*सम्पादकीय*
✍🏾 बरनवाल संतोष नयन, अमूल्यरत्न न्यूज राष्ट्रीय हिंदी मासिक पत्रिका
सम्पादक✍🏾
*फकीरों की सोहबत में बैठा किजीए साहब*!!
*जिंदगी जीने का अंदाज खुद ब खुद आ जायेगा*!!
जीवन का हर लम्हा मौत के तरफ बढ़ रहा है। आहिस्ता आहिस्ता उम्र का कारवां अस्ताचल के तरफ जा रहा है। लेकिन माया का खेल देखिए नश्वर शरीर में समाई आत्मा जो परमात्मा से कुछ दिनों के लिए कर्म फल भोगने का वादा कर इस मृत्यु लोक में परलोक जाने की तिथि कनफर्म कर आई इस जगत की भौतिकता के ताप का संन्ताप पाते ही सब कुछ भूल जाती है अधोगति के रास्ते पर अग्रसर होकर आखरी सफर की दुर्गति तक मोह तथा विछोह की परिधि में चक्कर लगाती रहती है।हरिनाम भजने के बजाय बदनाम होने में सारा जीवन व्यर्थ गंवा देती है। यह अलग बात है प्रारब्ध बस कोई राजा होकरआता तो कोई रंक लेकिन बिना कलंक कोई वापस नहीं हुआ! वहीं निष्कलंक वापस हुए जिनका जीवन स्वार्थ से परे परमार्थ मे निस्वार्थ यथार्थ के धरातल पर परहित में समर्पित हो गया! जिंदगी की जंग में पल पल बढ़ती उम्र प्रति पल कल बल छल के सानिध्य मे अपनों के सुखी भविष्य का सपना सजाए निस दिन धन लक्ष्मी को बन्धक बनाने के प्रयास में समर्पण भाव लिए अपने मूल को भूलकर यथार्थ से प्रतिकूल कर्मों की पंचवटी में विचलित होता रहता है। यह सर्व विदित है इस रहस्यमयी दुनियां से खाली आये खाली हाथ ही जाना है तब भी लोभ बस आदमी ऐसा कर्म करता है कि पुनः नर्क का भागी बन चौरासी हजार योनियों में भटकने का रास्ता स्वयं प्रशस्त कर लेता है!इस मृत्युलोक में आत्मा मिट्टी की काया में प्रतिस्ठीत होकर माया के वशीभूत उसके ही इशारे पर अभीभूत होकर सर्वस्व गंवा देती है! जिस उद्देश्य को लेकर आये है उसको पूर्णतया भूल जाते है।वास्तविकता के धरातल पर कदम ताल करती जिदगी मालिक की बन्दगी से जीवन भर दूरी बनाकर स्वयं में ब्यस्तता की मजबूरी बता अपनी प्रारब्धीय ब्यवस्था को अधूरी छोड़ देती है पश्चाताप के ताप में उस वक्त सिसकती है जब नश्वर काया में इन्द्रियों की छाया घटने लगती है। तन्हाई की शाम गुजरे कल का इन्तकाम लेना शुरू कर देती है!जिनके लिए आजीवन स्वयं को समर्पित कर सब कुछ गंवा दिया, तब भी सफर का आखरी पहर गमजदा माहौल में अश्कों के सैलाब से बे हिसाब दर्द की दरिया में उबाल ला दिया!न कोई साथी न सघाती !रामनाम की बोली कच्चे बांस की डोली में ही महाप्रयाण !श्मशान में खड़ी आत्मा परमात्मा से मिलन की चाह में आह भरती मतलब परस्तो को निहारती शून्य में ही विलीन हो जाती??जब तक शारिरिक शौष्ठव कायम है हरिनाम जपो भाई साथ कोई नहीं जायेगा।——-!!
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