बुढ़ियाबारी : एक गाँव, एक साझी विरासत
2003 में पहली बार बुढ़ियाबारी
गाँव के एक परिवार में जाने का अवसर मिला। वह अनुभव आज भी स्मृतियों में जीवंत है। उस घर के मुखिया और पूरे क्षेत्र के प्रमुख, आदरणीय स्वर्गीय श्री रामपति यादव जी थे। आज़ादी के बाद से अपने अंतिम समय तक लगभग पचास वर्षों तक वे ब्लॉक प्रमुख रहे — यह अपने-आप में असाधारण उपलब्धि थी।
मैं अपनी बहन के रिश्ते के सिलसिले में वहाँ गया था। उस समय मेरी उम्र बहुत कम थी और मेरे साथ मेरे बाबा अभिभावक की भूमिका में थे। प्रमुख जी की उम्र लगभग मेरे बाबा के समान रही होगी, लेकिन उनका बातचीत का ढंग, व्यवहार और सरलता अकल्पनीय थी। वे मुझे कहते थे — “रउरे आइल बानी” (आप आए हैं)।
वे चाहें तो मुझे नाम लेकर या सीधे संबोधित कर सकते थे, लेकिन उनके शब्दों में जो सम्मान और अपनापन था, वह अद्भुत था। उनके व्यवहार में सेवा का भाव स्पष्ट झलकता था।
जब हम गाँव के दरवाजे पर पहुँचे, तो वहाँ लगभग 20 लोग मेरे पिता जी की उम्र के और 25–30 युवा मौजूद थे — कुछ हमसे बड़े, कुछ छोटे। परिवार का नाम और प्रतिष्ठा इतनी बड़ी थी कि मैं सोच रहा था, उनसे कैसे बात करूँगा, लेन-देन की बात कैसे आगे बढ़ेगी। बाबा भी थोड़े असमंजस में थे।
बातचीत चल ही रही थी कि तभी प्रमुख जी ने मेरी ओर इशारा करते हुए कहा —
“आप हमारे यहाँ की बारात की व्यवस्था कर लीजिए।”
यह सुनकर हमें बहुत राहत मिली। हमने बाबा की ओर देखा और कहा —
“बाबूजी, आप जितने लोगों को चाहें लेकर आइए, हम तैयार हैं। खाने-पीने की व्यवस्था हमारे यहाँ पहले से है।”
इसी बात पर शादी तय हो गई और विवाह अत्यंत सुसंगठित और गरिमापूर्ण ढंग से संपन्न हुआ।
इसके बाद जब-जब मैं गाँव गया, प्रमुख जी और उनके छोटे भाई (पिता जी) दोनों एक ही वाक्य कहते थे —
“रउरे कब अइनी ह, सब ठीक बा न?”
इस एक पंक्ति में अपनापन, चिंता और आत्मीयता सब समाहित रहती थी।
वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने जब उनकी प्रतिमा का अनावरण किया, तब कहा था —
“व्यक्ति अपने कर्मों से बड़ा बनता है।”
प्रमुख जी सचमुच महामानव थे।
पिछले बीस वर्षों में प्रमुख जी के साथ-साथ अनेक अपने हमसे बिछुड़ गए —
आदरणीय प्रमुख जी, पिता जी, बड़े जीजा रमेशचंद्र यादव जी, चाचा श्री रामसावर यादव जी, मेरे बहनोई दिनेशचंद यादव जी, उमेश यादव जी प्रधान , बड़े भाई और अब उसी परिवार के कबड्डी के राष्ट्रीय खिलाड़ी, सुशील जीजा का जाना अत्यंत दुःखद है।
आज आवश्यकता है कि प्रमुख जी के कार्य, उनके संस्कार और उनका मानवीय व्यवहार परिवार के युवा अपनाएँ और इस साझी विरासत को संजोकर आगे बढ़ाएँ। यह केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे गाँव और क्षेत्र की जिम्मेदारी है।
साभार – गोरखनाथ यादव

