जो हमें दूसरों से ऊपर उठा दे, या वो जो हमें और ज़्यादा इंसान बनाए?
क्या हम अपने पार्टनर को तब भी वैल्यू देते हैं, जब वो हमारी “सफलता” के लेवल पर न हों?
क्या हम वादा निभाते हैं – “सुख-दुख में साथ निभाने” का, या सिर्फ़ अच्छे दिनों में साथ रहना आसान लगता है?
जो औरत कैंसर वाले पति के साथ बेड पर लेटकर भी हँस रही है – वो असली “स्ट्रॉन्ग वुमन” है। क्योंकि ताकत सिर्फ़ पैसे या पावर में नहीं, बल्कि प्यार, करुणा और वफ़ादारी में होती है।
और जो औरत सफल होकर भी अपने साथी को नीचा दिखाती है – वो शायद बाहर से चमक रही है, लेकिन अंदर से खोखली है।
रिश्ते पैसे से नहीं, प्रेम और साथ से बनते हैं।
अगर आपके पास वो इंसान है जो आपके सबसे बुरे दिनों में भी आपके साथ खड़ा रहे –
तो समझ लीजिए,
आपने असली ख़ज़ाना पा लिया है।
#राहुल_आर्यन

