*बिना मजदूर के कोई सपना पूरा नहीं हो सकता …..वो राष्ट्र की असली नींव हैं*…..
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हर साल 1 मई को भारत समेत दुनिया के कई देशों में अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाया जाता है।भारत में मजदूर दिवस को श्रमिक दिवस (International
Labour Day or May Day ),लेबर डे,मई दिवस, कामगार दिन,इंटरनेशनल वर्कर डे के नाम से भी जाना जाता है।यह दिन दुनिया के मजदूरों और श्रमिक वर्ग को समर्पित है।दुनिया के कई देशों में 1 मई के दिन राष्ट्रीय अवकाश रहता है।
भारत में भी कई राज्य सरकारें अपने यहाँ अवकाश घोषित करती हैं।यह दिन मजदूरों व श्रमिक वर्ग की उपलब्धियों को और राष्ट्र निर्माण में उनके अमूल्य योगदान को सलाम करने का दिन है।इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य मजदूरों की उपलब्धियों को सम्मान करना और उनके द्वारा किये गए योगदान को याद करना है।यह दिन मजदूरों को संगठित कर आपसी एकता मजबूत करने के लिए और उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए भी है।यही वजह है कि बहुत सारे श्रमिक संगठन आज के दिन रैलियां निकालते हैं।
इस दिन मजदूर वर्ग की विभिन्न समस्याओं व उसके समाधान पर मंथन किया जाता है।अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन द्वारा इस दिन सम्मेलन का आयोजन किया जाता है।कई देशों में मजदूरों के लिए कल्याणकारी योजनाओं की घोषणाएं की जाती है।टीवी,अखबार और रेडियो जैसे प्रसार माध्यमों द्वारा मजदूर जागृति के लिए कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं।
आज के दिन को हम श्रमिकों के लंबे संघर्ष के लिए याद करते हैं,उचित व समान वेतन सुरक्षित काम करने की स्थिति,संगठित होने व अपनी आवाज कार्यस्थलों,अदालतों और सरकार में सुने जाने के अधिकार के लिए याद करते हैं।अंतर्राष्ट्रीय श्रम दिवस आज की दुनिया के निर्माण में श्रमिकों के योगदान और बलिदान को दर्शाता है।मजदूर दिवस या मई दिवस को मनाने की परंपरा लगभग 137 साल से चली आ रही है।लेकिन इसके क्या मायने हैं?दरअसल मजदूर दिवस की जड़े अमेरिका में 1886 में हुए एक श्रमिक आंदोलन से जूड़ी हैं।मई 1886 को,अमेरिका के शिकागो शहर में हजारों मजदूर काम के घंटे कम करने की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए और हड़ताल कर दी।आज जो रोजाना काम करने के 8 घंटे निर्धारित हैं और सप्ताह में एक दिन की छुट्टी का अधिकार है,वो सब इसी आंदोलन की देन है।1880 का दशक अमेरिका समेत विभिन्न पश्चिमी देशों में औद्योगीकरण का दौर था।इस दौरान मजदूरों से 15-15 घंटे काम लिया जाता था।सूर्योदय से सूर्यास्त तक उन्हें काम करने के लिए मजबूर किया जाता था।
अमेरिका और कनाडा की ट्रेड यूनियनों के संगठन फेडरेशन ऑफ ऑर्गेनाइज्ड ट्रेडर्स एंड लेबर यूनियन ने तय किया कि मजदूर 1 मई,1886 के बाद रोजाना 8 घंटे से ज्यादा काम नहीं करेंगे।जब वो दिन आया तो अमेरिका के अलग-अलग शहरों में लाखों श्रमिक शोषण के खिलाफ हड़ताल पर चले गए।यहीं से बड़े श्रमिक आंदोलन की शुरुआत हुई।पूरे अमेरिका में श्रमिक सड़कों पर उतर आए थे।इस दौरान कुछ मजदूरों पर पुलिस ने गोली चला दी थी जिसमें कई मजदूरों की मौत हो गई और 100 से ज्यादा लोग घायल हो गए। इसके बाद 1889 में जब पेरिस में डंटरनेशनल सोशलिस्ट कॉन्फ्रेंस हुई तो 1 मई को मजदूरों को समर्पित करने का फैसला किया।इस तरह धीरे-धीरे पूरी दुनिया में 1 मई को मजदूर दिवस या कामगार दिवस के रूप में मनाने की शूरुआत हुई।आज अगर कामकाजी वर्ग के लिए दिन में काम के 8 घंटे तय हैं तो वह अमेरिका में हुए इसी आंदोलन की ही देन है।
बुनियादी ढांचा सड़क,पुल, मेट्रो,हवाई अड्डा,बांध,बिजली प्लांट-सब मजदूरों के हाथ से बने हैं। *”अगर इस जहां में मजदूर का नामोनिशान न होता,तो न होता हवा महल और न ही ताजमहल होता”* निर्माण क्षेत्र में GDP का 8% है और 5 करोड़ लोगों को रोजगार देता है कृषि में 45% लोग लगे हैं।कपड़ा, चमड़ा,ईट उद्योग पूरी तरह श्रम पर टिका है।खेतों में बीज बोने से फसल काटने तक किसान-मजदूर ही अन्नदाता हैं।
सफाईकर्मी,रिक्शा चालक, ठेला चालक,घरेलू कामगार, कूड़ा बीनने वाले-इनके बिना शहर 1 दिन नहीं चल सकता।कोविड,बाढ़, भूकप में सबसे पहले मजदूर ही राहत काम में लगते हैं।
भारत में लेबर किसान पार्टी ऑफ हिन्दुस्तान ने 1 मई 1923 को मद्रास में इसकी शुरुआत की थी।यही वह मौका था जब पहली बार लाल रंग झंडा मजदूर दिवस के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया गया था।यह भारत में मजदूर आंदोलन की एक शुरुआत थी जिसके नेतृत्व वामपंथी व सोशलिस्ट पार्टियां कर रही थीं। दुनियाभर में मजदूर संगठित होकर अपने साथ हो रहे अत्याचारों व शोषण के खिलाफ आवाज उठा रहे थे।1886 का शिकागो आंदोलन सिर्फ एक हड़ताल नहीं थी,बल्कि यह मजदूरों के आत्म-सम्मान,समानता और मानव अधिकारों के लिए संघर्ष की एक बड़ी ऐतिहासिक घटना थी।
( लेखक:-रामाश्रय यादव राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद जनपद मऊ के जिलाध्यक्ष व विचारक हैं )
( अमूल्यरत्न न्यूज )

