⚖️ दिल्ली के Dwarka Court का अहम फैसला:
झूठे बलात्कार आरोप पर महिला को जेल
दिल्ली की एक अदालत ने झूठा बलात्कार और यौन उत्पीड़न का मामला दर्ज कराने के आरोप में एक महिला को 3 महीने की सजा और ₹5,000 का जुर्माना सुनाया है।
महिला ने अपने देवर (भाई-इन-लॉ), जो पेशे से डॉक्टर हैं, के खिलाफ यह शिकायत दर्ज कराई थी। इस झूठे आरोप के कारण डॉक्टर को 41 दिन तक न्यायिक हिरासत (Judicial Custody) में रहना पड़ा।
🔍 मामले की पृष्ठभूमि
– महिला ने पुलिस में FIR दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि उसके देवर ने उसके साथ बलात्कार और यौन उत्पीड़न किया।
– FIR के आधार पर पुलिस ने डॉक्टर को गिरफ्तार किया और उन्हें 41 दिनों तक जेल में रहना पड़ा।
– बाद में जब मामला अदालत में चला, तो जांच औरट्रायल के दौरान महिला के आरोप झूठे, दुर्भावनापूर्ण और निराधार पाए गए।
🧑⚖️ अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
अदालत ने अपने फैसले में कहा:
– बलात्कार जैसे गंभीर अपराध गैर-समझौतायोग्य (Non-Compoundable) होते हैं, यानी इन्हें आपसी समझौते से खत्म नहीं किया जा सकता।
– लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई व्यक्ति व्यक्तिगत, पारिवारिक या वैवाहिक विवाद सुलझाने के लिए झूठे बलात्कार के आरोप लगाए।
– अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि झूठे बलात्कार के मामले न्याय व्यवस्था और वास्तविक पीड़ितों दोनों को नुकसान पहुंचाते हैं।
🗣️ महिला का कबूलनामा
– ट्रायल के दौरान महिला ने अदालत में स्वीकार किया कि उसने यह झूठी शिकायत पुलिस अधिकारियों की सलाह पर दर्ज कराई थी।
– अदालत ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि पुलिस की सलाह का हवाला देकर झूठे आरोपों को सही नहीं ठहराया जा सकता।
🎓 शिक्षा और कानूनी विकल्प
अदालत ने यह भी कहा:
– महिला शिक्षित थी और यदि उसे किसी तरह की पारिवारिक या वैवाहिक समस्या थी, तो वह कानूनी और वैध उपाय अपना सकती थी।
– इसके बजाय उसने एक व्यक्ति की प्रतिष्ठा, करियर और स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचाने के लिए झूठा बलात्कार केस दर्ज कराया, जो गंभीर अपराध है।
⚖️ सजा
– अदालत ने महिला को आपराधिक मानहानि (Criminal Defamation) का दोषी ठहराया।
– उसे 3 महीने की जेल और ₹5,000 जुर्माने की सजा सुनाई गई।
📌 फैसले का महत्व
यह फैसला इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि:
– यह झूठे बलात्कार मामलों पर सख्त संदेश देता है।
– साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि कानून का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, चाहे मामला कितना भी संवेदनशील क्यों न हो।
– अदालत ने दोहराया कि वास्तविक पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए झूठे मामलों पर रोक लगाना जरूरी है।
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