कन्नौज में तैनात ट्रैफिक सब-इंस्पेक्टर आफ़ाक़ ख़ान को सिर्फ़ इसलिए लाइन हाज़िर कर दिया गया ।
क्योंकि एक कॉलेज के आमंत्रण पर छात्राओं को संबोधित करते हुए उन्होंने पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ﷺ का ज़िक्र किया और कहा—
“जिस घर में बेटियाँ होती हैं।
उस घर में ख़ुदा की रहमतें बरसती हैं।”
बस पैग़म्बर साहब का नाम आते ही कुछ संगठनों को लगा कि उनका धर्म ख़तरे में पड़ गया। आनन-फानन में धार्मिक उपदेश देने का आरोप लगाकर शिकायत दर्ज कराई गई और एसपी ने बिना किसी गहन जाँच के टीएसआई को लाइन हाज़िर कर दिया।
यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले बागपत में SI इंतज़ार अली को केवल दाढ़ी रखकर ड्यूटी करने के कारण निलंबित कर दिया गया था। जब तक दाढ़ी नहीं कटवाई गई, निलंबन वापस नहीं लिया गया।
लेकिन ज़रा याद कीजिए—
संभल में CO अनुज चौधरी कैसे एक धार्मिक यात्रा के दौरान गदा हाथ में लेकर सड़कों पर घूमते रहे, मंदिरों में जाकर पूजा करते रहे, यहाँ तक कि “महीने में चार जुम्मे आते हैं” जैसे बयान देते फिरते रहे।
क्या इसे धार्मिक उपदेश माना गया?
क्या उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई हुई?
और यूपी के पूर्व DGP प्रशांत कुमार—जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हेलीकॉप्टर से कांवड़ियों पर फूल बरसाते रहे। सरकारी संसाधनों का खुलेआम धार्मिक प्रदर्शन हुआ, लेकिन न किसी की भावनाएँ आहत हुईं, न कोई शिकायत दर्ज हुई।
सवाल साफ़ है—
क्या उत्तर प्रदेश में कानून और नियम धर्म देखकर लागू होते हैं?
क्या एक अधिकारी का धार्मिक आचरण “अनुशासनहीनता” है और दूसरे का “संस्कृति संरक्षण”?
अगर नियम हैं, तो सबके लिए बराबर हों।
और अगर नहीं हैं, तो फिर यह चयनात्मक कार्रवाई किस न्याय की निशानी है?