सविता प्रधान की कहानी संघर्ष, साहस और आत्मविश्वास की एक ऐसी मिसाल है।
जो हर किसी को प्रेरित करती है।
बेहद गरीबी में पली-बढ़ीं सविता की शादी मात्र 16 साल की उम्र में हो गई थी।
लेकिन शादी के बाद उनका जीवन आसान नहीं रहा।
उन्हें अपने पति और ससुराल वालों से लगातार हिंसा, अपमान और उपेक्षा सहनी पड़ी।
यहां तक कि कई बार उनके साथ उनके बच्चों के सामने भी मारपीट की जाती थी।
हालात इतने खराब हो गए थे कि एक समय उन्होंने अपनी जिंदगी खत्म करने तक का सोच लिया।
लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
उन्होंने अपने आत्मसम्मान और बच्चों के भविष्य के लिए उस अपमानजनक रिश्ते को छोड़ने का साहस दिखाया और नई शुरुआत करने का फैसला किया।
जीवन यापन के लिए उन्होंने सैलून में काम किया।
बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया और साथ ही अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य पर ध्यान बनाए रखा और आखिरकार अपने पहले ही प्रयास में UPSC परीक्षा पास कर IAS अधिकारी बन गईं।
आज सविता प्रधान सिर्फ एक अधिकारी नहीं, बल्कि उन हजारों महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण हैं।
जो हिंसा, गरीबी और निराशा के अंधेरे में जी रही हैं।
उनकी कहानी यह साबित करती है कि अगर हौसला मजबूत हो तो कोई भी मुश्किल रास्ता मंजिल तक पहुंचने से रोक नहीं सकता।

