जब शिलॉन्ग में डॉ अब्दुल कलाम साहब की मौत हुई, तो पूरी दुनिया रोई। लेकिन असली तमाशा तो अगले दिन दिल्ली में हुआ। लोग उनके कमरे का ताला खोलने पहुँ गये, सब देखना चाह रहे थे कि इतना बड़ा वैज्ञानिक, जो 40 साल तक सरकार के बड़े पदों पर रहा और 5 साल तक ‘रायसीना हिल्स’ (राष्ट्रपति भवन) का राजा रहा वो आख़िर कितनी संपत्ति छोड़कर गया है।
लेकिन जब कमरा खुला, तो सन्नाटा पसर गया।
वहां कोई तिजोरी नहीं थी। कोई लग्जरी कार की चाबी नहीं थी। कोई विदेशी बैंक का पासबुक नहीं था।
उस कमरे के कोने में पड़े एक छोटे से संदूक में बस ये मिला:
6 घिसी हुई शर्ट और 4 ट्राउजर (जिन्हें वो खुद धोते थे)।
3 पुराने सूट (एक तो राष्ट्रपति बनने के समय सिला था, वही 5 साल चला)।
1 कलाई घड़ी (जो वक्त की पाबंद थी, पर दिखावे से कोसों दूर)।
1 पुराना लैपटॉप और 1 वीणा।
और सबसे कीमती चीज़? 2,500 किताबें। बस! यही थी उस शख्स की कुल जमापूंजी जिसने भारत को परमाणु शक्ति बनाया।
हैरानी की बात जानते हैं क्या है?
अब्दुल कलाम ने अपनी पूरी जिंदगी की सैलरी और अपनी पेंशन तक ‘PURA’ नाम की संस्था को चुपचाप दान कर दी थी। जिस इंसान के एक दस्तखत पर देश का अरबों का बजट तय होता था, उसने अपने लिए एक इंच जमीन तक नहीं खरीदी।
आज हम 2000 के जूते और 5000 के चश्मे पहनकर खुद को रईस समझते हैं। लेकिन उस महापुरुष’ ने बिना किसी ब्रांड के पूरी दुनिया को अपना मुरीद बना लिया।
कलाम साहब ने मरते-मरते भी हम सबको एक आईना दिखाया है— कि “इंसान अपनी हैसियत से नहीं, अपनी वसीयत (विचारों) से बड़ा होता है।”
अगर आज आपके पास रहने को छत और पहनने को कपड़े हैं, तो आप उस दिन के राष्ट्रपति से भी ज्यादा ‘अमीर’ हैं। पर क्या आपके पास उनके जैसा ‘दिल’ है?
इस महापुरुष की सादगी के सम्मान में एक ‘नमन’ तो बनता है।

