*स्वामी विवेकानंद *नरेंद्र कुमार* *की 163 वी जयंती से पुर्व विशेष लेख*
मेरे भाइयों और बहनों,
मैं आज यहाँ किसी देश का प्रतिनिधि बनकर नहीं आया हूँ। मैं किसी संप्रदाय का झंडा उठाकर नहीं आया हूँ। मैं किसी मत की विजय-घोषणा करने नहीं आया हूँ।
मैं आज यहाँ मनुष्य की पीड़ा की आवाज़ बनकर आया हूँ।
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जब मैंने पहली बार आपको “मेरे भाइयों और बहनों” कहा, तो उस क्षण इस सभागार में जो निस्तब्धता छा गई, वह किसी भाषण-कौशल का परिणाम नहीं थी-
वह आत्मा की पहचान थी।
क्योंकि जब मनुष्य मनुष्य को भाई और बहन कहकर पुकारता है, तो धर्म दीवार नहीं रहता। वह सेतु बन जाता है।
मै उस देश से आया हूँ जहाँ सभ्यता का आरंभ हिंसा से नहीं, ध्यान से हुआ। जहाँ जंगलों में रहने वाले ऋषियों ने राजाओं को नहीं, मानवता को शिक्षित किया। जहाँ यह कहा गया- “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।”
सत्य एक है, पर उसे देखने की दृष्टियाँ अनेक हैं। मित्रों, यह कोई काव्य-पंक्ति नहीं है। यह मानव इतिहास का सबसे साहसिक उद्घोष है।यह उद्घोष कहता है- “तुम अलग हो सकते हो, पर शत्रु नहीं हो सकते।”
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मैंने इतिहास पढ़ा है।
मैंने देखा है- धर्म के नाम परए नगर जले, राज्य टूटे, माताओं ने अपने पुत्र खोए। यदि कोई मुझसे पूछे- मानव सभ्यता की सबसे बड़ी विडंबना क्या है? तो मैं कहूँगा- ईश्वर के नाम पर किया गया अमानवीय व्यवहार।
मनुष्य ने अपने भय को धर्म कहा,
अपने अहंकार को सत्य कहा,
और अपनी हिंसा को ईश्वर की इच्छा कहा।
और फिर उसने मनुष्य को मार डाला। यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान है, तो क्या उसे हमारी तलवारों की आवश्यकता है?यदि सत्य अटल है, तो क्या उसे हमारी घृणा का सहारा चाहिए?
नहीं, मेरे मित्रों। ईश्वर को बचाने की आवश्यकता नहीं
मनुष्य को बचाने की आवश्यकता है।
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मैं इस मंच से स्पष्ट कहता हूँ – कट्टरता, संकीर्णता, और असहिष्णुता मानव समाज के सबसे बड़े शत्रु हैं। इन्होंने संसार को रक्त में डुबोया है।
उपनिषद कहते हैं- “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।” अर्थात दुर्बल आत्मा सत्य को प्राप्त नहीं कर सकती। और मैं आपसे कहता हूँ- घृणा दुर्बलता है।डर दुर्बलता है। दूसरे के विश्वास से भय, सबसे बड़ी दुर्बलता है।
तो साहस क्या है?
साहस है- भिन्न मत को सुनने का धैर्य। साहस है- असहमति के साथ भी मानवता बनाए रखना। मेरे देश में एक पुराना दृष्टांत है। एक मेढक कुएँ में रहता था। वह उसी कुएँ को संपूर्ण संसार मानता था।
एक दिन समुद्र का मेढक आया। उसने कहा- “मैं ऐसे जल में रहता हूँ जिसकी कोई सीमा नहीं।” कुएँ का मेढक हँसा।
उसने कहा- “असंभव! मेरे कुएँ से बड़ा कुछ हो ही नहीं सकता।”
मित्रों, जब कोई धर्म यह कहता है- “मेरे बाहर सत्य नहीं,” तो वह उसी कुएँ का मेढक बन जाता है। और उस क्षण वह ईश्वर को सीमित कर देता है।
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आप में से कई पूछते हैं- “तो क्या सभी धर्म समान हैं?” मैं उत्तर देता हूँ- सभी धर्म मार्ग हैं। मार्गों का मूल्य उनकी दिशा से तय होता है। यदि कोई मार्ग आपको करुणा की ओर ले जाए, सेवा की ओर ले जाए, त्याग की ओर ले जाए- तो वह पवित्र है।
यदि कोई मार्ग- आपको घृणा सिखाए, हिंसा सिखाए, मनुष्य को मनुष्य से अलग करे। तो वह मार्ग ईश्वर की ओर नहीं जाता।
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धर्म का उद्देश्य conversion नहीं है। धर्म का उद्देश्य transformation है।धर्म आपको यह नहीं सिखाता कि दूसरा क्या है। धर्म आपको यह सिखाता है कि आप स्वयं क्या हैं।
छांदोग्य उपनिषद कहता है- “तत्त्वमसि।”
याने तू वही है।
जिस दिन मनुष्य यह अनुभव कर लेगा, कि सामने खड़ा व्यक्ति उससे भिन्न नहीं है, उसी दिन धर्म अपने शिखर पर होगा।
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धर्म की कसौटी, सेवा है। यदि आपका धर्म, आपको भूखे को भोजन देना नहीं सिखाता, पीड़ित के आँसू पोंछना नहीं सिखाता, और दुर्बल के साथ खड़ा होना नहीं सिखाता। तो वह धर्म नहीं है।
वह केवल पहचान है।
ईशोपनिषद कहता है- “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।” अर्थात कर्म करते हुए जीना हीधर्म का मार्ग है। सेवा ही धर्म का मूर्त रूप है।
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दोस्तों। मैं उस भारत से आया हूँ, जहाँ यहूदियों ने शरण पाई, जहाँ पारसियों ने घर पाया, जहाँ मतभेदों को मिटाया नहीं गया। उन्हें जीने दिया गया। क्योंकि हमने सीखा – “वसुधैव कुटुम्बकम।”
यह समस्त पृथ्वी, एक परिवार है।
आज की दुनिया और अधिक उपदेश नहीं चाहती। वह चरित्र चाहती है। और अधिक ग्रंथ नहीं चाहिए। उसे अधिक अच्छे मनुष्य चाहिए। धर्म को विवाद मत बनाइए। धर्म को सेतु बनाइए।
एक-दूसरे से यह मत पूछिए- “तुम किस धर्म के हो?”
पूछिए कि “तुम कितने मानवीय हो?”
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मेरे भाइयों और बहनों, मैं भविष्य से भयभीत नहीं हूँ। क्योंकि मैं देख रहा हूँ – आज भी मनुष्य एक-दूसरे को सुन सकता है।
यदि आज आप यहाँ से केवल एक बात लेकर जाएँ, कि आप घृणा नहीं फैलाएँगे, कि आप सेवा को धर्म बनाएँगे। तो मेरा यहाँ आना सार्थक हो जाएगा। मैं अपनी बात एक आदेश से नहीं, एक प्रार्थना से समाप्त करता हूँ।
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।
मेरे भाइयों और बहनों। उठो, जागो, और तब तक मत , रुको जब तक मनुष्य मनुष्य से प्रेम करना, फिर से न सीख ले।
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(नरेन्द्रनाथ दत्त, की 11 सितंबर 1893 को शिकागों की विश्व धर्म संसद मे दी गई मशहूर स्वीच, जिसमे उन्हे स्वामी विवेकानंद के नाम से पूरी दुनिया मे मशहूर कर दिया।)
*पंडित ओम प्रकाश ओझा रतलामी राष्ट्रीय भ्रष्टाचार निरोधक संघ भारत*

