हाल ही में अभिनेता संजय दत्त उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी से मिले। हालांकि वह कुछ समय पूर्व ही भाजपा के मंच पर दिखाई दिए जहां से बात बड़ी कि वह भाजपा में जायेंगे। बहुत लोगों में इसको लेकर उत्साह भी है कि यह भाजपा की उपलब्धि है।
आपको बताता चलूं कि भारत में ऐसी कोई छोटी, बड़ी पार्टी नहीं है जिसमें संजय दत्त होकर नहीं आए हैं और ऐसा कोई राष्ट्रीय या क्षेत्रीय नेता या मुख्यमंत्री भी नहीं है जिससे संजय दत्त मिला न हो। आजकल भाजपा का दौर है तो उनकी भाजपा की सैर है।
आपको यह भी बताता चलूं कि संजय दत्त के पिता सुनील दत्त पांच बार कांग्रेस से सांसद रहे हैं और उसके बाद उनकी बेटी तथा संजय दत्त की बहन प्रिया दत्त भी दो बार कांग्रेस से सांसद रही हैं। आजकल वह कांग्रेस राष्ट्रीय कमिटी का हिस्सा भी है।
इसलिए एक बात समझ लीजिए कि अभिनेता, व्यवसाई और नेता के लिए दल महत्वपूर्ण नहीं होता है बल्कि समय बलवान होता है। मनोज तिवारी कभी समाजवादी पार्टी के वफादार तो रवि किशन कांग्रेस के कट्टर समर्थक हुआ करते थे। आज देखो कहां और क्या है।
असम के मुख्यमंत्री जिन्हें आज हिंदुत्व का कट्टर चेहरा और भाजपा का बड़ा नाम माना जाता है हेमंत बिस्वा शर्मा कभी कांग्रेस के मुख्यमंत्री थे। करप्शन का आरोप लगा जो कि भाजपा ने ही लगाया तो भाजपा में ही चले गए और हिंदू, मुस्लिम शुरू किया आज आलम देखो।
अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, रेखा, सचिन तेंदुलकर इत्यादि सब राजनीति में रहे हैं। इन्होंने क्या किया यह सवाल आज भी वाजिब है लेकिन इन्हें तवज्जो क्यों मिलती है इसका सीधा कारण है जनता का आकर्षण जबकि वास्तविक परिभाषा है जनता की मूर्खता।
मैं ये नहीं कहता है कि कोई कलाकार, नेता, व्यक्ति गलत है लेकिन हम अपने प्रतिनिधि की जवाबदेही तय नहीं कर पाते जिसका परिणाम है कि हमारे ऊपर किसी को भी थोपा जाता है क्योंकि राजनीति संख्याबल बल से चलती है जिसे धनबल, बाहुबल और आकर्षण से हासिल किया जाता है।
धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, सन्नी देओल सब सांसद है। एक परिवार और पार्टी से रहे हैं। आम इंसान से नहीं मिल पाते, हाथ मिलाने में भी कतराते हैं लेकिन फिर भी जीत रहे हैं। क्या विकास, मुद्दे, नीति, भविष्य या किसी विशिष्ट विषय के नाम पर? नहीं बल्कि चेहरे, दल और आकर्षण के नाम पर।
अब जीतने वालों की क्या गलती भले ही वो भाजपा में हो या कांग्रेस में या हों अन्य किसी में भी। मौका परस्ती जबतक जनता में रहेगी, नेताओं भी रहेगी क्योंकि नेता, अभिनेता भी कोई आसमान से नहीं टपकते हैं। इसी जनता के बीच से पनपते हैं। जैसी जनता होगी, वैसा ही उनका नेता, प्रतिनिधि, दल और सत्ता भी होगी।

