कहते हैं सच्चा प्यार सिर्फ कहानियों और किताबों के पन्नों तक सीमित नहीं होता बल्कि कभी-कभी यह जिंदगी और मौत की दहलीज को एक साथ पार कर जाता है।
राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के मांडल कस्बे से एक ऐसी ही रूहानी कहानी सामने आई है जिसने प्यार और अटूट विश्वास की परिभाषा को एक नया मुकाम दिया है।
60 वर्षीय गणेश माली और उनकी 57 वर्षीय पत्नी लाली देवी ने पिछले 45 सालों से एक-दूसरे का हाथ थाम रखा था।
17 अप्रैल की शाम भी बाकी दिनों की तरह बिल्कुल सामान्य थी; दोनों खेत से काम करके लौटे, साथ बैठकर खाना बनाया, हंसी-मजाक के साथ भोजन किया और फिर सुकून से सो गए।
किसी को अंदाजा नहीं था कि यह उनकी आखिरी रात होगी।
अगली सुबह जब यह जोड़ा अपने तय समय पर खेत नहीं पहुंचा तो गांव वालों को चिंता हुई। एक युवक उन्हें बुलाने घर गया लेकिन दरवाजा अंदर से बंद था।
बेटे महावीर ने जब दीवार फांदकर अंदर प्रवेश किया तो वहां का मंजर देखकर हर कोई सन्न रह गया क्योंकि पति और पत्नी दोनों अपनी चारपाई पर बेसुध पड़े थे।
जांच में पता चला कि बिना किसी बीमारी, बिना किसी पुरानी तकलीफ या बिना किसी शोर-शराबे के दोनों ने एक ही रात में अपने प्राण त्याग दिए थे।
ग्रामीण बताते हैं कि गणेश और लाली अक्सर कहा करते थे कि “जिएंगे भी साथ और मरेंगे भी साथ” और नियति ने उनके इस वादे को इतनी शिद्दत से निभाया कि उनकी अंतिम यात्रा भी एक साथ ही निकली। पूरे गांव की नम आंखों के बीच दोनों की अर्थियों को एक साथ बांधा गया और एक ही चिता पर दोनों का अंतिम संस्कार किया गया। 45 साल के इस लंबे सफर का अंत इतना भावुक था कि आज भी भीलवाड़ा का हर शख्स इस जोड़े को सच्चे प्यार और अटूट साथ की सबसे बड़ी मिसाल मान रहा है।
यह कहानी हमें याद दिलाती है कि जब आत्माओं का मिलन गहरा होता है तो मौत भी उन्हें जुदा नहीं कर पाती।

