31.12.2025
कल के संदेश में हमने कहा था, कि…….
*”जीवन में कभी-कभी दुख आता रहे, तो अच्छा है।”*
परंतु इस बात पर कोई व्यक्ति यह कह सकता है,
कि *”दुख तो कोई भोगना चाहता ही नहीं है।”*
जी हां, यह बात ठीक है।
*”दुख भोगना कोई नहीं चाहता।
दुख को बुलाना भी नहीं पड़ता।
वह तो बिना बुलाए स्वयं ही आ जाता है।
बल्कि संसार में तो ऐसा देखा जाता है।
कि एक दुख हटता है, तो दो चार दुख और आ जाते हैं।
इसलिए दुख बुलाने की आवश्यकता नहीं है।”*
हमारा संदेश तो इतना है, कि *”जो लोग यह सोचते हैं, कि हमारे जीवन में कभी दुख आए ही नहीं।
तो उनका यह सोचना गलत है।” “जब तक कोई व्यक्ति संसार में जन्म लेगा, तब तक दुख तो आएगा ही।
संसार में रहकर दुख से पूरी तरह से बचना असंभव है।”*
और यदि कोई ऐसा चाहता हो, कि *”करोड़ों अरबों खरबों वर्षों तक दुख बिल्कुल न आए।
थोड़ा भी न आए।
तो इसके लिए उसे मोक्ष में जाना होगा। क्योंकि केवल मोक्ष ही आत्मा की एक ऐसी स्थिति है, जिसमें दुख बिल्कुल भी नहीं होता। और केवल सुख ही सुख होता है।”*
तो सारी बात का सार यह हुआ, कि जो लोग यह चाहते हैं कि *”हम संसार में ही रहें, और सुखी भी हों, तो उन्हें अपनी मानसिक तैयारी ऐसी रखनी चाहिए, कि “यहां पूरा सुख नहीं मिलेगा। बीच-बीच में दुख भी आते रहेंगे।”*
फिर भी जीवित रहते हुए भी व्यक्ति दुखों से बचकर जीना चाहता है। तो उसका उपाय यह है कि *”यदि लोग बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता से योजनाएं बनाएं। आने वाले दुखों का विचार करके उनको दूर करने की पहले से तैयारी करें। तो वे काफी सीमा तक दुखों से बच पाएंगे और कुछ ठीक प्रकार से सुखमय जीवन जी लेंगे।”*
और जो लोग यह सोचते हों, कि *”हमें तो 100% सुख चाहिए, और वह भी करोड़ों अरबों खरबों वर्षों तक चाहिए, लगातार चाहिए। तो फिर उन्हें मोक्ष में जाना चाहिए। क्योंकि ऐसा केवल मोक्ष में ही संभव है। वहां सारे दुख भी छूट जाएंगे, और ईश्वर का उत्तम आनन्द भी भोगने को मिलेगा। अतः ऐसे लोग मोक्ष प्राप्ति की योजना बनाएं, और उसके लिए पुरुषार्थ करें।”*
—- *”स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक – दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात.”*

