राजस्ववाद में फंसे तो बढ़ी मुश्किलें
महराजगंज,राजस्ववादों को निबटाने के लिए ही तहसील दिवस, थाना समाधान दिवस का आयोजन किया गया, मगर कोई भी अधिकारी मौके पर पहुंचकर न तो समाधान कराना चाहता है और न ही कोई एक्शन लेना चाहता है। सिर्फ आख्या का दौर ही चलता रहता है। जिसके कारण जिले में राजस्ववादों की संख्या में लगातार इजाफा होता जा है। जिले में होने वाली आपराधिक घटनाओं में हर तीसरा मामला जमीन से जुड़ा होता है। भूमिधरी जमीन पर अवैध कब्जा, हिस्से के बंटवारे को लेकर विवाद कभी-कभी गंभीर रुप धारण कर लेते हैं। राजस्व विभाग के अफसरों को जमीन का विवाद देखते ही बुखार आ जाता है। तहसीलों में एसडीएम की लापरवाही से छोटे-छोटे मामलों का निस्तारण नहीं हो पा रहा है। इसमें सबसे अधिक सदर तहसील के मामले हैं। आलम यह है कि एसडीएम कोर्ट में बैठते ही नहीं है, वह फील्डवर्क से ही दबे रहते है।
खेतों की पैमाइश कराना आसान नहीं होता है। जब कोई किसान अपने खेत का सीमांकन कराना चाहता है, तो वह छह माह तक एसडीएम कोर्ट में भू-राजस्व संहिता की धारा 24 के तहत हकबरारी का दावा करता है। न्यायालय में छह माह तक प्रक्रिया चलने पर पैमाइश के लिए आदेश होता है। पीड़ित पक्ष से एक हजार रुपये ट्रेजरी में जमा कराए जाते हैं। इसके बाद भी कभी पुलिस नहीं, तो कभी राजस्व कर्मचारी के नहीं होने पर पैमाइश के लिए सालों लग जाते हैं। पैमाइश कराने के लिए लेखपाल और कानूनगो से कहते रहिए, मगर वह सीधे मुंह बात नहीं करते हैं वह रुपये की तलाश में आज और कल आने की बात कहते रहते हैं। मगर रुपये देखते ही प्यार की लब्ज बोलने लगते हैं।

