9 मई 2003, लखनऊ की पेपर मिल कॉलोनी. शाम के वक्त दो गोलियां चलीं और एक उभरती हुई कवयित्री की आवाज़ हमेशा के लिए खामोश कर दी गई. लेकिन ये सिर्फ एक कत्ल नहीं था; ये एक बाहुबली मंत्री के रसूख और एक बहन की कभी न खत्म होने वाली कानूनी जंग की शुरुआत थी.
अमरमणि त्रिपाठी, पूर्वांचल की राजनीति का वो नाम जिसने भाजपा, बसपा और सपा हर सत्ता में अपनी जगह बनाई. चार बार का विधायक और मायावती सरकार का कद्दावर मंत्री, जिसका प्रभाव नेपाल सीमा तक फैला था.
लेकिन इस रसूख के पीछे एक उलझा हुआ रिश्ता था 24 साल की कवयित्री मधुमिता शुक्ला के साथ. वह अपनी ओजस्वी कविताओं के लिए मशहूर थीं, लेकिन अमरमणि के साथ उनके संबंधों ने उन्हें सत्ता के उस चक्रव्यूह में फंसा दिया जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं थी.
जांच रिपोर्टों के मुताबिक, मधुमिता और अमरमणि के रिश्तों में कड़वाहट तब आई जब मधुमिता तीसरी बार गर्भवती हुईं. इससे पहले दो बार दबाव में गर्भपात कराया गया था, लेकिन इस बार मधुमिता ने मना कर दिया. यही वो मोड़ था जिसने उन्हें मौत के करीब धकेल दिया.
सीबीआई की चार्जशीट के मुताबिक, अमरमणि की पत्नी मधुमणि त्रिपाठी इस रिश्ते से बेहद नाराज थीं. उन्होंने अमरमणि के भतीजे रोहित चतुर्वेदी की मदद से शूटर संतोष राय और प्रकाश चंद्र पांडे को सुपारी दी. अमरमणि ने कथित तौर पर निर्देश दिया था कि ‘काम’ ऐसे हो कि उनका नाम न आए.
पुलिस की शुरुआती जांच को भटकाने की हर मुमकिन कोशिश हुई. अमरमणि ने मधुमिता की शादी किसी ‘अनुज मिश्रा’ से होने की फर्जी कहानी तक गढ़ी. लेकिन जब मामला सीबीआई के पास गया, तो विज्ञान ने झूठ का पर्दाफाश कर दिया.
सीबीआई ने मधुमिता के गर्भ में पल रहे सात महीने के भ्रूण का डीएनए टेस्ट कराया. रिपोर्ट ने साबित कर दिया कि उस बच्चे का पिता अमरमणि त्रिपाठी ही था. ये वो वैज्ञानिक सबूत था जिसने बाहुबली को कानूनी रूप से घुटनों पर ला दिया.
अमरमणि का उत्तर प्रदेश में इतना खौफ था कि गवाहों का टिक पाना नामुमकिन लग रहा था. मधुमिता की बहन निधि शुक्ला की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए 2007 में ट्रायल को लखनऊ से उत्तराखंड के देहरादून शिफ्ट कर दिया.
देहरादून की अदालत में निधि शुक्ला और नौकर देशराज (एकमात्र चश्मदीद) की गवाही रंग लाई. 24 अक्टूबर 2007 को अदालत ने अमरमणि, मधुमणि, रोहित और संतोष राय को उम्रकैद की सजा सुनाई.
सजा तो हुई, लेकिन असली विवाद तब शुरू हुआ जब आरटीआई (RTI) के जरिए ये खुलासा हुआ कि सजा का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 62%) त्रिपाठी दंपत्ति ने जेल के बजाय गोरखपुर के अस्पताल में बिताया. बीमारी का बहाना बनाकर वे अस्पताल के वार्डों से अपना साम्राज्य चलाते रहे.
अगस्त 2023 में उत्तर प्रदेश सरकार ने 2018 की रिहाई नीति के तहत, अच्छे व्यवहार और उम्र का हवाला देते हुए दोनों की समयपूर्व रिहाई का आदेश दिया. निधि शुक्ला ने इसका पुरजोर विरोध किया और इसे ‘इंसाफ का कत्ल’ करार दिया.
निधि शुक्ला ने रिहाई के खिलाफ अपनी लड़ाई को सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंचाया. लेकिन 25 मार्च 2025 को जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी की पीठ ने याचिका खारिज कर दी. अदालत ने कहा कि सरकार ने अपनी नीति के तहत फैसला लिया है और किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं हुआ है.

