*भ्रष्टाचार मुक्त जिवन व भ्रष्टाचार मुक्त भारत के लिए यह कहानी अवश्य पढ़ें*
*काशी के विश्वनाथ मंदिर में एक घंटा था जो सौ साल से नहीं बजा था, क्योंकि उसे बजाने के लिए पाप रहित हाथ चाहिए था।*
*सौ साल का मौन*
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कहते हैं औरंगजेब के समय में जब मंदिर टूटा, तब पुजारियों ने एक बड़ा पीतल का घंटा कुएँ में छिपा दिया। जब अहिल्याबाई ने मंदिर फिर बनवाया, घंटा निकाला गया। महंत ने उस पर संस्कृत में खुदवाया, यह घंटा वही बजाए जिसके मन में चोरी, झूठ और हिंसा न हो।
लोग आए, राजा आए, साधु आए। सबने रस्सी खींची। घंटा हिला तक नहीं। धीरे-धीरे लोगों ने कोशिश छोड़ दी। घंटा मंदिर के कोने में लटकता रहा, धूल जमती रही। बच्चे पूछते, बाबा यह बजता क्यों नहीं। पुजारी कहते, पाप रहित हाथ अब कलियुग में कहाँ।
*चोर की आमद*
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एक बार माघ की अमावस्या को काशी में भारी भीड़ थी। उसी रात गाँव गाजीपुर से माधो नाम का एक चोर काशी आया। वह पंद्रह साल से चोरी करता था। पहले मजबूरी में, फिर आदत में। उस रात उसने सोचा, विश्वनाथ के दर्शन करने वालों की भीड़ में किसी सेठ की थैली मिल जाएगी।
वह घाट पर नहाया भी नहीं, सीधे मंदिर की गली में घुसा। भीड़ में धक्का लगा, एक बूढ़ा गिर पड़ा। माधो ने उसे उठाया। बूढ़े की लाठी टूट गई। माधो ने अपनी धोती फाड़कर लाठी बाँध दी। बूढ़ा बोला, बेटा, भगवान तुम्हारा भला करे।
माधो हँसा, मेरा भला भगवान नहीं करता।
वह मंदिर पहुँचा। आरती हो रही थी। पुजारी ने कहा, आज कोई पाप रहित है तो घंटा बजाकर दिखाए। भीड़ हँसी। माधो कोने में खड़ा था। उसने सोचा, मैं तो पापी हूँ, पर घंटा देखूँ तो सही।
वह धीरे-धीरे घंटे के पास गया। रस्सी पर हाथ रखा। तभी पीछे से एक आवाज आई, मत छू। वह मुड़ा, देखा एक सात साल की लड़की, मैली फ्रॉक, हाथ में मिट्टी का दीया।
लड़की बोली, तुम बजाओगे तो बजेगा नहीं, सब हँसेंगे।
माधो बोला, तू कौन है।
लड़की बोली, मैं गंगा किनारे फूल बेचती हूँ। माँ बीमार है। आज दीया चढ़ाने आई हूँ। पंडित जी ने कहा था घंटा पापी से नहीं बजता।
माधो ने पूछा, तू पापी है।
लड़की हँसी, मैंने कल एक बेर चुराकर खा लिया था, माँ को दवा के लिए पैसे नहीं थे।
माधो का हाथ रुक गया। उसने पहली बार किसी को अपने जैसा देखा।
*रस्सी खींचना*
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आरती खत्म हुई। भीड़ छँटने लगी। लड़की ने दीया जलाकर शिवलिंग के पास रखा, फिर लौटकर बोली, तुमने उस बूढ़े को उठाया था, मैंने देखा।
माधो चौंका, तू वहाँ थी।
लड़की बोली, हाँ। तुम चोर हो न।
माधो ने सिर झुका लिया। लड़की ने उसकी हथेली पकड़ी और कहा, चलो दोनों खींचते हैं। पाप आधा-आधा बँट जाएगा।
माधो हँसा, पाप बँटता नहीं। फिर भी उसने लड़की का हाथ पकड़ लिया। दोनों ने मिलकर रस्सी खींची।
पहले कुछ नहीं हुआ। फिर घंटा हल्का सा हिला। धूल झरी। दूसरी बार खींचा, एक धीमी गूँज निकली, टन। तीसरी बार दोनों ने पूरी ताकत लगाई।
घंटा बजा। सौ साल बाद काशी का वह घंटा बजा। आवाज ऐसी गूँजी कि कबूतर उड़ गए, पुजारी थाली छोड़कर दौड़े, भीड़ रुक गई।
पुजारी चिल्लाया, किसने बजाया।
माधो डर गया, भागने लगा। लड़की ने उसका कुर्ता पकड़ लिया, बोली, भागो मत।
पुजारी ने देखा, एक चोर और एक फूलवाली। वह बोला, असंभव। तुम दोनों पापी हो।
माधो ने हाथ जोड़कर कहा, महाराज, मैं चोर हूँ। मैंने जीवन में सैकड़ों जेबें काटीं। आज भी चोरी करने आया था। पर इस बच्ची ने मेरा हाथ पकड़ा। इसने कहा पाप बाँट लेते हैं। मैंने सोचा, अगर पाप बाँट सकते हैं तो शायद पुण्य भी।
लड़की बोली, मैंने बेर चुराया था।
पुजारी चुप रहा। महंत आए। उन्होंने घंटा देखा, रस्सी देखी। बोले, सौ साल में पहली बार बजा है। शास्त्र कहता है पाप रहित हाथ चाहिए। इसका अर्थ तुमने गलत समझा।
लोगों ने पूछा, क्या अर्थ है।
महंत बोले, पाप रहित का अर्थ निष्पाप होना नहीं, अपने पाप को जानना है। जो अपने पाप को छिपाता है, उसका हाथ भारी होता है। जो कहता है मैं पापी हूँ, मुझे क्षमा करो, उसका हाथ हल्का हो जाता है। आज इस घंटे को दो हल्के हाथों ने छुआ है, एक ने चोरी मानी, एक ने बेर चुराना माना।
*घंटा रोज बजने लगा*
उस रात के बाद महंत ने नियम बदल दिया। अब आरती से पहले पुजारी कहता, जिसने आज कोई भूल की हो, आए और घंटा बजाए।
पहले दिन कोई नहीं आया। दूसरे दिन एक हलवाई आया, बोला मैंने घी में मिलावट की। उसने रस्सी खींची, घंटा बजा। फिर एक छात्र आया, बोला मैंने माँ से झूठ बोला। घंटा बजा।
माधो ने चोरी छोड़ दी। वह गंगा किनारे नाव चलाने लगा। लड़की का नाम गौरी था। माधो ने उसकी माँ का इलाज कराया। गौरी अब फूल नहीं बेचती, मंदिर में दीया जलाती है।
लोग पूछते हैं, घंटा अब रोज कैसे बजता है। पुजारी हँसकर कहता है, क्योंकि काशी में अब लोग पाप छिपाते नहीं, मान लेते हैं।
*जिस दिन हम अपनी गलती को भ्रष्टाचार मानकर स्वीकार करना प्रारंभ कर देंगे उस दिन से भ्रष्टाचार मुक्त भारत के सहयोगी बनकर उभर जाएंगे व भविष्य में भ्रष्टाचार भी नहीं करेंगे*
*पंडित ओम प्रकाश ओझा रतलामी भ्रष्टाचार मुक्त भारत के लिए प्रयासरत*
माध्यम
*N.A.C.A.India*

