वटवृक्ष की छाया और कुछ उड़ते पत्तों की कहानी…
राष्ट्रीय सलाहकार की कलम से
राष्ट्रीय पत्रकार संघ भारत आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। यह केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक विचार, एक संस्कार और एक सतत साधना है। जिस प्रकार एक वटवृक्ष अपनी जड़ों की गहराई और शाखाओं के विस्तार से पहचाना जाता है, उसी प्रकार हमारा संगठन अपने सिद्धांतों, अनुशासन और समर्पित साथियों के कारण पत्रकार जगत में तीव्र गति से उभरता हुआ एक सशक्त मंच बना है।
हमने उंगलियां पकड़कर चलना सिखाया, कलम को धार देना सिखाया, मंच पर खड़े होकर विचार रखना सिखाया। जिन साथियों को संगठन ने पहचान दी, अवसर दिया, मार्गदर्शन दिया—आज वे अपने आपको स्वतंत्र पहचान के साथ खड़ा देख रहे हैं। यह हमारे लिए गर्व का विषय है। पुत्र बड़ा हो जाए, यह हर पिता की कामना होती है। परंतु इतिहास और संस्कृति हमें यह भी सिखाती है कि बड़ा होने का अर्थ मूल को भूल जाना नहीं होता।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने वनवास भोगा, राज्य त्यागा, परंतु पिता की मर्यादा को कभी लांघा नहीं। भरत ने सिंहासन को स्पर्श तक नहीं किया। सनातन परंपरा में बड़े का सम्मान केवल संस्कार नहीं, शक्ति है। यही शक्ति भारत की आत्मा है।
आज कुछ साथी संगठन से अलग होकर नए मंच बना रहे हैं। यह उनका अधिकार है। हम उनका स्वागत करते हैं। हर व्यक्ति को अपने विचारों के अनुरूप आगे बढ़ने की स्वतंत्रता है। यदि कोई स्वयं को संगठन संचालन के योग्य समझता है, तो यह प्रसन्नता की बात है। हम ऐसे साथियों को शुभकामनाएं देते हैं।
परंतु एक बात स्पष्ट है—वटवृक्ष से टूटकर उड़ जाने वाला पत्ता कुछ समय तक हवा में अवश्य लहराता है, किंतु जड़ों से जुड़े बिना स्थायित्व संभव नहीं होता। संगठन छोड़ना एक निर्णय हो सकता है, परंतु संगठन की पीठ पर प्रहार करना, भ्रम फैलाना या असत्य का सहारा लेना—यह न तो पत्रकारिता की मर्यादा है और न ही संगठनात्मक संस्कृति की पहचान।
इतिहास में विभीषण को राज्य अवश्य मिला, पर समाज ने उसे आदर्श का स्थान नहीं दिया। सुग्रीव को राज मिला, पर वह राम के संरक्षण और मर्यादा में रहा। सत्ता, पद और उपाधि क्षणिक हो सकते हैं, किंतु विश्वास और निष्ठा स्थायी मूल्य हैं।
हम किसी के लिए कटु शब्द नहीं कहना चाहते, परंतु इतना अवश्य कहेंगे कि संगठन की नींव त्याग, तपस्या और विश्वास पर टिकी है। जो साथी आज भी हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं, वे इस संगठन की वास्तविक शक्ति हैं। वे न तो पद के मोह में हैं, न प्रसिद्धि की दौड़ में। उनका लक्ष्य स्पष्ट है—पत्रकारों की गरिमा, राष्ट्रहित और संगठन का विस्तार।
राष्ट्रीय पत्रकार संघ भारत “भारत सेवा, संघर्ष और सुशासन” के मूल भाव पर पहले भी अडिग था और आज भी अडिग है। हम फकीरी अंदाज़ में चले थे, आज भी उसी सादगी और संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं। हमारा उद्देश्य किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि पत्रकार समाज को संगठित, सशक्त और सम्मानित करना है।
जो साथी हमें छोड़कर गए, उनके प्रति भी हमारे मन में दुर्भावना नहीं है। हम उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं। जब भी उन्हें मार्गदर्शन, अनुभव या सहयोग की आवश्यकता होगी, हमारा द्वार बंद नहीं होगा। क्योंकि संगठन का कद उसके व्यवहार से मापा जाता है, प्रतिक्रिया से नहीं।
लेकिन जो साथी आज भी हमारे साथ हैं—आप सभी को नमन। आपका विश्वास ही हमारी पूंजी है। आपकी निष्ठा ही हमारी शक्ति है। संगठन किसी एक व्यक्ति का नहीं, सामूहिक संकल्प का नाम है।
वटवृक्ष की जड़ें जितनी गहरी होंगी, आंधियां उतनी ही निष्फल होंगी। हम न तो भ्रम से विचलित होंगे, न आलोचना से। हम अपने पथ पर अडिग रहेंगे।
अंत में केवल इतना—
जो साथ हैं, वे परिवार हैं।
जो अलग हुए, वे भी कभी परिवार थे।
और जो विरोध में हैं, वे भी हमारे अनुभव का हिस्सा हैं।
राष्ट्रीय पत्रकार संघ भारत अपनी मर्यादा, अपने सिद्धांत और अपने संस्कारों के साथ आगे बढ़ता रहेगा।
जय पत्रकारिता। जय भारत।

