उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव लखनऊ से सैफई लौट रहे थे उनका काफिला एक कस्बे से गुजर रहा था।
एक स्थान पर सड़क के किनारे भीड़ दिखी। अखिलेश जी ने गाड़ी रुकवाई और पूछा “क्या मामला है?”
एक युवक बोला “साहब……
झगड़ा हो गया है……
एक लड़का बुरी तरह घायल है……
अखिलेश जी ने कहा “100 नंबर पर कॉल किया”
लड़के ने कहा “100 नंबर कहां लगता है साहब और लग भी जाए तो पुलिस आती नहीं है”
अखिलेश जी ने जेब से अपना फोन निकाला।
उन्होंने खुद 100 डायल किया।
कई बार लगाने के बाद घंटी गई……
कुछ सेकेंड।
कोई जवाब नहीं।
उन्होंने फिर मिलाया।
फोन कट गया।
तुरंत काफिले से एंबुलेंस को बुलवाया गया।
घायल को अस्पताल भेजा गया।
माहौल संभल गया।
लेकिन अखिलेश जी का मन नहीं संभला।
गाड़ी आगे बढ़ी।
लेकिन वे खामोश थे।
कुछ देर बाद उन्होंने कहा “दंगे अचानक नहीं होते।
दंगे तब होते हैं, जब छोटी घटनाओं पर समय से पुलिस नहीं पहुँचती।”
उसी रात उन्होंने तय किया अब पुलिस का इंतज़ार नहीं कराया जाएगा।
अब पुलिस खुद पहुँचेगी।
अब एक कॉल पर
लोकेशन ट्रैक होगी।
इसी हकीकत को बदलने का फैसला लिया अखिलेश यादव की सरकार ने।
सोच साफ थी — पुलिस का इंतज़ार नहीं कराया जाएगा, पुलिस खुद पहुँचेगी।
इसी सोच से 26 जुलाई 2016 को उत्तर प्रदेश में डायल 100 (UP-100) की शुरुआत हुई।
डायल 100 सिर्फ एक नंबर नहीं था, यह पूरी व्यवस्था का पुनर्गठन था।
पहली बार यह तय किया गया कि राज्य भर में आने वाली हर आपात कॉल एक ही केंद्रीय कंट्रोल रूम में जाएगी।
लखनऊ में अत्याधुनिक कमांड एंड कंट्रोल सेंटर बनाया गया, जहाँ कॉल रिकॉर्डिंग, कॉल ट्रैकिंग और जवाबदेही तय की गई।
अब कोई भी कॉल “गुम” नहीं हो सकती थी।
इसके साथ ही पूरे प्रदेश में PRV (Police Response Vehicle) उतारी गईं। ये साधारण जीप नहीं थीं, बल्कि GPS, वायरलेस सिस्टम, टैबलेट और सीधे कंट्रोल रूम से जुड़ी गाड़ियाँ थीं।
जैसे ही कॉल आती, सबसे नज़दीकी PRV को तुरंत अलर्ट जाता और उसका मूवमेंट लाइव ट्रैक किया जाता।
देरी होने पर जवाब तय था।
सबसे बड़ा बदलाव आया समय में।
डायल 100 से पहले कई जिलों में पुलिस को मौके पर पहुँचने में औसतन 45 मिनट से 1 घंटा लग जाता था।
डायल 100 के बाद यह समय घटकर 15–20 मिनट तक लाया गया।
कई शहरी इलाकों में तो पुलिस 10 मिनट के भीतर पहुँचने लगी। यही फर्क कई बार झगड़े को बढ़ने से पहले ही रोक देता था।
डायल 100 का असर सिर्फ अपराध पर नहीं, भरोसे पर पड़ा।
महिलाओं, बुज़ुर्गों और आम नागरिकों को पहली बार यह एहसास हुआ कि फोन करते ही कोई न कोई रास्ते में है।
घरेलू हिंसा, सड़क दुर्घटना, छेड़छाड़, मारपीट या अफवाह हर स्थिति में पुलिस की मौजूदगी पहले से तेज़ हुई।
कई मामलों में पुलिस के पहुँचते ही माहौल शांत हो गया, बिना लाठी और बिना टकराव के।
इस सिस्टम में पुलिस की भी जवाबदेही बदली।
अब थाने में बैठकर रिपोर्ट लिखना काफी नहीं था, बल्कि सड़क पर दिखना जरूरी हो गया।
हर PRV की लोकेशन, हर कॉल का समय और हर कार्रवाई का रिकॉर्ड सिस्टम में दर्ज होने लगा। लापरवाही अब छुप नहीं सकती थी।
यही फर्क होता है
सत्ता और सेवा में।

