तस्वीरों में दिख रहे ये दोनों लोग सगे भाई हैं।
यहां सुर्ती का आदान प्रदान चल रहा है।
जो सुर्ती दे रहे हैं, वे हैं राजेंद्र राम त्रिपाठी उर्फ रोजी भाई और जो सुर्ती ले रहे है वे उनके बड़े भाई हैं राजकुमार राम त्रिपाठी।
ये दोनों भाई गोरखपुर के सोहगौरा गांव के हैं।
सोहगौरा बहुत ही प्रसिद्ध गांव है और त्रिपाठी लोगों की पहचान से भी जुड़ा है।
सोहगौरा को सुर्तियहवा गांव भी कहा जाता है।
ऐसा इसलिए कि यहां के लोग सुर्ती यानी खैनी बहुत खाते हैं।
सुर्ती को यहां चैतन्य चूर्ण कहा जाता है और चैतन्य चूर्ण के लेन-देन में कोई परदेदारी नहीं है।
पिता अपने पुत्र से सुर्ती बनवाता है तो कभी पुत्र भी पिता से सुर्ती मांग लेता है।
भाई-भाई वाली तस्वीर तो मैंने आपको दिखा ही दी है।
यहां कोई भी सुर्ती छिपाकर नहीं खाता, सबके पास अपनी चुनौटी (सुर्ती और चूना रखने का पात्र) है।
सोहगौरा को सुर्तियहवा गांव कहे जाने के पीछे भी एक कहानी है। कभी इस गांव में आधी रात आग लग गई थी।
बुझाने के लिए लोग जुटे। इससे पहले पानी की बाल्टियां भरी जातीं, किसी ने कहा पहले सुर्ती बन जाए, फिर आग बुझाएंगे।
सुर्ती बनी, बंटी, लेकिन कम पड़ गई।
फिर बनी, फिर बंटी..।
जब तक सुर्ती के आखिरी तलबगार के पास सुर्ती पहुंची, तब तक आधा गांव जल गया था।
सोहगौरा ब्राह्मण समाज और खासकर हमारे पंक्तिपावन समाज का बहुत ही महत्वपूर्ण गांव है।
यहां के लोग देश-विदेश तक फैले हुए हैं।
उनसे पूछा जाता है कि कौन से तिवारी हैं।
गर्व से जवाब देते हैं- सोहगौरा तिवारी।
हमारी मां का मायका भी सोहगौरा में ही है, ये अलग बात है कि हमारे नाना बाद में प्रतापगढ़ चले गए थे।
आज भी मेरे ननिहाल के आगे सोहगौरा ही दर्ज है।
मेरे बड़े काका का विवाह भी सोहगौरा में हुआ था।
बड़का बाबूजी यानी विद्यानिवास मिश्र जी का ननिहाल भी सोहगौरा में था।
उनके सगे छोटे भाई यानी जग्गे मौसा का विवाह भी सोहगौरा में ही हुआ है।
यही नहीं मेरे सगे बड़े भइया का विवाह भी सोहगौरा में ही हुआ है।
सोहगौरा में चैतन्य चूर्ण यानी सुर्ती के अलावा एक और चीज बहुत प्रसिद्ध रही है, वो है भांग, जिसे वहां बूटी या विजया कहा जाता है। भांग के कुछ ऐसे शौकीन थे जो सुबह-शाम विजया का सेवन करते थे।
बाकी लोग शाम को भांग का सेवन करते थे।
भांग पीसने वाले भी विशेषज्ञ होते थे, जब तक भांग पीसते हुए बट्टे से सिल चिपककर उठ न जाती, तब तक नहीं माना जाता था कि भांग पिस गई है।
हमारे भइया के ससुर जी रोज शाम को भांग खाते थे और रात में खाने के बाद कम से कम एक किलो दूध को औंटाकर, रबड़ी बनवाकर खाते थे।
ये सिलसिला उनकी 85 साल की उम्र तक चला। सोहगौरा में भोजन का भी गजब शौक रहा है।
खाने-खिलाने की बड़ी ही समृद्ध परंपरा रही है।
मेरे भइया के बड़े ससुर जी स्वर्गीय विजय प्रताप राम त्रिपाठी जी भोजन के गजब के पारखी थी।
उनकी देख रेख में दही जमाई जाती थी, सुबह वह दही एकदम से ठोस हो जाती।
एक बार लोग चौके में भोजन कर रहे थे।
भोजन बहुत ही स्वादिष्ट था, लोग तारीफ कर रहे थे।
अचानक भइया के बड़े ससुर जी बोले- ये खाना नीम की लकड़ी पर बना है क्या..?
यानी वे इतने बड़े पारखी थे कि खाना किस पेड़ की लकड़ी को जलाकर बनाया गया था, इसका भी अंदाजा लगा लेते थे।
सोहगौरा की एक खासियत और भी है।
भाई-भाई में अलगा हो जाना यहां आम बात है।
बंटवारा हो जाता है, लड़ाई-झगड़ा भी हो जाता है, कई बार हाथापाई भी हो जाती है, लेकिन जब भी उस घर में कोई उत्सव पड़ता है, शादी-ब्याह या जनेऊ पड़ता है तो पूरा परिवार एक रंग में दिखता है। बड़ा भाई पियरी धोती पहने सबसे आगे दिखाई देता है।
दूसरा कोई रिश्तेदार भांप भी नहीं सकता कि इन भाइयों में अनबन है।
मेरा व्यक्तिगत रिसर्च इस गांव के बारे में यह है कि यहां के लोग चाहे जितने दबंग हों, लड़ाकू हों, बदमाश हों, लेकिन अपनी पत्नी और बच्चों के प्रति बहुत ही समर्पित और वफादार रहते हैं।
मैं कहता हूं कि अगर अपनी बेटी की शादी सोहगौरा में करनी हो तो आंख मूंदकर कर दीजिए।
लड़का कैसा भी क्यों न हो, अपनी पत्नी और बच्चों के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देगा।
ऐसा हुआ है।
ऐसा होते हुए मैंने देखा भी है।
सोहगौरा में मेहमान नवाजी बहुत अच्छी होती है।
रिश्ते बहुत अच्छी तरह से निभाए जाते हैं।
मेरा विवाह बहुत नजदीकी रिश्तों में हुआ है, लिहाजा मैं उसे पत्नी का मायका मानता हूं, ससुराल नहीं।
ससुराल का सुख हमेशा सोहगौरा और बसडीला (बड़े भइया की ससुराल) से मिला है।
बड़े भइया के ही सालों, सरहजों और सालियों से आनंदित रहा हूं। वहां मेरा वही सम्मान है, जो मेरे बड़े भाइयों का है।
कुछ साल पहले सोहगौरा एक विवाह समारोह में गया था।
भइया की छोटी सलहज ने कहा- जीजाजी आप बहुत स्मार्ट और हैंडसम लग रहे हैं। बात सही हो या न हो, मन में गुदगुदी तो लग ही गई।

