बात नवम्बर की है। मेरी सहायिका के हसबैंड का फोन एक लड़का लेकर भाग गया।
जब ये घटना हुई,
उस समय मैं गोरखपुर में थी।
पूरी कहानी उसने फोन पर बताया।
तुरंत कम्प्लेन नहीं हो पाई।
मैंने उसे बताया कि किसी से लिखवा लो और थाने पर जाकर दे दो। जब वह गई तो उससे पूछा गया कि फोन मिस हो गया है?
तो उसने हाँ कह दिया।
फिर थाने में फोन गुम होने की बात लिखी गई।
जब उस पर कार्रवाई की बात की तो थाने के किसी कर्मचारी ने एप्लिकेशन फाड़कर फेंक दिया।
अभी करीब दो हफ्ते पहले मैं खुद एप्लिकेशन लिखकर लेकर गई तो उन लोगों ने बताया कि ये शायद पहले भी आई थीं।
मैंने सहायिका से सीखाकर ले गई थी कि ज़्यादा मत बोलना, कहीं ऐसा न हो कि पुरानी बात शुरू कर दें।
हम दोनों जब थाने पहुँचे तो जहाँ चोरी-चकारी की कम्प्लेन दर्ज होती है।
उस कमरे में कोई नहीं था।
थाने के बाहर दो महिलाओं के बीच आपस में सुलह कराई जा रही थी।
एक महिला अधिकारी ने फोन करके बुलाया कि एक कम्प्लेन आई है, आकर देख लीजिए।
उसके बाद तीन लोग आ गए।
एक ने पूछा, “क्या हुआ मैडम?”
लिखित कम्प्लेन देते हुए मैंने नए सिरे से पूरी कहानी सुनाई कि सहायिका के हसबैंड के छोले-कुलचे के ठेले पर एक लड़का आया, फोन करने के लिए मोबाइल माँगा और लेकर भाग गया।
मेरा दिया हुआ कम्प्लेन पढ़कर कम्प्यूटर पर लिखते-पढ़ते थोड़ी देर बाद उन्होंने कहा कि कुछ दिन पहले कनावनी से एक महिला आई थी, यही तो नहीं थीं।
तब सहायिका ने कहा……..
“हाँ आई थीं।
पर सुनवाई नहीं हुई।
” मैंने सोचा कहीं ये लोग हर्ट न हो जाएँ, तो जल्दी से बात बना दी कि शायद उस समय लिखित कम्प्लेन नहीं दी थी।
थोड़ी देर में उन्होंने कहा कि इनकी कम्प्लेन हो गई है।
फिर उन्होंने फोन मिलाया।
जिसके पास फोन था, उसने फोन उठा लिया और बताया कि मैं इन्दिरापुरम में एटीएस के पास हूँ। खाना पहुँचाने आया हूँ।
पुलिस ने कहा, “मैं इन्दिरापुरम सेक्टर-7 से बोल रहा हूँ, तुम जो फोन इस्तेमाल कर रहे हो, वो चोरी का है।
लेकर आओ और थाने में जमा कर दो।” उसने कहा, “हमने दुकान से खरीदा है और अभी खाना पहुँचाने आया हूँ, अभी नहीं आ पाऊँगा।
” पुलिस ने कहा, “नहीं-नहीं, अभी पहुँचाओ।”
उसने मना कर दिया।
पुलिस ने कहा……
“जहाँ हो वहीं रुको, हम आ रहे हैं।
और मोबाइल दे दो, हम तुम्हें पैसे दिलवा देंगे दुकान वाले से।
” हम सारी बातें सुन रहे थे।
दो पुलिसवाले उठे और बोले कि हम जा रहे हैं, वो एटीएस के पास है।
मैंने कहा, “हम भी चलते हैं।
” तो उन्होंने कहा, “आप लोग कैसे जाएँगी?
” तभी उन्होंने टेबल पर रखी कार की चाबी देख ली और पूछा, “आप गाड़ी से आई हैं क्या?”
मैंने कहा, “हाँ।”
तो दोनों बोले, “फिर चलिए।”
सहायिका को आगे बैठने को कहा और अपने दोनों लोग पीछे बैठ गए। रास्ते भर बताते रहे कि किधर से चलेंगे तो जल्दी पहुँचेंगे।
एक जगह अचानक बोले, “दाहिने से ले लीजिए।”
जैसे ही मैंने गाड़ी मोड़ी, रेड लाइट हो गई।
उन्होंने कहा, “निकाल लीजिए, हम हैं न।”
अंदर की सड़कों से ले गए—खूब उबड़-खाबड़ रास्ते, टूटी हुई सड़कें।
जब वहाँ पहुँचे तो उसने फोन बंद कर लिया।
हमने सड़क के किनारे गाड़ी लगा दी और पुलिस लगातार फोन मिलाने की कोशिश करती रही।
थोड़ी देर बाद उसने फोन ऑन किया और बताया कि एटीएस के गेट नंबर एक पर हूँ, पर अब मैं दूसरे जगह खाना पहुँचाने जा रहा हूँ। पुलिसवालों ने कहा, “एटीएस का एक चक्कर लगाते हैं।”
फिर हमने एटीएस का चक्कर लगाया। जहाँ वे लोग कहते, गाड़ी धीमी करिए; जहाँ कहते, “मैम थोड़ा तेज़ भगाइए”—मैं उनके हिसाब से स्पीड और रास्ते पकड़ती रही।
करीब डेढ़ घंटे तक इन्दिरापुरम का चक्कर मारते रहे।
फिर उसने मोबाइल ऑफ कर दिया और दोबारा ऑन नहीं किया।
आख़िर हार-थक कर हम लौट आए।
सहायिका को उसके घर के नज़दीक वाली सड़क पर छोड़ा और पुलिस को थाने पर।
उन्होंने कहा, “दो-तीन दिन में मिल जाएगा।”
हम इत्मीनान से घर आ गए।
अभी तक थाने से कोई फोन नहीं आया।
जबकि कम्प्लेन दर्ज करते समय उन्होंने मेरा नंबर लिया था कि मिल जाने पर सूचना दी जा सके।
सहायिका ने कहा था, “दीदी, अपना दे दो।”
उस समय लग रहा था कि कितना अपने काम के प्रति ईमानदार हैं—एकदम से मिशन पर निकल पड़े।
ऐसे-ऐसे रास्तों से ले गए कि क्या बताएं।
आते समय तो एक जगह गाड़ी नाले के बहुत ऊँचे स्लोप पर जाकर रुक गई और पीछे गाड़ियाँ लगी हुई थीं।
हॉर्न बज रहे थे लोग।
बहुत मुश्किल से गाड़ी निकली वहाँ से।
लग रहा था कि हम ही पुलिस वाले होते तो कितना अच्छा होता … वापस लौटते समय कह रहे थे कि रात को भी ऑन करेगा तो उसी समय धर दबोचेंगे साले को, और इतना परेशान किया है तो मारेंगे भी कि फोन क्यों बंद किया।
और हाल यह है कि अभी तक कोई खबर नहीं।
जबकि सहायिका को बीच में एक भेजी थी कि जाओ एक बार याद दिला दो।
तो उन लोगों ने कहा कि अभी फोन ऑन नहीं किया है।
अगर पुलिस अपना काम समय और ईमानदारी से करे।
तो समस्याएँ जल्दी सुलझें और जनता का विश्वास भी बना रहे।

