संपादकीय- पं दिनेश तिवारी कुशीनगर
लड़कपन बेख़बर, जवानी बेपरवाह और बुढ़ापा निडर—ज़िंदगी की यही सबसे बड़ी सच्चाई!
महराजगंज,ज़िंदगी का सफ़र तीन अहम पड़ावों से होकर गुजरता है—लड़कपन, जवानी और बुढ़ापा। हर दौर की अपनी दुनिया होती है, अपनी सोच और अपने सपने। लड़कपन मासूम होता है, उसे न जवानी की ज़िम्मेदारियों का अंदाज़ा होता है और न भविष्य की उलझनों का। खिलौनों, खेल और सपनों में उलझा बचपन समय की कठोर सच्चाइयों से कोसों दूर रहता है।
जवानी आते ही ज़िंदगी तेज़ रफ़्तार पकड़ लेती है। जोश, महत्वाकांक्षा और कुछ कर गुजरने का जुनून इंसान को इस कदर घेर लेता है कि बुढ़ापे की थकान और अनुभव की अहमियत दिखाई नहीं देती। जवानी ताक़त के नशे में यह मान बैठती है कि वक़्त हमेशा उसके साथ रहेगा।
और जब इंसान बुढ़ापे की दहलीज़ पर पहुंचता है, तब हैरानी की बात यह होती है कि उसे मौत का खौफ नहीं रहता।
अनुभवों की पूंजी, देखे-सुने सच और जीवन की लड़ाइयों के बाद बूढ़ा मन समझ चुका होता है कि मौत अंत नहीं, बल्कि जीवन चक्र की अंतिम सच्चाई है।
यही जीवन का सबसे बड़ा दर्शन है—हर उम्र अपने आलम में जीती है, लेकिन यदि वक्त रहते एक-दूसरे के सबक समझ लिए जाएं, तो ज़िंदगी और भी संतुलित, संवेदनशील और सार्थक बन सकती है।
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