गाँव में एक वृद्ध पंडित जी रहते थे।
उनके जीवन का एक ही नियम था—हाथ में भगवद्गीता, मुख पर कृष्ण का नाम और हृदय में धर्म।
वे घर-घर जाकर कथा सुनाते और जो रूखा-सूखा मिल जाता, उसी में संतोष कर लेते।
एक धुंधली शाम, जब पंडित जी कथा कर लौट रहे थे, एक खूँखार चोर ने उनका रास्ता रोक लिया।
चमकती हुई छुरी दिखाकर वह गरजा, “पंडित! जो कुछ भी है, चुपचाप मेरे हवाले कर दे,
वरना जान से जाएगा!”
पंडित जी तनिक भी विचलित नहीं हुए।
उन्होंने शांत भाव से कहा,
“बेटा………
मेरे पास फटी धोती और इस गीता के अलावा कुछ नहीं है।
पर हाँ……..
अगर तू सच में धनवान बनना चाहता है।
तो कल मेरी कथा में आना।
मैं एक ऐसे खजाने का पता बताऊंगा जिसे लूट लिया तो सात पीढ़ियां तर जाएंगी।
चोर को लगा कि शायद पंडित किसी सेठ के घर की गुप्त तिजोरी की बात कर रहा है।
वह मान गया।
अगले दिन, चोर भीड़ में छिपकर बैठ गया।
पंडित जी व्यासपीठ से बोले:
“भक्तों! मीलों दूर, वृंदावन की कुंज गलियों में एक नन्हा बालक ‘कान्हा’ रहता है।
वह सांवला है।
उसकी आँखों में जादुई चमक है और वह करोड़ों के हीरों-जवाहरात से लदा रहता है।
हर रात वह पीपल के घने पेड़ के नीचे अकेला आता है।
जो उसे पा ले…….
उसके सारे अभाव मिट जाते हैं।”
बाकी लोग इसे आध्यात्मिक उपदेश समझ रहे थे।
पर उस चोर ने इसे ‘नक्शा’ मान लिया।
उसके मन में लालच नहीं।
एक जिद पैदा हो गई—”आज तो उस कान्हा को लूटकर ही रहूँगा!”
चोर घर पहुँचा और अपनी पत्नी से बोला, “आज बड़े शिकार पर जा रहा हूँ।
रास्ते के लिए कुछ खाने को दे दे।
” गरीब पत्नी के पास केवल थोड़ा सा सत्तू था।
उसने वही पोटली में बांध दिया।
टूटी चप्पलें और फटे कपड़ों में वह चोर नंगे पैर निकल पड़ा।
उसके दिमाग में बस एक ही धुन सवार थी—कान्हा… कान्हा…!
वह डरता था कि कहीं बच्चा उसे देखकर भाग न जाए।
इसलिए उसने छिपने का मन बनाया।
जब वह उस बताए हुए स्थान पर झाड़ियों में घुसा, तो नुकीले काँटों ने उसका बदन छलनी कर दिया।
पर उसे दर्द का अहसास ही नहीं था।
वह सत्तू का एक-एक दाना खाता और बुदबुदाता—”कान्हा।
तू बस एक बार आ जा।
आज तुझे छोड़ूँगा नहीं।”
इधर बैकुंठ में माता रुक्मणी घबरा गईं।
उन्होंने देखा कि प्रभु जाने की तैयारी कर रहे हैं।
“स्वामी! वह चोर है, आपको लूटने के इरादे से बैठा है!”
रुक्मणी जी बोलीं।
भगवान कृष्ण मंद-मंद मुस्कुराए और बोले, “देवी!
दुनिया मुझे छप्पन भोग खिलाकर मांगती है पर यह पापी मुझे पाने के लिए काँटों पर बैठा है।
जो मेरे प्रेम में खुद को मिटाने को तैयार है।
उसके हाथों लुटने में भी मुझे सुख मिलता है।”
अंधेरी रात में पायल की झंकार गूंजी।
एक अलौकिक बालक नाचता हुआ आया।
चोर झाड़ियों से शेर की तरह झपटा और बालक का हाथ पकड़ लिया।
“पकड़ लिया! बहुत भटकाया तूने मुझे।
अब चुपचाप ये सारे गहने उतार दे, वरना…”
कान्हा हँसे।
ऐसी हंसी कि चोर का पत्थर जैसा दिल मोम की तरह पिघलने लगा। प्रभु बोले, “अरे! डराता क्यों है?
यह सब तेरा ही तो है। ले, सब ले ले।
” कान्हा ने अपने गले का कौस्तुभ मणि, कुंडल और सारे आभूषण उस चोर की झोली में डाल दिए।
चोर स्तब्ध था—जिस बालक को उसने डराया।
वह उसे इतनी ममता भरी नज़रों से देख रहा था!
अगले दिन चोर सीधे पंडित जी की कथा में पहुँचा।
उसने आधे गहने पंडित जी के चरणों में रख दिए और बोला। “महाराज! ये आपका हिस्सा।
आपने ही तो पता बताया था।
उस बालक को मैंने लूट लिया!”
पंडित जी की आँखें फटी की फटी रह गईं।
उन्होंने गहनों की चमक देखी तो पहचान गए कि ये इंसानी दुनिया के नहीं हैं।
वे रोने लगे, “मैं उम्र भर पोथियाँ पढ़ता रहा।
मुझे दर्शन नहीं हुए!
और तूने उसे सचमुच ढूंढ लिया?”
पंडित जी चोर के साथ उसी जंगल में गए।
दोनों ने पुकारा—”कान्हा… कान्हा!”
तभी फिर वही बालक प्रकट हुआ।
पंडित जी चरणों में गिर पड़े।
चोर ने पूछा, “भगवन! कल तो आप अकेले आए थे,
आज इस पंडित के लिए क्यों आए?”
प्रभु बोले, “बेटा! पंडित ने मुझे ‘शास्त्रों’ में खोजा,
पर तूने मुझे ‘सच्चाई’ और ‘विश्वास’ से खोजा।
तेरी वजह से आज इन्हें भी दर्शन मिले।”
परमात्मा को पाने के लिए पांडित्य नहीं, पागलपन चाहिए।
वह चतुराई से नहीं, भोलेपन से रीझते हैं।

