*सम्पादकीय*
✍🏾जगदीश सिंह सम्पादक✍🏾
*किसी के ज़ख्म पर चाहत से पट्टी कौन बांधेगा* !
*अगर बहने नहीं होगी तो राखी कौन बांधेगा*??
यकीनन तुम्हारी मंजिल नहीं हूं मैं! मगर सफर में जब भी पुकारोगे साथ पावोगे मुझे! रक्षा बन्धन के नाम से ही भावनात्मक भाव तमाम अभाव के बाद भी दिल से लगाव का एहतेराम करता है!अपनत्व की प्रस्फुटित होती स्नेह की धारा प्रेम की सावनी फुहार के बीच कुछ पल इस तरह का मनोहारी दृश्य उत्सर्जित करती है की जीवन के गुजरे पल अनायास ही चलचित्र के तरह मनो मष्तिष्क में उभरने लगते हैं।लम्हा लम्हा साथ गुजरा बचपन फिर अपने हृदय कणिका का विछोह और विछडन फिर रक्षा बन्धन पर अगाध प्रेम के पारितोषिक के साथ कुछ पल का मिलन भाव विभोर कर देता है। मन मयूर नाच उठता है!नसीब वाले है वो लोग जिनकी ज़िन्दगी में भाव विह्वलता का सागर कुलांचे मारता है! कितना खुशनुमा पल वह होता है जब आंखों में अश्कों की लड़ी सजाए बहन स्नेह के दीपक में नेह की बाती बन हाथ की कलाई में यादों की तरूणाई लिए उस पवित्र धागे को भाई को बिना किसी स्वार्थ के समर्पित करती है! कितना पवित्र रिश्ता है। कायनात भी इस मुस्कराते खिल खिलाते रिश्ते को देखकर रोमांचित हो उठती है।न कोई भेद न भाव सिर्फ दिल से दिल का लगाव! गजब का मन्जर होता है जब बहन विहीन भाई आज के दिन सब कुछ होने के बाद भी एकान्त में बैठकर रोता है! कलाई में धागा नहींअटूट सम्बन्धों की तिजोरी का पारदर्शी ताला होता है! जो पूरे वर्ष उत्कर्ष के साथ आत्मप्रिय सम्बन्धों को सहर्ष स्वीकार कर पवित्रता की पराकाष्ठा का उदाहरण बन हर मुसीबत का प्रहरी बन जाता है।
लेकिन बदलते परिवेश में देश के भीतर राक्षसी प्रबृति के लोगों की पैदावार इस खुशगवार ब्यवस्था को कलंकित कर रहा है! अपनी बहन को पर्दे में रखने की चाहत पाले निराले गन्दी सोच के रखवाले असहाय निरीह मातृशक्ति के शील हरण में अपनी ताकत का इस्तेमाल कर कलंकित परिदृश्यों का परिचालन बेखौफ कर नरपिशाच की परिभाषा को परिलक्षित कर रहे हैं।कितना गिर गया है इन्सान शैतान भी इनकी सोच को देखकर शर्मिन्दा होता होगा।जब जब इस तरह की शर्मिन्दा करने वाली घटना सामने आती कलेजा कांप उठता है दिल धौकनी के तरह धड़कते हुए बेकाबू हो जाता है! आत्मा कराहती है यह सोचकर की क्या यह समाज अब इन्सानियत को खो चुका है! क्या वास्तव में कलयुग के बस में आदमी हो चुका है!उसको इस तरह की शैतानी हरकत करते हुए शर्म नहीं आती! क्या उसके घर जवान बहन बेटियां नहीं होगी! क्या उसके शहर-गांव मोहल्ला में इस तरह की दरिंदगी की सूचना पर तिरस्कार नहीं होता होगा! क्या उनके मां बाप समाज में कलंकित कारनामे पर शर्मशार नही होते होंगे! यह तमाम यक्ष प्रश्न आज मन में उठ रहा है!लेकिनअबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी आंचल में है दूध और आंखों में पानी की कहानी को बदलना होगा! अब बहनों को महारानी लक्ष्मी बाई के नक्शे कदम पर चलना ही होगा! सठे शाठ्यम समाचरेत की सुक्ति को समझना होगा!,टीट फार टैट के राह पर चलना होगा!जिस दिन जागरूकता की आंधी तूफान का रूख अख्तियार कर लेगी!शैतान की हिम्मत हबस के दरिन्दो की ताकत तथा बहसी जानवरों की औकात समझ में आ जायेगी। बेटीयों को अबला मत बनाए उनके अरमानों को पंख लगने दें! उनको उनकी ताकत का एहसास कराएं! वीरांगनाओं का इतिहास बताए बहुत हो चुका!याचना नही अब रण होगा! संघर्ष महा भीषण होगा! मातृशक्ति की प्रेमभक्ति का इम्तिहान रोकना होगा! वर्ना इस दरिन्दो के हबस का शिकार हमारी मातृशक्ति होती रहेगी! फैसला खुद करना होगा! जिस दिन रण चन्डी बन सरेयाम सड़क पर दरिन्दो के लहू का पान हमारी बहनों ने शुरु कर दिया उसी दिन से बहसी शैतानों के नरमुंड नव जागृति का सन्देश देकर शरण त्वमेव के पथ गामी बन जायेंगे!अगर समग्र जागृति की अलख नहीं जगी तो अभी पश्चिम बंगाल कलंकित हुआ कल कहीं और होगा! इस लिए अपनी लाडली को फूलनही अंगारे पर चलने का हूनर सिखाए यही समय का तकाजा में वर्ना पश्चाताप ही हासिल होगा।———–??
जयहिंद 🙏🏾🙏🏾
जगदीश सिंह सम्पादक राष्ट्रीय अध्यक्ष राष्ट्रीय पत्रकार संघ भारत
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