संपादकीय
मां-बाप की सीख, बेटे की पहचान
महराजगंज,किसी भी समाज की सबसे मज़बूत नींव परिवार होता है और परिवार की आत्मा होते हैं मां-बाप।
बेटे की पहचान केवल उसकी डिग्री, पद या संपत्ति से नहीं होती, बल्कि उससे होती है जो उसने अपने घर में सीखा है।
मां-बाप की दी गई सीख ही बेटे के चरित्र, व्यवहार और सोच की दिशा तय करती है।
आज के तेज़ रफ्तार और प्रतिस्पर्धी दौर में यह सच्चाई और भी प्रासंगिक हो गई है।
मां बच्चे की पहली पाठशाला होती है।
उसके शब्द, उसका व्यवहार और उसका संस्कार बेटे के मन में स्थायी रूप से अंकित हो जाते हैं।
वहीं पिता अनुशासन, संघर्ष और जिम्मेदारी का जीवंत उदाहरण होते हैं।
बेटे के भीतर ईमानदारी, परिश्रम, करुणा और साहस जैसे गुण अगर विकसित होते हैं तो उसके पीछे मां-बाप की ही सीख होती है।
समाज में जब कोई बेटा सम्मान पाता है, तो परोक्ष रूप से उसके माता-पिता भी सम्मानित होते हैं।
लेकिन आज एक चिंता भी उभर कर सामने आ रही है।
आधुनिकता और तकनीक की चकाचौंध में कई बार संस्कार पीछे छूटते जा रहे हैं।
मां-बाप व्यस्त हैं और बेटे मोबाइल की दुनिया में उलझे हैं। परिणामस्वरूप संवाद कम हो रहा है और सीख का स्थान केवल उपदेश ले रहा है।
जबकि सच्ची सीख शब्दों से नहीं, आचरण से दी जाती है।
जो पिता खुद नियम तोड़ता है, वह बेटे से अनुशासन की उम्मीद नहीं कर सकता; जो मां धैर्य खो देती है, वह बेटे से संयम की आशा नहीं कर सकती।
जरूरत इस बात की है कि मां-बाप फिर से अपनी भूमिका को समझें।
बेटे को केवल सफल नहीं, बल्कि अच्छा इंसान बनाने पर ज़ोर दें। उसे हार स्वीकारना, दूसरों का सम्मान करना और समाज के प्रति जिम्मेदार बनना सिखाएं।
क्योंकि अंततः बेटा समाज में जो कुछ बनता है, वही उसके मां-बाप की असली पहचान बन जाता है।
सच यही है—मां-बाप की सीख जितनी मजबूत होगी, बेटे की पहचान उतनी ही उज्ज्वल और स्थायी होगी।
अमूल्यरत्न न्यूज राष्ट्रीय हिन्दी मासिक पत्रिका
कैलाश सिंह
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