“नारी—सिर्फ प्रतिनिधित्व नहीं, देश की रीढ़: आरती सिंह बघेल की कलम से उठी बुलंद आवाज़”
लेखिका: आरती सिंह बघेल, वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता एवं भाजपा महिला मोर्चा नेत्री
भारत की आधी आबादी—महिलाएँ—आज हर क्षेत्र में अपना परचम लहरा रही हैं। कहीं वह विज्ञान और शोध की दुनिया में इतिहास रच रही हैं, तो कहीं प्रशासन, राजनीति, न्यायपालिका, उद्यमिता और सामाजिक कार्यों में अपनी मजबूत पकड़ साबित कर रही हैं। लेकिन एक सच्चाई आज भी चुभती है—जब देश की प्रगति, लोकतंत्र और समान अधिकारों की बात आती है, तो महिला प्रतिनिधित्व अब भी अपेक्षाकृत कम है।
मैं, आरती सिंह बघेल, एक सामाजिक कार्यकर्ता और भारतीय जनता पार्टी की महिला मोर्चा की एक समर्पित कार्यकर्ता होने के नाते, रोज़ यह महसूस करती हूँ कि जहाँ महिलाएँ सक्षम हैं, योग्य हैं, और किसी भी स्तर पर कार्य करने की क्षमता रखती हैं, वहीं राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के मामले में अधिकांश राजनीतिक दल अभी भी हिचकिचाते दिखते हैं।
महिला आरक्षण विधेयक वर्षों से चर्चा में है। नेता मंचों से घोषणा करते हैं, बहसें होती हैं, समर्थन की बातें होती हैं, लेकिन सवाल यह है कि—
जब 30% आरक्षण का सिद्धांत स्वीकार्य है, आवश्यक है, और पारित भी है, तो फिर इसे व्यवहार में क्यों नहीं उतारा जाता?
सिर्फ बातों से समाज का उत्थान नहीं होता—कार्यवाही की आवश्यकता होती है।
भारतीय जनता पार्टी ने स्थानीय निकायों से लेकर बड़े पदों तक महिलाओं को प्राथमिकता देकर यह साबित किया है कि अगर इच्छा शक्ति हो, तो महिलाओं को नेतृत्व देने में कोई बाधा नहीं आती। मंडल, नगर पंचायत, जिला पंचायत से लेकर राज्य, केंद्र और संगठनात्मक ढांचे तक—महिलाएँ सिर्फ संख्या बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि प्रभावी निर्णयकर्ता के रूप में कार्य कर रही हैं। यह एक सकारात्मक परिवर्तन है, लेकिन प्रश्न अभी भी बाकी है—
बाकी राजनीतिक दल कब महिलाओं के हितों को प्राथमिकता देंगे?
मेरा मानना है कि महिला सिर्फ एक जाति, धर्म या उपाधि का नाम नहीं।
महिला स्वयं में एक पूर्ण पहचान है — एक मानवता, एक संवेदना, एक शक्ति।
हमारा समाज इसे भले ही कभी-कभी भूल जाए, लेकिन प्रकृति नहीं भूलती।
जो सृष्टि को जन्म देने की क्षमता रखती है, वह सामाजिक और राजनीतिक संरचना को भी नई दिशा दे सकती है।
भारतीय संस्कृति भी यही कहती है—
यदि एक हिंदू महिला की शादी ब्राह्मण परिवार में हो जाए, तो समाज उसे ब्राह्मण मान लेता है। यदि वही महिला राजपूत परिवार में विवाह कर ले, तो वह राजपूत कहलाती है।
तो फिर क्यों कहा जाता है कि महिलाओं की अपनी कोई पहचान नहीं?
महिला सिर्फ एक भूमिका नहीं, बल्कि एक संपूर्ण अस्तित्व है—जो घर, समाज और राष्ट्र को गढ़ती है।
आज भारत की राष्ट्रपति, जो देश की प्रथम नागरिक हैं, महिला हैं। यह सिर्फ एक पद नहीं, यह उन सभी महिलाओं के साहस, संघर्ष और क्षमताओं का प्रतीक है, जिसने भारत को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया है।
इसी तरह उत्तर प्रदेश की प्रथम नागरिक—राज्यपाल महोदया—भी एक महिला हैं।
क्या इससे बड़ा उदाहरण कोई और हो सकता है कि चाहे संघर्ष कितना भी कठिन क्यों न हो, महिला अपने दम पर सबसे ऊँचे पद तक पहुँचने की ताकत रखती है?
इसलिए आज समाज को, राजनीति को और सभी राजनीतिक दलों को यह समझने की जरूरत है कि—
महिलाओं को अवसर देना दया नहीं, अधिकार है।
प्रतिनिधित्व देना अनुकंपा नहीं, न्याय है।
और
महिलाओं के आगे बढ़ने से देश आगे बढ़ता है।
नारी को रोकने की नहीं, सशक्त करने की जरूरत है।
वह सिर्फ घर नहीं संभालती, वह समाज की आत्मा को दिशा देती है।
नई पीढ़ी की महिलाएँ पढ़ी-लिखी, जागरूक और आत्मनिर्भर हैं।
वह सवाल भी पूछ रही हैं और जवाब भी खोज रही हैं।
आज आवश्यकता है कि सभी राजनीतिक दल, सभी सामाजिक संगठन, और पूरा समाज—
महिलाओं का सम्मान करें, उनके विचारों को महत्व दें, और उन्हें नेतृत्व का अवसर दें।
क्योंकि नारी सिर्फ एक इंसान नहीं — वह परिवर्तन है, वह शक्ति है, वह भविष्य है।
— आरती सिंह बघेल
वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता एवं भाजपा महिला मोर्चा नेत्री

