एक रात के लिए 10000 में जिसे लेकर आया उसी से शादी कर बैठा आमिर लड़का और फिर||
एक अनकहा अहसान: पुल के नीचे की वो अंधेरी रात और इंसानियत की जीत
राजस्थान की गुलाबी नगरी, जयपुर।
जहाँ दिन की चकाचौंध में महलों की भव्यता और पर्यटकों का शोर होता है, वहीं रात के सन्नाटे में शहर के कुछ कोने ऐसे भी हैं जो अपनी अंधेरी गलियों में अनगिनत दर्द और मजबूरियों की कहानियाँ समेटे हुए हैं। यह कहानी है विनय नाम के एक स्वाभिमानी युवक की और शीतल की, जिसकी किस्मत ने उसे एक ऐसी राह पर लाकर खड़ा कर दिया था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं दिखता था।
अध्याय 1: विनय और उसका एकाकी जीवन
जयपुर के एक आलीशान इलाके में एक बहुत बड़ा बंगला था। उस बंगले के मालिक का नाम था विनय। 25 वर्षीय विनय अपनी एक सॉफ्टवेयर कंपनी चलाता था और कम उम्र में ही उसने काफी सफलता हासिल कर ली थी। बाहर से देखने पर विनय का जीवन किसी राजा जैसा लगता था, लेकिन अंदर से वह बिल्कुल अकेला था। उसके माता-पिता का साया बचपन में ही उसके सिर से उठ गया था।
उस बंगले में उसके साथ उसका इकलौता दोस्त अमित रहता था। अमित, विनय का बचपन का दोस्त था, लेकिन दोनों के स्वाभाव में जमीन-आसमान का अंतर था। विनय जहाँ शांत, गंभीर और नैतिक मूल्यों को मानने वाला था, वहीं अमित थोड़ा मनमौजी और आधुनिक जीवनशैली के नाम पर/अनैतिक/रास्तों पर चलने वाला युवक था। अमित अक्सर विनय को सलाह देता था, “भाई, इतनी मेहनत करता है, थोड़ा एन्जॉय भी किया कर। जिंदगी सिर्फ काम के लिए नहीं है।” लेकिन विनय हमेशा मुस्कुराकर उसकी बातों को टाल देता था।
अध्याय 2: वह मनहूस पुल और अंधेरी रात
तारीख थी 15 दिसंबर, रात के करीब 10:30 बज रहे थे। विनय अपनी कंपनी के एक जरूरी प्रोजेक्ट को खत्म करके घर लौट रहा था। उसकी चमचमाती गाड़ी जयपुर की सुनसान सड़कों पर दौड़ रही थी। घर जाने के रास्ते में एक पुराना पुल पड़ता था। इस पुल की एक काली हकीकत थी—रात के समय यहाँ कुछ ऐसी महिलाएँ खड़ी होती थीं जो अपनी मजबूरी या हालात के कारण/अनैतिक/कार्यों के लिए पैसों के बदले लोगों के साथ जाती थीं।
विनय को इस जगह के बारे में अमित से पता चला था। अमित अक्सर यहाँ से लड़कियों को अपने साथ घर लाता था। उसने कई बार विनय से कहा था, “तेरे रास्ते में ही वो पुल पड़ता है, कभी किसी को पसंद करके घर ले आया कर, साथ में पार्टी करेंगे।” विनय को ये बातें सुनकर/घिन/आती थी, लेकिन वह अपने दोस्त को बदल नहीं पाया था।
जैसे ही विनय की गाड़ी उस पुल के नीचे से गुजरी, उसकी हेडलाइट की रोशनी एक युवती पर पड़ी। उस युवती ने चटक मेकअप कर रखा था और पश्चिमी कपड़े पहने हुए थे, लेकिन उसके चेहरे के भाव उस माहौल से बिल्कुल अलग थे। वह बेहद/डरी और सहमी/हुई लग रही थी।
अध्याय 3: एक अजीब सा खिंचाव और रिवर्स गियर
विनय गाड़ी लेकर थोड़ा आगे निकल गया, लेकिन उस लड़की की आँखों की वह उदासी उसके दिल में घर कर गई। उसे लगा कि वह चेहरा/अनैतिक/धंधे में लिप्त किसी पेशेवर महिला का नहीं, बल्कि किसी अत्यंत मजबूर इंसान का है। विनय ने एक पल सोचा और फिर अपनी गाड़ी का रिवर्स गियर लगाया।
गाड़ी धीरे-धीरे उस लड़की के पास जाकर रुकी। जैसे ही गाड़ी रुकी, वह लड़की घबरा गई। उसने डर के मारे अपने छोटे कपड़ों को नीचे खींचने की कोशिश की, जैसे वह अपनी/लाज/बचाना चाह रही हो। उसकी यह घबराहट देखकर विनय का शक यकीन में बदल गया कि यह लड़की यहाँ अपनी मर्जी से नहीं खड़ी है।
विनय ने गाड़ी का शीशा नीचे किया और पूछा, “आप यहाँ इस वक्त क्या कर रही हैं?”
लड़की कुछ बोल पाती, उससे पहले ही एक दूसरी महिला, जिसका नाम सुनीता था, वहाँ आ पहुँची। सुनीता ने तड़क-भड़क वाले कपड़े पहने थे और उसके चेहरे पर एक चालाकी भरी मुस्कान थी। उसने विनय से कहा, “हाँ साहब! क्या पसंद आ गई? इसका रेट 10,000 रुपये है। 5,000 अभी एडवांस लगेंगे और बाकी काम होने के बाद।”
अध्याय 4: सौदेबाजी या सहायता?

