कोटलपुर से कमरपुकुर तक मां शारदा का 173वां जन्मोत्सव: भक्ति, संस्कृति और राष्ट्रीय एकता का अनुपम संगम
वरिष्ठ संवाददाता/संपादक — अजय कुमार उपाध्याय
कोटलपुर में 11 दिसंबर 2025 को आयोजित मां शारदा देवी का 173वां जन्मोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय एकता का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आया। यह कार्यक्रम एक साथ तीन स्थानों—कोटलपुर, जयरामबाती और कमरपुकुर—में सायंकाल आयोजित किया गया, जहां प्रत्येक स्थल पर एक-एक घंटे का सुसंगठित कार्यक्रम निरंतर चलता रहा। इस अनूठे आयोजन ने यह सिद्ध कर दिया कि श्रद्धा जब संगठित रूप लेती है, तो वह सीमाओं से परे जाकर समाज को दिशा देने लगती है।
मां शारदा देवी, जिन्हें श्रीरामकृष्ण परमहंस की अर्धांगिनी और आध्यात्मिक शक्ति की साकार प्रतिमूर्ति माना जाता है, उनके जन्मोत्सव को जिस भक्ति भाव और गरिमा के साथ मनाया गया, वह अत्यंत सराहनीय रहा। 173वें जन्मदिवस के अवसर पर मां की शिक्षाओं, करुणा और आध्यात्मिक विरासत को स्मरण करते हुए श्रद्धालुओं ने एक स्वर में देश, समाज और मानवता के कल्याण की कामना की।
इस पावन अवसर पर प्रसिद्ध गजल एवं भजन गायक पद्मश्री अनूप जलोटा की शिष्या, रविंद्र संगीत की विशेषज्ञ एवं सुप्रसिद्ध भजन गायिका अजंता सरकार ने अपने कंठ से मां शारदा के भजनों की अमृत वर्षा की। उनके भजनों में न केवल शास्त्रीय संगीत की परिपक्वता थी, बल्कि गहन भक्ति भाव भी स्पष्ट झलक रहा था। पश्चिम बंगाल के विभिन्न ग्रामों और क्षेत्रों में उन्होंने घंटे भर चलने वाली भजन संध्या के माध्यम से श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत किया। उनके स्वर में मां शारदा की करुणा, शक्ति और शांति का संदेश श्रोताओं के हृदय में उतरता चला गया।
अजंता सरकार का मानना है कि मां शारदा केवल बंगाल की नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत की आराध्य शक्ति हैं। उनकी इच्छा है कि इस प्रकार के जन्मोत्सव कार्यक्रम देश के कोने-कोने में आयोजित हों—मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान से लेकर कन्याकुमारी तक। यदि मां शारदा की आराधना पूरे देश में इस रूप में फैलती है, तो निश्चित रूप से समाज में शांति, सद्भाव और आध्यात्मिक जागरण का संचार होगा। उनका स्पष्ट कहना है कि हम सभी शक्ति के उपासक हैं और मां शारदा की कृपा पूरे राष्ट्र पर समान रूप से है।
इस आयोजन का मूल उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके पीछे व्यापक सामाजिक संदेश निहित था—धर्म का कल्याण हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना रहे, आम जनमानस का सर्वांगीण विकास हो और देश प्रगति के पथ पर अग्रसर हो। कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं ने भी इसी भावना के साथ मां के चरणों में प्रार्थना अर्पित की कि भारत सुखी, समृद्ध और शांतिपूर्ण बने।
कार्यक्रम की सफलता इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में इसे और व्यापक स्वरूप दिया जा सकता है। जिस प्रकार कुंभ जैसे आयोजनों में आस्था, संस्कृति और समाज का महासंगम होता है, उसी प्रकार मां शारदा के जन्मोत्सव को राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित कर एक आध्यात्मिक कुंभ का स्वरूप दिया जा सकता है। इससे न केवल धार्मिक चेतना मजबूत होगी, बल्कि सांस्कृतिक एकता और सामाजिक समरसता को भी नया आयाम मिलेगा।
कुल मिलाकर, कोटलपुर, जयरामबाती और कमरपुकुर में एक साथ आयोजित मां शारदा देवी का 173वां जन्मोत्सव एक ऐतिहासिक और प्रेरणादायी आयोजन रहा। यह कार्यक्रम भविष्य के लिए एक मार्गदर्शक है कि किस प्रकार भक्ति, संगीत और संगठन के माध्यम से राष्ट्रव्यापी आध्यात्मिक चेतना का विस्तार किया जा सकता है।

