कुछ मुलाक़ातें केवल औपचारिक नहीं होतीं, वे भीतर तक झकझोर देती हैं। परमवीर चक्र विजेता योगेन्द्र सिंह यादव से मिलना भी ऐसा ही एक अनुभव था—ऐसा अनुभव जो शब्दों से ज़्यादा मौन में बोलता है।
सामने खड़ा वह युवक, जिसकी आँखों में न कोई अहम था, न किसी पदक का अहंकार—बस देश के लिए कुछ कर गुजरने की शांत तृप्ति थी। वही योगेन्द्र सिंह यादव, जिनके शरीर पर आज भी गोलियों के निशान हैं, और जिनकी साँसों में आज भी कारगिल की बर्फ़ीली रातें बसती हैं।
कारगिल युद्ध की वह रात…
18 ग्रेनेडियर्स के जवान, टाइगर हिल की दुर्गम चोटी, सामने दुश्मन की मजबूत बंकरें, और उम्र—महज़ 19 वर्ष। गोलियों की बौछार में आगे बढ़ते हुए योगेन्द्र सिंह यादव पहले ही गंभीर रूप से घायल हो चुके थे। गोलियाँ शरीर को चीर चुकी थीं, एक पैर लगभग निष्क्रिय हो गया था। पर मन… मन अब भी अडिग था।
उन्होंने रस्सी थामी, चढ़ाई जारी रखी। हर खून की बूंद के साथ एक ही संकल्प—
“पीछे नहीं हटूँगा।”
ऊपर पहुँचकर उन्होंने दुश्मन के बंकरों को नष्ट किया, अपने साथियों के लिए रास्ता बनाया, और स्वयं बेहोश होकर बर्फ़ पर गिर पड़े। जब होश आया, तो युद्ध जीत लिया गया था—और भारत का तिरंगा उस चोटी पर लहरा रहा था।
उनसे मिलकर यह एहसास हुआ कि देशभक्ति नारे में नहीं, आचरण में होती है। वीरता मंचों पर नहीं, सीमा पर परखी जाती है। और सच्चे नायक वही होते हैं, जिन्हें खुद अपने नायक होने का आभास तक नहीं होता।
परमवीर चक्र केवल एक पदक नहीं है—
वह उन अनकहे दर्दों, उन जमी हुई रातों और उन लहूलुहान सपनों की मुहर है, जिन्हें योगेन्द्र सिंह यादव जैसे वीर चुपचाप जी लेते हैं।


