“भैया ने मुझे नीचे छुआ था,” 9 साल की बेटी ने जैसे ही खाने की मेज़ पर यह कहा, नंदिता ने बिना 1 सवाल पूछे अपने ही 18 साल के बेटे की ज़िंदगी उसी पल खत्म कर दी।
उस रात घर में रविवार का पारिवारिक खाना था। दाल, पुलाव, रायता, गरम रोटियाँ और रिश्तेदारों की सामान्य हँसी। नंदिता 38 की थी, उसके पति समर 39 के। उनका बेटा कुणाल 18 का था और बेटी पिहू 9 की। उम्र का फासला बड़ा था, पर नंदिता हमेशा यही मानती रही कि दोनों में गहरा लगाव है। कुणाल शांत, पढ़ाकू, अपने कमरे में रहने वाला लड़का था। कॉलेज से लौटकर अक्सर पिहू को देख लेता, उसे होमवर्क करा देता, उसके लिए दूध गरम कर देता। उसने कभी ऊँची आवाज़ में बात नहीं की, कभी घर में तमाशा नहीं किया। पिहू बिल्कुल उलट थी—चंचल, बोलती रहने वाली, हर समय माँ के आसपास मंडराने वाली, घर की जान।
उस रात भी कुछ असामान्य नहीं था। तभी पिहू ने बहुत सपाट आवाज़ में वही वाक्य कहा। न रोना, न हकलाहट, न डर। बस सीधी बात, जैसे कोई मामूली शिकायत हो।
मेज़ पर बैठे सब लोग जड़ हो गए। नंदिता की देवरानी ने हाथ रोक लिया। समर की कुर्सी पीछे खिसक गई। नंदिता ने काँपती आवाज़ में पूछा, “क्या कहा तुमने?”
पिहू ने दोहराया, “भैया ने मुझे 2 बार वहाँ छुआ।”
उसके बाद जो हुआ, वह इतना तेज हुआ कि किसी को सोचने का समय ही नहीं मिला। कुणाल घर पर नहीं था। समर ने तुरंत उसे फोन किया और घर लौटने को कहा। 20 मिनट बाद वह बैग कंधे पर डाले अंदर आया, चेहरे पर उलझन थी। “क्या हुआ?” वह इतना ही कह पाया था कि समर ने उसकी गर्दन पकड़कर उसे दीवार से दे मारा।
“घिन नहीं आई?” समर चिल्लाया। “अपनी बहन पर हाथ लगाया?”
कुणाल के चेहरे से रंग उतर गया। उसने पहले समझा ही नहीं। फिर जब बात उसके कानों में बैठी, उसकी आँखें फैल गईं। “नहीं… नहीं पापा… मैंने कुछ नहीं किया… मैं कसम—”
समर ने उसका जवाब पूरा होने से पहले मुक्का मारा। कुणाल के नाक से खून फूट पड़ा। वह फर्श पर गिर गया, दोनों हाथों से खुद को सँभालता हुआ बार-बार सिर्फ इतना कहता रहा, “माँ, मैंने नहीं किया… माँ, मेरी बात सुनो…”
लेकिन नंदिता ने उसकी ओर बढ़ने के बजाय पिहू को सीने से लगा लिया।
कुणाल की आँखों में उस पल जो था, वह नंदिता बाद में 2 साल तक सपनों में देखती रही—डर नहीं, दर्द नहीं, बल्कि टूटता हुआ भरोसा। जैसे उसे आखिरी क्षण तक यकीन रहा हो कि उसकी माँ बाकी सबके बाद भी उसे बचा लेगी।
समर उसके कमरे में गया, उसका बैग, कपड़े, कागज़ात सब घसीटकर बाहर फेंक दिए। दरवाज़ा खोलकर गरजा, “आज के बाद इस घर में कदम रखा तो पुलिस बुला लूँगा। हमारे लिए तू मर गया।”
खून से सना, काँपता, अपमान से पस्त कुणाल बरामदे में घुटनों के बल बैठ गया। उसने 1 बार फिर नंदिता की तरफ देखा। “माँ, प्लीज़… मुझे मत निकालो…”
नंदिता पत्थर बनी रही।
उस रात के बाद उन्होंने ताले बदल दिए। कॉलेज की फीस बंद कर दी। रिश्तेदारों से कहा कि बेटा बिगड़ गया था। घर में उसका नाम लेना भी बंद हो गया। पिहू से 2-3 बार पूछा गया, “कुछ और हुआ था क्या?” उसने हर बार सिर हिलाकर वही कहानी दोहरा दी। न उसे किसी मनोवैज्ञानिक के पास ले जाया गया, न सच की तह तक जाने की कोशिश हुई। सबने मान लिया कि उन्होंने अपनी बेटी को बचा लिया है।
2 साल बाद एक सड़क दुर्घटना में पिहू के शरीर के भीतर ऐसा नुकसान हुआ कि डॉक्टरों ने रात के 3 बजे नंदिता को आई.सी.यू. के बाहर खड़ा करके कहा, “उसकी 1 किडनी तुरंत बदलनी पड़ेगी। समय बहुत कम है। और सबसे उपयुक्त दाता उसका सगा भाई हो सकता है।”
नंदिता के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
जिस बेटे को उसने जिंदा रहते मरने के लिए छोड़ दिया था, उसी की देह अब उसकी बेटी की साँसों की आखिरी उम्मीद थी।

