फोटो में दिखने वाला यह लड़का सुधीर है। एक दिन सुधीर करनाल में मेरे पति से मिला। वह एक काग़ज़ पर लिखा हुआ कुछ पढ़वाना चाहता था। पति ने सहज ही कह दिया—
“कम से कम इतनी पढ़ाई तो करनी चाहिए थी कि दूसरों के आगे काग़ज़ न फैलाना पड़े।”
यह सुनकर वह लड़का चुप हो गया। फिर बहुत धीमी आवाज़ में अपनी कहानी बताने लगा।
उसने कहा—
जब वह सिर्फ़ पाँच–छह साल का था, उनके घर कोई रिश्तेदार आए थे। उन्हें छोड़ने उसके चाचा स्टेशन जाने वाले थे। उसने भी ज़िद की कि वह साथ जाएगा। मासूम ज़िद मान ली गई।
स्टेशन पर उसने पहली बार ट्रेन देखी थी। जिज्ञासा में, खेल-खेल में, वह चाचा से छुपकर ट्रेन में चढ़ गया… और ट्रेन चल पड़ी।
खेल खेल व शरारत में उसी पल उसके चाचा, उसका गाँव व स्टेशन सब पीछे छूट गया।
एक ट्रेन से दूसरी, दूसरी से तीसरी… न जाने कितने दिन, कितनी रातें।
ट्रेन ही उसका घर बन गई।
भीख माँगकर वह पेट भरता रहा।
आख़िरकार वह अंबाला पहुँचा। वहाँ एक फैक्ट्री के बाहर खड़े सिक्योरिटी गार्ड ने उसे देखा, खाना खिलाया और उसकी कहानी सुनी। पास खड़े एक सरदार जी ने भी यह सब सुना और उसे अपने साथ पंजाब ले गए।
कुछ साल उन्होंने उसे बच्चों की तरह पाला।
लेकिन जब वह 14–15 साल का हुआ, तो उससे 20–22 भैंसों का सारा काम करवाने लगे।चार–पाँच साल उसने वहाँ साज्जी, पाली की तरह मेहनत की।
थक गया… टूट गया…
और एक दिन चुपचाप पंजाब से भागकर हरियाणा आ गया।
इस बार वह करनाल पहुँचा।
एक ढाबे पर काम मिल गया। ढाबे का मालिक भला आदमी है, चाहता है कि यह लड़का अपने घर लौट जाए—
पर कैसे जाए?
उसे खुद नहीं पता।
सुधीर ने मेरे पति को पूरी कहानी सुनाई।
बताया कि माँ-बाप ने उसका नाम सुधीर रखा था लेकिन अब यहाँ सब उसे शंकर कहते हैं।
शाम को पति घर आए तो मुझे सारी बताई। अब हमने ठान लिया कि सुधीर को उसके घर पहुँचाना है।
उसे अपने गाँव का, थाने का नाम ठीक से याद नहीं था। बस इतना जानता था कि वह बिहार के भागलपुर से है। उसके मुँह से निकले टूटे-फूटे शब्दों को भागलपुर के साथ गूगल पर खोजा गया।
कई बार ग़लत भी हुआ…
और आख़िरकार शब्द उभरकर आया— सनोखर।
फिर गाँव मिला— बेला फुलवारी।
गूगल से सनोखर थाने के इंचार्ज का नंबर मिला। दरोगा जी को फ़ोन किया। पूरी बात बताई।
अगले दिन वह बेला फुलवारी के सरपंच के पास गए। बताई गई जाति विशेष के मोहल्ले में पूछताछ की—
और सच सामने आया।
हाँ…
बरसों पहले यहाँ से एक छोटा-सा लड़का ग़ायब हुआ था, रेल्वे टेसन से।
हमने सुधीर की जो तस्वीर भेजी थी, वही तस्वीर उसके पिता को दिखाई गई और वही तस्वीर मैने पोस्ट पर भी लगाई है। उन्होंने अपने बेटे को पहचान लिया।
पुलिस वाले ने मेरे पति का नंबर सुधीर के घरवालों को दिया और इंसानियत का अपना फ़र्ज़ निभाकर लौट आया।
हम अकसर फ़िल्मों में देखते है कि पुलिस वाला बोलता है “पहले एफ.आई.आर. कराओ, फिर कार्रवाई होगी।”
पर हर पुलिस वाला एक-सा नहीं होता। बहुत से लोग आज भी इंसानियत के नाते मदद करते हैं।
अगले दिन सुधीर की बहन का फ़ोन आया। अपने भाई के ज़िंदा होने की खुशी वह शब्दों में बयाँ नहीं कर पा रही थी।
जो दुआएँ वह मेरे पति को दे रही थी—
मैं उन्हें यहाँ लिख नहीं सकती।
बस इतना बोली—
“माँ रो-रोकर बेहाल है। खाना तक नहीं खा रही। कहती है, मेरे बेटे को अभी लेके आओ।
हमने तो मान लिया था कि हमारा भाई इस दुनिया में नहीं रहा। वह रोती हुई मेरे पति से बोली, “भैया आपका एहसान हम कभी नहीं भूलेंगे। सोमवार को हम सब भागलपुर से करनाल आ रहे हैं अपने भाई को लेने। भैया, आप भी ज़रूर मिलना…”
मैं भी चाहती थी कि जब वह परिवार अपने बेटे से मिले, उस पल मेरे पति भी वहाँ हो और उन भावुक पलों को अपने मोबाइल में कैद करें।
पर उसी सोमवार को उनको किसी ज़रूरी काम से चंडीगढ़ जाना पड़ गया।
एक भरत मिलाप रामायण में हुआ और अब एक सुधीर मिलाप करनाल में हुआ।
हज़ारों बच्चे आज भी अपने घरों से बिछड़ जाते हैं।
काश… हर बच्चे को ऐसे ही उसका घर मिले,
माँ–बाप मिलें,
भाई–बहन मिलें…

